ग्राम्य श्रद्धा का केन्द्र – जोईड़ा बावजी धाम

ग्राम्य जनजीवन में लोक देवताओं व लोक देवियों का अहम् स्थान है। आम ग्रामीणों की श्रद्धा और विश्वास के प्रतीक ऎसे कितने ही छोटे-मोटे श्रद्धास्थल ग्रामीण क्षेत्रों में विद्यमान हैं जो दिखने में भले ही छोटे हैं मगर ग्रामीणों की आस्था के बड़े धामों में इनकी गिनती होती है ।

       इन ग्राम्य धामों में प्रतिष्ठित मूर्तियाँ श्रद्धा केन्द्र होने के साथ ही आम ग्रामीणों के लिए संरक्षक और ग्राम्य रक्षक देव के रूप में भी प्रसिद्ध रही है। ग्रामीणों की समस्याओं व पीड़ाओं के निवारण के लिहाज से ये धाम ग्रामीणों की आत्मीयता के भी केन्द्र हैं।

       इसी तरह का आस्था स्थल है – जोईड़ा बावजी का मंदिर। यह प्रतापगढ़ जिले की सुहागपुरा ग्राम पंचायत अन्तर्गत छायण गांव के समीप पिपलीपठार मार्ग पर हरियाली भरे वातावरण के बीच अवस्थित है। जोईड़ा बावजी के इस मंदिर के प्रति भक्तों में अगाध श्रद्धा व आस्था है।

       मंदिर के सेवक, जोईड़ा बावजी के अनन्य भक्त बगदीराम गुर्जर बताते हैं कि याें तो जोईड़ा बावजी अपने दरबार में आने वाले हरेक भक्त की सभी प्रकार की मनोकामनाएँ पूरी करते हैं तथापि मनुष्यों व पशुओं  में बीमारी अथवा ग्रामीण क्षेत्रों में मौसमी बीमारियों का प्रकोप होने, सर्पदंश या जहरीले जानवरों के काटने आदि से सम्बंधित पीड़ाओं का निवारण करने में जोयड़ा बावजी का कोई जवाब नहीं ।

       बगदीराम बताते हैं कि काफी बरस पूर्व एक बार गांव में पशुओं की बीमारी हो गई। तब मेवाड़ के फतहनगर में स्थित मुख्य धाम से जोईड़ा बावजी को न्यौता देकर यहाँ लाया गया। तभी से यह मंदिर जनास्था का केन्द्र है। खुद बगदीराम को जोईड़ा बावजी के भार आते हैं। इसके लिए कोई निश्चित वार नहीं है बल्कि श्रद्धालुओं की जरूरत के अनुसार जोईड़ा बावजी के भाव आते हैं। वे नीम की डाली से झाड़ा डालते हैं और करवणी देते हैं।

       दीवाली के दूसरे दिन प्रतिपदा को इस मंदिर  पर मेला भरता है। इसमें दूर-दूर से श्रद्धालु आते हैं व आस्था अभिव्यक्त करते हैं। इस दिन मंदिर में अवस्थित हवन कुण्ड में  घी का होम होता है। संतति की कामना वाले श्रद्धालु मनोकामना पूरी होने पर मंदिर में पालना बँधवाते हैं।

       मंदिर के गर्भगृह में एक अधिष्ठान पर दो मूर्तियां स्थापित हैं। जिन पर पानीये चढे़ हुए हैं। मंदिर में रोजाना पूजा-अर्चना व दीप का विधान अर्से से चल रहा है। बाहर चौगान में यज्ञकुण्ड के समीप  भैरवजी का छोटा सा स्थान है। मंदिर परिसर व आस-पास के माहौल को बेहतर बनाने की दिशा में निरंतर प्रयास चल रहे हैं। मंदिर परिसर के बाहर बाँयी तरफ प्राचीन मूर्ति रखी है। सदियों पुरानी यह मूर्ति पुरातात्विक दृष्टि से महत्त्वपूर्ण है। यहीं परिसर की दीवार से सटा चीरा भी स्थापित है।

       पशुओं के बीमार होने पर जोयड़ा बावजी के मंदिर से करवणी (अभिमंत्रित जल) लेकर पशुओं पर छिड़क दिया जाता है अथवा पिला दिया जाता है। लोक मान्यता है कि इससे पशु ठीक हो जाते हैं।

       इसी प्रकार के जोईड़ा बावजी के स्थानक अन्य स्थानों पर भी हैं जहाँ के क्षेत्रवासियों की इनके प्रति अगाध आस्था के भाव हिलोरें लेते हुए देखे जा सकते हैं।  इन स्थलों पर विभिन्न अवसरों पर होने वाले आयोजन और मेले जनास्था का अच्छी तरह दिग्दर्शन कराते हुए प्राणी मात्र के कल्याण की भावना का संचरण करते हैं।

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