आचरण में लाएं उपदेश

इन दिनों सबसे अधिक भीड़ किसी की है तो वह है उपदेशकों की। ये उपदेशक बस्तियों, कॉलोनियों और चौराहों से लेकर सुनसान जंगलों तक हर कहीं बिखरे हुए हैं। सभी प्रकार के मीडिया और सोशल मीडिया पर उपदेशकों की अनियंत्रित और बेलगाम बाढ़ आयी हुई है।

ज्ञानी भी उपदेशों की कृत्रिम बारिश करने पर तुले हुए हैं और अज्ञानी, कामचोर व निकम्मों से लेकर वे सारे लोग उपदेशों के प्रसार में भिड़े हुए हैं जिन्हें और कोई काम आता ही नहीं, इसलिए उपदेशों के जरिये अपने आपको जिन्दा रखने तथा अपने वजूद को मान्यता देने के प्रयासों में लगे हुए हैं।

उपदेश देने वालों के लिए कोई मर्यादा या सीमा रेखा अथवा बंधन नहीं हैं। कोई भी किसी भी तरह का उपदेश देने को स्वच्छन्द है। चोर-डकैत और भ्रष्ट-रिश्वतखोर लोग खुद तो बिना डकार लिए जम कर खा-पी रहे हैं और दूसरों को ईमानदारी का पाठ पढ़ाने लगे हैं। दुनिया के सारे कामचोर हम सभी को कर्तव्यपरायणता के भाषण झाड़ रहे हैं।  बेवक्त संसार में आ धमके और कभी समय पर काम नहीं ेकरने वाले समय की पाबन्दी की हिदायतें देने लगे हैं।  मूर्ख, भौन्दू और नाकारा लोग अपने आपको कर्मयोगी सिद्ध करने के लिए धींगामस्ती और धौंस के सहारे अपनी खोटी चवन्नियां चला रहे हैं।

हद दर्जें के निकम्मों और कामचोरों से लेकर छोटे-बड़े सभी प्रकार के उपदेशकों से ये संसार भरा पड़ा है। इन उपदेशकों का एक ही काम रह गया है- चाहे जिसके बारे में टिप्पणी करना और उपदेशों की बौछार करते रहना।  यह जरूरी नहीं कि ये उपदेशक पढ़े-लिखे, विद्वान, अनुभवी या शोधार्थी ही हों। उपदेशकों के लिए ज्ञान, अनुभव और आयु  का कोई बंधन नहीं है।

उपदेशक कोई भी हो सकता है। छुटभैयों और उठाईगिरों से लेकर नाकारा, नुगरे, व्यभिचारी, भ्रष्ट, कामचोर और निकम्मों तक, पढ़े-लिखों से लेकर बुद्धिजीवियों तक और छोटों से लेकर बड़े और भारी भरकम कहे जाने वाले लोग भी उपदेशक हो सकते हैं। इनके लिए जात-पाँत और लिंग का भी कोई भेद नहीं है। स्त्री और पुरुष से लेकर वे भी उपदेशक हो सकते हैं जिन्हें इन दोनों में भी नहीं रखा गया है।

उपदेशों के संसार में कूद जाने मात्र से ही इंसान को अपने आपके परम बुद्धिशाली होने का अनुभव होने लगता है। इस सोच के चलते आजकल हर कोई हर क्षेत्र में कूद पड़ता है।  बुद्धिजीवियों की कई सारी किस्में हमारे आस-पास और साथ हैं। इनमें बुद्धिबेचक, बुद्धिपिशाच और दुर्बुद्धियों से लेकर खूब सारी प्रजातियां हैं जिनका मानना है कि वे न होते तो संसार मेंं बौद्धिक सम्पदा का अकाल ही पड़ जाता।

ये उपदेशक नंग-धडंग भी हो सकते हैं और विचित्र वेशभूषाधारी या फैशनपरस्त भी। युवा, प्रौढ़ और बुजुर्गों से लेकर वे भी हो सकते हैं जिनकी आसन्न श्मशान यात्रा के कयास लगाए जाते रहे हैं।

उपदेशक होना सहज सुलभ है और इन उपदेशकों के लिए कहीं कोई लक्ष्मण रेखा की मर्यादा नहीं है। ये जिसके बारे में चाहें कह सकते हैं, बोल सकते हैं और अपनी अ-मूल्य राय भी दे सकते हैं।

हमारा सौभाग्य है कि और इलाकों की ही तरह हमारी अपनी पुण्य धरा पर भी हर क्षेत्र में उपदेशकों की बाढ़ अब बनी रहने लगी है। उपदेशकों के लिए यह भी जरूरी नहीं कि ये पुरुषार्थी हों या हराम की खाने वाले।

उपदेश देने में माहिर लोगों को भले ही आम लोग खिसके हुए दिमाग का कहें या महान बुद्धिमान, हकीकत में यह एक मनोरोग है जिसका शिकार आम आदमी को अपने पूरे जीवन में कई-कई बार होना ही पड़ता है।

