खूब सारे पशु हैं अपने आस-पास

व्यक्तित्व के समग्र विकास में सकारात्मक ऊर्जा का महत्त्व सर्वोपरि है। इसी एकमात्र ताकत के बलबूते कोई भी व्यक्ति जीवन की ऊँचाईयों को सहजता से प्राप्त कर सकने का सर्वोच्च सामथ्र्य प्राप्त कर लेता है।

सकारात्मक ऊर्जा के साथ ही चित की निर्मलता होने पर व्यक्ति में वह सामथ्र्य आ जाता है कि वह अपने सम्पर्क में आने वाले हर इंसान की प्रवृत्ति को महसूस करने लगता है।

सकारात्मक ऊर्जा से सम्पन्न व्यक्ति के शरीर का आभामण्डल व्यापक और शुद्ध होता है और ऎसे में जब भी कोई नकारात्मक या बुरा व्यक्ति उसके समीप आता है, आभा मण्डल स्वयं दूर से भाँप कर मस्तिष्क को स्पष्ट इंगित करता है कि उचित दूरी बनाए रखें। इसे पूर्वाभास या आत्मा की आवाज कुछ भी कह लें।

समाज में खान-पान, वृत्तियॉं और लोक व्यवहार सब कुछ बदलता जा रहा है। इंसानियत की बजाय सम्पर्क, परिचय और रिश्तों में लाभ-हानि और स्वार्थ की भूमिकाएँ निर्णायक होती जा रही हैं। धन, पद और प्रतिष्ठा की ऎषणाओं के मकड़जाल में उलझे आदमी पर चौतरफा नकारात्मक भावों की प्रधानता हावी होती जा रही है। ऎसे में स्वाभाविक तौर पर समाज में नकारात्मकता वाले लोगों का बाहुल्य होता जा रहा है। यह स्थिति सभी जगहों पर है। शायद ही कोई सौभाग्यशाली बाड़ा या क्षेत्र इनसे अछूता रह गया होगा।

इन नकारात्मक लोगों को सुधारने या ठीक करने की कोशिश में की जाने वाली हर प्रकार की गतिविधि या क्रिया-प्रतिक्रिया का कोई असर नहीं हो पाता क्योंकि इनमें विध्वंस और विघ्न उत्पादन की जड़ें इतनी गहरे तक समायी होती हैं कि इन लोेगों में परिवर्तन लाना आमतौर पर असफल ही रहता है।

इसलिए अच्छा यह है कि इनके परिष्करण में अपना समय गँवाने की बजाय इनका खात्मा करने के सारे रास्ते खुले रखें ताकि जल्द से जल्द जमाना इनसे मुक्ति पा ले, और ये जीवात्माएं भी उस लाईन में आ जाएं जहाँ भगवान को यह निर्णय करना होता है कि मनुष्य के रूप में विफल रहने वाले और हिंसक बन जाने वाले इन लोगों को आखिर किस योनि में पैदा करे।

भगवान को पता होता है कि ये जीवात्माएँ फिर से इंसान होने लायक तो नहीं हैं लेकिन उसके सामने यह भी संकट बना रहता है कि किसी पशु की योनि में धरा पर भेज दे तो आजकल सरेआम और गुपचुप खाने वाले सभी तरह के इंसानों का कोई भरोसा नहीं, पता नहीं कब किसी जानवर को समय से पहले ही खा जाएं और फिर इन आत्माओं के लिए भगवान को मेहनत करनी पड़े।

इसकी तोड़ भी भगवान के पास है। वह इन आत्माओं को पशु बनाने की बजाय मनुष्य के रूप में ही धरा पर भेज देता है। भगवान यह अच्छी तरह जानता है कि कुछ इंसान बिना कुछ किए-धराए पूरी मौज-मस्ती के साथ जीने के गुर सीख ही जाते हैं और इस तरह इनके जीवन निर्वाह या पोषण के संकट जैसी कोई समस्या नहीं होती।

यही कारण है कि हमारे आस-पास और साथ में रहने तथा हमारे सम्पर्क में आते-जाते रहने वाले लोगों में खूब सारे लोग केवल जिस्म से इंसान लगते हैं, इनका कोई सा स्वभाव, व्यवहार और कर्म इंसान जैसा नहीं होता बल्कि पशु ही दिखते हैं।

ये लोग नॉन स्टॉप जुगाली करते रहते हैं, अभक्ष्य भक्षण और अपेय पान के साथ इनकी हरकतें ही ऎसी रहती हैं कि जिन्हें देख कर लगता है कि कोई किसी को सिंग मार रहा है, कोई लात, कोई दाँतों से काटने के लिए पीछे दौड़ता रहता है, कोई बिना किसी कारण से भौंकता रहता है, कोई छीना-झपटी करता रहता है, कोई हराम का माल खाने-पीने और मुफत में सारे मजे लूटने के लिए मरे जा रहा है। यानि की दुनिया के तमाम जंगलों के जानवरों  की हरकतों को हम इन इंसान शरीरों में देख और अनुभव कर सकते हैं।

