तैयार हो रहे हैं विषधर भुजंग

आने वाला समय विषधारी भुजंगों का होगा और सभी को ऎसा प्रतीत होने लगेगा कि जैसे पाताल से नाग लोक ऊँचा उठकर धरती पर ही आ गया है।

चौतरफा हालात ऎसे ही पैदा हो रहे हैं कि जैसे भुजंगों के अवतरण की भूमिका आकार ले रही हो। सब तरफ के बाड़ों, परिसरों और गलियारों में काम, क्रोध, लोभ, मोह, मद और मात्सर्य आदि षड़ रिपुओं का इतना अधिक जोर दिख रहा है कि जैसे आदमी अब इन्हीं प्रवृत्तियों से घिरा हुआ या तो विवश है अथवा स्वार्थ और खुदगर्जी के कोहरे में ऎसा खो गया है कि उसे न तो आसमान दिख रहा है न आस-पास के लोग।

जिधर देखता है उसी का चेहरा नज़र आता है। वह कुछ भी खान-पान करता है तब अपने ही अपने आप को देखता है। कहीं कोई पका हुआ आम गिरने वाला होता है तो उसी की तरफ लपकता हुआ अपने आपको देखता है, नफा और नुकसान के आईने के सामने खड़ा होकर वह जीवन का गणित तय करता है और उसी को आधार मानकर समीकरण बिठाता है, संतुलन और अनुपात बनाए रखने के लिए गणित के तमाम सूत्रों को अपनाता है और जिन्दगी भर अपने लिए सुनहरे कयास लगाता रहता है।

इंसान अब अपने आपे में नहीं रहा। उसकी चादर भी एलास्टिक हो गई है और हाथ-पाँव भी लगता है कि च्यूंईंगम के तार की तरह खिंचने लगे हैं। खुद तो ऑक्टोपस हो ही चुका है। जिधर लाभ नज़र आता है उधर लपक कर लम्बा हो जाता है और हाथ मार लेता है, जहाँ हानि का अंदेशा हो वहाँ सिकुड़ कर ऎसा अधमरा हो जाएगा जैसे कि मर ही गया हो।

अपने बारे में तमाम प्रकार के भ्रमों को जो बनाए रखे, उसी का नाम आदमी हो गया है। आदमियों की एक जात तो ऎसी है जो खुद को अधीश्वर, ठेकेदार, जमींदार, संप्रभु और सर्वेसर्वा मान बैठी है और उन्हें लगता है कि जिन बाड़ों और गलियारों में वे काम कर रहे हैं वे उन्हीं के कहे पर चलते रहें, उन्हीं की तूती बोलती रहे और वे जो कहें-करें वही सब मानें और अनुकरण करते रहें।

चाहे वे सब कुछ उल्टा-सीधा करते रहें। एक जमाने में कहावत हुआ करती थी बाड़ खेत को खाए। अब हम उससे भी सौ कदम आगे बढ़ चले हैं, खेत को खेत वाले ही चरने और खाने लगे हैं, और खाने का तरीका भी ऎसा कि खेत का नामोनिशान तक न रहे। घर जमाई वाली बातें भी अब पुरानी हो चली हैं।

अब दफ्तर जमाई, सरकारी जमाई और गैर सरकारी जमाई, आधे-अधूरे जमाई और अन्य प्रकार के जमाई। जो जहाँ घुस गया वहाँ उस बाड़े को अपना समझ बैठा। लोग-बाग इस तरह पेश आ रहे हैं जैसे कि सब कुछ उनके बाप-दादा उन्हीं के लिए छोड़ गए हों।

राम नाम जपना भी नहीं और पराया माल अपना मानकर उपभोग करना। न घर-परिवार के लिए, न समाज के लिए जीना, न देश के लिए कुछ करने का विचार। जिस कदर हमें अपने काम-धंधों और अपने रोजगारी परिसरों से अंधा मोह होने लगा है उसे देख कर लगता है कि कुछ सालों बाद इन परिसरों में ही हमें धरती के भीतर या किसी कोने में डेरे ढूँढ़ने पड़ेंगे क्योंकि हमारी अंधी आसक्ति और मोह का जो परिचय हम दे रहे हैं उसे देख कर यही लगता है कि हमें यहीं कुण्डली जमा कर बैठना पड़ेगा।

जिधर देखें उधर इंसानों की यह अंधमोही प्रजाति दिखाई देने लगी है जिनके बारे में कहा जाता है कि या तो वे अपने-अपने डेरों में ही भूत-प्रेत बनकर फिरते नज़र आएंगे या भी महाविषधर भुजंग के रूप में इधर-उधर सरकते हुए।

लगता तो यह है कि आने वाला समय विषधरों का ही होगा क्योंकि जिस पैमाने पर इनकी भूमिका तैयार हो रही है वह अपने आपमें भयावह होने का आभास करा रही है। अपने आस-पास भी ऎसे बहुत से लोग हैं जिनके बारे में भूत-प्रेत या विषधर बनने की संभावनाएं बनी हुई हैं।

पूत के लक्षण पालने में और आने वाले जनम के लक्षण वर्तमान जन्म में अंकुरित होते दिख ही जाते हैं। जो लोग अनाधिकारी हैं उन्हें अधिकारों का व्यतिक्रम और अतिक्रमण छोड़ने पर ध्यान देना चाहिए और आसक्ति तथा अंधा मोह त्यागने की पहल करनी चाहिए अन्यथा तैयार रहें भूत-प्रेत योनि पाने के लिए अथवा स्थानमोही विषधारी जिन्दगी के लिए। जैसी करनी – वैसी भरनी। इस भ्रम में भी न रहें कि सर्पयोनि में मणिधारी किस्म ही प्राप्त होगी।

2 comments

  1. Mahesh Chandra Joshi

    Sir prenaspad abhivyakti h.nice article