भरने दो पाप का घड़ा

भरने दो पाप का घड़ा

बहुत सारे हैं जिनके बारे में कहा जाता है कि इन लोगों ने अति कर दी है, फिर भी भगवान देख नहीं रहा, खुले साण्डों की तरह घूमते हुए सब कुछ चर रहे हैं या हिरणियों की तरह कुलाँचे भरती हुई दुनिया को भ्रमित भी कर रही हैं और नचा भी रही हैं।

अच्छे लोग भरपूर मेहनत के बाद भी बेचारे अभावाें और समस्याओं का सामना कर रहे हैं और दुष्ट लोग धींगामस्ती और मौजमस्ती ऎसे पा रहे हैं जैसे कि इन्हें विरासत में मिली हो या कि ऊपर से लिखवा के लाए हों।

बहुत से हैं जो हराम कमाई कर रहे हैं, लूट-खसोट और बेईमानी मचा रखी है, अपनी ही तरह के गुर्गों को जमा कर तमाशा बना रखा है। न कोई अनुशासन, मर्यादा और संस्कार हैं, न इनकी कोई सीमा रेखाएं।

हर जगह हाथ-पाँव पसारे ऎसे घुस जाते हैं जैसे कि इनके बाप-दादा इनके लिए ही विरासत में ये सब छोड़ कर गए हों। सारा अनुशासन, मर्यादाएं और संस्कार बेचारे सज्जनों के ही भाग में लिखे हैं।

दुर्जनों के लिए कहीं कोई वर्जना नहीं है जैसे कि ये दुनिया का शोषण करने के लिए ही पैदा हुए हैं, असुरों की तरह फ्री-स्टाईल जिन्दगी चलाने के लिए ही इनका अवतरण हुआ हो या फिर भगवान ने चारों युगों के तमाम असुरों को कलियुग में ही भेज दिया हो।

धर्म, न्याय, नीति और सत्य का कोई वजूद ही नहीं रहा है। दुनिया के सारे लम्पट, चोर-उचक्के, बेईमान, लूटेरे, भ्रष्ट, कमीशनखोर, दलाल और षड़यंत्रकारियों का इतना अधिक जमावड़ा हर तरफ पसरा हुआ है कि इन्हें और इनकी हरकतों को देख कर विश्वास करना ही पड़ता है कि वाकई कलियुग परवान पर है।

दुर्भाग्य यह है कि ऎसे नुगरे, नालायक और हरामखोर लोग  उपदेशक और मार्गद्रष्टा बने हुए जहाँ-तहाँ किसी न किसी गलियारे में चकाचौंध के बीच मौज उड़ा रहे हैं। न कोई मेहनत, न ज्ञान या हुनर, दो-चार भैंसा छाप जन्तुओं की पूँछ के बालों की मूँछ बनाकर लोग क्या से क्या नहीं कर रहे हैं।

कोई अपनी चवन्नियां चला रहा है तो कोई खोटे सिक्कों को उछाल उछाल कर तमाश दिखा रहा है। एक इंसान के रूप में जितने गुणधर्म होने चाहिएं उन्हें छोड़कर ये लोग किसी न किसी दुकान के आगे अपने मालिक की दुकान चलाने के लिए आकर्षण और पारस्परिक खुशहाली के मुखौटै और मूर्तियाँ बनकर खड़े हुए अपने आपको ऎसे जता रहे हैं जैसे कि वे ही मालिक हों या फिर इनके मालिक गधे और मूर्ख हैं, और इस दुकान में केवल उन्हीं की चलती है।

जब-जब भी कहीं सज्जनों का समागम होता है वहाँ एक ही यक्ष प्रश्न चर्चा में रहा करता है कि हमारे आस-पास से लेकर दुनिया में तमाम दुष्ट और आसुरी विचारों, नर पिशाचों के स्वभाव वाले लोग मजे मार रहे हैं, उन्हें कोई पूछता तक नहीं चाहे वे जिस थाली में खा रहे हैं उसी में छेद करते रहें, अपने परिसरों और बाड़ों का माल उड़ाते रहें, जहाँ दाँव लगा वहाँ झटके से हाथ साफ कर डालते हैं, कमीशन का खुला खेल खेलते रहें और अपनी किस्म के कुत्ता छाप लोगों को हराम का खिलाते-पिलाते रहें और अपना बनाए रखें ताकि उनके लिए सुरक्षा घेरे या सिक्योरिटी वालों की तरह पेश आ सकें।