इन्हें या तो अपने सस्ते मनोरंजन का साधन मान लें अथवा पशु रूप में ही स्वीकारते रहें। इन्हें बदलने के लिए अपना समय न गँवाये। आप यह मान लें कि इनमें से कईयों का पशुभाव उनके पूर्व जन्म से चला आया है, कई हराम की कमाई मुफ्त के खाने-पीने या चमचागिरी अथवा अपराधिक प्रवृत्तियों से कमा खा रहे हैं और इस वजह से पशुभाव आ गया है। ऎसे लोगों के पास विषयुक्त दंत, नख ,सिंग आदि भले ही न हो, इनके पद उन सभी से भरे हैं। इन पशुभावों की वजह से उनके रग-रग में नकारात्मक भावों का संचरण अहर्निश बना ही रहता है।

समाज में व्याप्त इन तमाम विषम परिस्थितियों के बीच जीवन लक्ष्य को पाने और आत्मीय प्रसन्नता के साथ जीवनयापन का सुकून प्राप्त करने का एकमात्र उपाय यही है कि नकारात्मक प्रवृत्तियों वाले लोगों से उचित दूरी बनाए रखें। क्यों कि इनका निरंतर सम्पर्क भी हमारे सकारात्मक आभा मण्डल को भेदने के लिए काफी है। इन्हें अपने आभामण्डल के पांच-दस फीट दूर ही रखना चाहिए।

अपनी रोजमर्रा की जिन्दगी में कई लोग ऎसे मिलते हैं जो हमेशा नकारात्मक विचारों की अभिव्यक्ति में मशगुल रहते हैं।  इनके पास जाने पर किसी के भी लिए मीठे बोल नहीं निकलते। जब ऎसे नकारात्मक लोगों का समूह बन जाता है तब उनकी बैठकों की तुलना किन्ही पशुओं के बाड़े से करें, तो सब कुछ अपने आप समझ में आ जाएगा। भगवान से यह भी शिकायत कभी न करें कि इन लोगों को मनुष्य का शरीर क्यों दिया।

ये नकारात्मक लोग अपने स्वार्थ पूरे हों या न हो, स्थानीय से लेकर दुनिया जहान तक की खबरों का पोस्टमार्टम करते रहकर गिद्दों की तर्ज पर नुख्स निकालने का आनंद लेते हैं। इनके साथी-संगी भी इन्ही की तरह मेढ़किया टर्र-टर्र करते रहते हैं। अपना लाभ हो न हो, सामने वाले का नुकसान कैसे हो, यही मूलमंत्र है।

नकारात्मक लोगों का नकारात्मक लोगों में समरसता का भाव खूब गहते तक होता है। इसमें कोई छोटा-बड़ा नहीं होता। न आयु की, जाति का भेद, न पद का।  नकारात्मक लोगों का बंधुत्व भाव प्रगाढ़ होता है। खान-पान से कहीं ज्यादा कैलोरी इन्हें  अपने रोजाना के बकवास और मिथ्या श्रवण से ही मिल पाती है।

इन हालातों में अपने आपको इनसे बचायें रखने के भरपूर प्रयत्न ही हमें सकारात्मक बनाए रख सकते हैं। नकारात्मक लोग चाहे कितने ही लोकप्रिय, प्रतिष्ठित माने जाते हो, कितने ही बड़े ओहदे पर हो ,इनसे किनारा कर लेना चाहिए। यह संभव न हो तो इनसे दूरी बनायें रखें। अन्यथा अपने स्वर्ण पात्र को ये लोग कूड़ा दान बना देने की हरचंद कला में माहिर होते हैं।

नकारात्मक प्रवृतियों वालों से उलझ कर या उनके बारे में सोचकर अपना अमूल्य समय जाया न करें। उनकी तो जिन्दगी ही पशुभावों के साथ गुजरनी हैं क्यों कि अगले जन्म की कोई पशु योनि या हरामखोर इंसानी प्रजाति उनकी प्रतीक्षा कर रही होती है। इनके पीछे अपने समय की बलि न चढ़ायें।  सकारात्मक सोच के साथ अच्छे से अच्छे काम करते रहें। हमारा यह जन्म भी सुधरेगा और अगला जन्म तो वैसे ही सुधरना है ही।

1 thought on “खूब सारे पशु हैं अपने आस-पास

  1. शानदार लिखा है आचार्य जी

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