उपदेश देना और लेना यों अच्छी बात है मगर बेवजह उपदेशों की बौछार करना और बेमौके करना सरासर बेमानी ही है। उपदेशकों के मुँह चलते ही रहते हैं और इनकी वाणी का प्रवाह बना ही रहता है सिवाय नींद में होने के। नींद में बोल नहीं निकलेंगे तो सपने देखेंगे और बड़बड़ाएंगे जरूर। दाद तो इनके घरवालों को देनी होगी जो इन्हें जाने कितने अर्से से झेल रहे हैं और इनकी मुक्ति के लिए ईश्वर से रोज प्रार्थना करते रहे हैं।

उपदेशकों के लिए धाराप्रवाह बोलना सबसे बड़ा गुण है, भले ही इन धाराओं का कोई अर्थ न निकले। मगर यह तो मानना ही पड़ेगा कि उपदेशकों का जीवन औरों के लिए ही बना होता है।

इनका स्पष्ट मानना है कि ईश्वर ने यह सदा-बकवासी शरीर जगत के कल्याण के लिए ही दिया है। रोजाना दिन और रात में ये उपदेशक कितना कुछ उपदेश दे जाते हैं इसका उन्हें भी कोई भान नहीं रहता।

उपदेशकों के लिए उनके द्वारा की जाने वाली अभिव्यक्ति उनका अनुभव नहीं होता बल्कि जमाने भर से रोजाना जमा होती रहने वाली बातें ही हैं जो दूसरे उपदेशकों से उन्हें प्राप्त होती रहती हैं।

उपदेशकों के लिए हुँकारा भरने वाले भी चाहिएं, जिनकी वजह से इन्हें नई ताकत और ताजगी का अहसास हमेशा होता रहता है। यही कारण है कि दुनिया भर के उपदेशक समूहों में इधर-उधर बंटे हुए धरती का बोझ बढ़ा रहे हैं। दुर्भाग्य यह है कि गधों से भी कम अक्ल रखने वाले लोग उपदेशकों के रूप में ऎसे-ऎसे लोगों को सलाह दे रहे हैं जिनका बौद्धिक स्तर कहीं ऊँचा और शुभ्र है।

आम तौर पर बेवजह उपदेश देने का काम वे ही लोग करते हैं जो या तो काम करते-करते पस्त हो गए हैं, जीवन से थक गए हैं अथवा किसी न किसी प्रकार से कामचोर और निकम्मे हैं।

जो लोग जीवन में कुछ नहीं कर पाते हैं वे भी उपदेशों के जरिये अपनी सत्ता की ताल ठोंकते रहते हैं। उपदेश देने वालों में वे भी पीछे नहीं रहते हैं जिनकी पूरी जिन्दगी परायों का माल उड़ाने में लगी रहती है।

अपने इलाके में भी ढेरों ऎसे लोग हैं जिनका काम ही उपदेश देना रह गया है और आए दिन ये लोग किसी न किसी के बारे में कुछ कहते हुए उपदेशों से नहला देने का सामथ्र्य रखते हैं।

जो लोग भारी हैं, अनुभवी और ज्ञान-वृद्ध हैं उनके लिए उपदेश देना मायने रखता है और ये लोग पात्र लोगों को ही उपदेश देना जानते हैं जबकि दूसरी किस्म के वे लोग जो निरूद्देश्य मानव देह धारण कर चुके हैं, उनके लिए तो उपदेश ही हैं जिनसे उनकी आयु बनी हुई है वरना कभी के खटिया पकड़ चुके होते या लोग उनकी तेरहवीं या बरसी मना चुके होते।

इन उपदेशकों को चाहिए कि वे अपना ज्ञान और उपदेश अपने पास रखें और जिन्हें जरूरत हो उन्हें ही दें अथवा उन अच्छे कामों को करें जो वे जीवन भर नहीं कर पाए हैं।

जो उपदेशक अपने सम्पर्क में आएं, उनसे दूरी बनाए रखें क्योंकि मनुष्य को वही ग्रहण करना चाहिए जो शुद्ध, अनुभवातीत हो या जीवन के लिए उपयोगी। बेवजह उपदेश देने वालों का पूरा आभामण्डल ही प्रदूषित रहता है इसलिए उन्हें सुनना और उनका सामीप्य पाना दोनों ही अपने लिए आत्मघाती होते हैं।

ऎसे उपदेशकों को उन लोगों के नाम-पते दीजियें जो इनकी ही तरह भौंकते रहने और भटकने के आदी हैं ताकि ये परस्पर अपनी जिन्दगी को जैसे-तैसे पूर्ण कर अपने परिजनों को श्राद्ध के सुस्वादु भोजन और पकवान का आनंद दे सकें। इन उपदेशकों के लिए ही कहा गया है – पर उपदेश कुशल बहुतेरे।

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