खामियाजे भी हैं अच्छे कामों के

कुछ दशकों पहले तक जो बुरा काम करते थे, कामचोर हुआ करते थे उन्हें हिकारत भरी दृष्टि से देखा जाता था और उनमें सुधार लाने के चौतरफा प्रयास किए जाते थे।

जब से वर्क कल्चर पर ग्रहण लग गया है तभी से नाकाबिलों, कामचोरों और बुरे लोगों को कुछ भी कहने या सुधारने की हिम्मत जवाब देती जा रही है।

कारण साफ है कि उन लोगों की संख्या बढ़ती जा रही है जो वर्क कल्चर को अपने लिए आफत मानकर काम करते हैं और चाहते हैं कि जो हो रहा है, होने दो, क्या फर्क पड़ता है, जो मिल रहा है वह तो मिलता ही रहेगा।

समस्या तो बेचारे उन मेहनतकश लोगों की है जिनकी जिन्दगी बिना मेहनत के चल ही नहीं सकती। एक दिन भी कोई बाधा आ जाए तो उनके सामने संकट पैदा हो जाता है।

आजकल कार्य संस्कृति को अपनाने से कहीं अधिक रुचि प्राप्ति पर केन्दि्रत है और जो इंसान एक बार अपनी लाभ-हानि को सामने रखकर दैनिक जीवनचर्या को अपना लेता है फिर वह कर्मयोगी और सेवाभावी न होकर कारोबारी मानसिकता वाला हो जाता है और हर क्षण इसी उधेड़बुन में रहता है कि कहाँ क्या मिलेगा।

वही करता है जिसमें कुछ न कुछ मिलने वाला होता है। मिलेगा तो ही दो कदम चलने की सोचेगा, नहीं मिलेगा तो लाख संबंधों की दुहाई दो, सेवा और परोपकार की सीख दो, टस से मस नहीं होगा।

कालान्तर में कार्य संस्कृति के प्राप्ति संस्कृति में तब्दील हो जाने की वजह से उन सभी लोगों की बाँछें खिली हुई रहने लगी हैं जो काम-काज करना ही नहीं चाहते, सब कुछ जानते-बूझते हुए भी नासमझों की तरह व्यवहार करते हैं और वह भी इसलिए कि उन पर कोई काम न आ पड़े।

कार्य से पलायन करने की यह मानसिकता बुजुर्गों में नहीं हुआ करती थी लेकिन हाल के वर्षों में एक-दूसरे की देख-देखी यह प्रवृत्ति जोरों पर है। कुछ फीसदी लोग आज भी हैं जिन्हें कोई कहे या न कहे, अपने काम पूरी ईमानदारी के साथ किया करते हैं, अनुशासन और संस्थान की साख बढ़ाने के लिए निरन्तर प्रयत्नशील रहते हैं और रोजी-रोटी देने वाले व्यक्तियों और संस्थानों के प्रति वफादारी में कहीं कोई खामी नहीं रखते।

पर कामचोरों और लाभ पाने की मनोवृत्ति को तरजीह देने वाले व्यापारिक मानसिकता वाले लोगोंं की दिनों दिन बढ़ती जा रही संख्या की वजह से अब इन लोगों को लगता है कि वे जो कुछ कर रहे हैं वह उनके अधिकार हो गए हैं।

लगभग सभी स्थानों पर काम नहीं जानने वाले, जानने के बावजूद काम नहीं करने वाले और टाईमपास करते हुए महीना निकाल देने वाले लोगों की गरिमामय उपस्थिति बढ़ती जा रही है। इंसान ने स्वाभिमान, सिद्धान्त और संवेदनाओं को खो दिया है, अब धंधेबाजी ज्यादा है। बेचा और खरीदा जा सकता है।

इसका सर्वाधिक नुकसान अच्छे लोगों और कर्मयोगियों को होने लगा है जिन्हें अपनी शालीनता, अनुशासनप्रियता और कर्मयोग में गहन रुचि की वजह से बार-बार उन्हीं के मत्थे सारे के सारे काम मढ़े जाते हैं।