सज्जनों के मन में यही आशंकाएं बार-बार उठती रहती हैं कि इन शोषकों, संवेदनहीनों और मानवीय मूल्यों के निर्मम हत्यारों को आखिर कुछ क्यों नहीं हो रहा जबकि इतने सारे पाप ये लोग रोज करते रहते हैं।

लोगों को यह भी लगता है कि बहुत सारे पापी अभी भी बिना किसी काम के धरती पर बोझ बने हुए पड़े हैं, आखिर ऊपरवाला इनका लेखा-जोखा भूल तो नहीं गया।

यह विषय इतना अधिक विस्तृत है कि इसे चर्चाओं और शब्दों में समेटा नहीं जा सकता इसलिए जहाँ और जब भी इस विषय पर चर्चा होती है आधी-अधूरी ही रह जाती है। सनातन शाश्वत वाक्य है – हरामी हारेगा। और दुनिया में कोई सा हरामी ऎसा नहीं बचा है जो हारा न हो।

जो लोग अन्याय, धौंस और शोषण के बूते जीतने का दंभ रखते हैं वे अपने जीवन में एक समय ऎसा आ ही जाता है जब सब कुछ हार जाते हैं, यहाँ तक कि अपनी जिन्दगी भी। भगवान के घर देर है अंधेर नहीं। उसका न्याय करने का अपना विचित्र विधान है जिसे समझ पाना सामान्यजन के बस की बात नहीं।

ईश्वर पापियों को ठिकाने लगाने के लिए हर काम ऎसा करता है जिससे कि निर्णायक अन्त भी हो जाए और निमित्त भी कोई दूसरा ही बने। ईश्वर का नाम तक बीच में न आए। और इसके लिए जरूरी है कि पापात्मा के खाते में इतने अधिक पाप चढ़ जाएं कि वह अपनी करनी से ही फल भुगतने को विवश हो जाए।

एक सीमा तक दुष्ट लोग अपनी मनमानी करते रहते हैं और इससे उनके सिर पर पापों का बोझ बढ़ता और चढ़ता चला जाता है। जब तक पापों का यह घड़ा पूरा नहीं भर जाता तब तक ये लोग उच्छृंखल, स्वेच्छाचारी, मदमस्त और उन्मुक्त होकर भोगों को भोगते रहते हैं और इस अवस्था में दूसरे लोगोंं को यह मलाल रहता है कि यह कैसा ईश्वरीय न्याय है जहाँ अच्छे लोग अपमानित, प्रताड़ित और पीड़ित होते हैं और हरामी एवं दुष्ट लोगों की सदैव मौज उड़ी रहती है।

पापियों और दुष्टों के लिए हमेशा-हमेशा के लिए दण्ड और यंत्रणाएं भोगने के द्वार भगवान तब खोलता है जब इनके पाप का घड़ा पूरा भर जाता है। इसके बाद किसी न किसी को निमित्त बनाकर भगवान इन पापियों को शेष पूरे जीवन के लिए पाप भोगने की दिशा में धकेल दिया करता है।

घड़ा भर जाने के बाद ये लोग जो पीड़ा भोगना आरंभ करते हैं उसका कभी अंत नहीं होता। उनके घड़े मेें संचित पापों का फल वे इस जन्म में पूरा न कर पाएं तो आने वाले जन्मों तक यह पाप का फल भोगने का अनथक दौर बना रहता है।

आज जो लोग दुष्ट बने हुए खूंखार और हिंसक जानवरों की तरह व्यवहार कर रहे हैं उन सभी का आने वाला कल इतना भयंकर पीड़ादायी होने वाला है कि जिसकी कल्पना भी नहीं की जा सकती।

इसलिए सज्जनों को चाहिए कि वे अपनी सज्जनता, धर्म, सत्य, नीति और न्याय के मार्ग पर चलते रहें और पापियों के बारे में सोचना छोड़ दें क्योंकि वे तभी तब मौज में रहने वाले हैं जब तक घड़ा भर नहीं जाता।

एक बार घड़ा भर गया तो फिर तबाही का दौर शुरू होगा ही। प्रतीक्षा करें इनके धड़े भरने की। ईश्वर का न्याय ईश्वरीय है और उसके विधान की थाह कोई नहीं पा सकता। लेकिन इतना अवश्य है कि जो दुराचारी और दुष्टात्मा हैं वे कुकर्मों और पाप का फल भोगे बिना ऊपर नहीं जा सकते। कलियुग में सारा न्याय यही और एक ही जनम में होता है। आगे-आगे देखते जाईये होता है क्या।