अच्छे लोगों के तनावों और बीमारियों के लिए यह भी एक कारण है। हालांकि अच्छे काम आत्मसंतोष और आनंद भी देते हैं लेकिन आजकल सर्वाधिक परेशान उन लोगों को किया जाता है जो कि अच्छे काम करने वाले हैं।

काम बिगाड़ने वालों और कामचोरों को कोई नहीं पूछता क्योंकि इन लोगों के भरोसे कोई कर्म सफल नहीं हो सकता है इसलिए उन्हीं लोगों पर सारा भार डाला जाता है जो काम करने वाले हैं और अच्छे वर्करों में जिनकी गिनती आती है।

महाभारत में कर्ण, पाण्डव, अभिमन्यु और इस जैसे बहुत से पात्र हुए हैं, पूर्व और इसके बाद के युगों में भी अच्छे, सच्चे और श्रेष्ठ काम करने वाले लोग हुए हैं लेकिन सभी किसी न किसी षड़यंत्र के शिकार हुए हैं और वह भी अपनी प्रतिभा, योग्यता और ज्ञान की श्रेष्ठता के कारण।

आजकल कोई अच्छा काम करता है उसका सीधा सा अर्थ है कि उसे उठा कर कहीं भी फेंक दो, हमें तो अच्छा काम कराने से मतलब है। पहले जमाने में अच्छे काम करने वाले लोगों की अनुकूलताओं, सहूलियतों और स्थानों का खास ध्यान रखा जाता था मगर अब ऎसा नहीं रहा।

हर अच्छे काम करने वाले स्वाभिमानी और निरपेक्ष इंसान का यही अनुभव है कि उन्हें अच्छे काम का खामियाजा भुगतना पड़ रहा है। ऎसे लोगों के बारे में नीचे से ऊपर तक के सारे लोग तहे दिल से स्वीकारते और समय-समय पर कहते भी रहते हैं अच्छा काम है, मगर वो अच्छाई किस काम की, जिसकी वजह से हम स्वयं, परिवार और अपना जीवन संकट से घिर जाए।

असल में आजकल लोगों की आदत पड़ गई है कि अपने नम्बर बढ़ाने के लिए चाहे किसी का उपयोग कर डालो, उसे क्या परेशानियां हैं, यथार्थ क्या है, इस बारे में कोई सोचना नहीं चाहता है। बहुत से लोग भले ही कितने बड़े और ऊँचे ओहदों पर क्यों न हों, ये औरों की कठपुतलियों और बिजूकों की तरह काम करते हैं इसलिए इनमें न मानवीय संवेदनाओं का पुट होता है, न खुद की इच्छा से कुछ कर पाते हैं।

जितनी चाबी भरी राम ने, उतना चले खिलौना होकर रह जाते हैं। फिर जो लोग अपने से ऊपर वालों की नज़रों में सर्वोपरि, सर्वश्रेष्ठ और अन्यतम बने रहने की कोशिशों में लगे रहते हैं वे ऊपर वालों को खुश करने के लिए किसी भी हद तक जा सकते हैं, किसी की भी बलि चढ़वा सकते हैं।

आजकल दुनिया के सभी अच्छे, सच्चे और स्वाभिमानी लोग इन्हीं अनकही लेकिन रोजमर्रा की अनुभूत पीड़ाओं के साथ जी रहे हैं। यह स्थिति न समाज के लिए ठीक है, न देश के लिए।

इसका दूसरा पक्ष यह भी है कि निरपेक्ष, निःस्वार्थ और सेवा-परोपकार की भावना से जो लोग अपने कर्मयोग के प्रति समर्पित रहते हैं वे जिन्दगी भर आत्म आनंद में जीते रहते हैं। ऎसा आनंद दूसरे लोग सौ जन्मों में भी प्राप्त नहीं कर पाते।