बिकने लगे हैं लोग

हम सभी लोग ईश्वर की अनकृति और अंश है और इस दृष्टि से हम सभी अमूल्य हैं लेकिन इस विलक्षण खासियत को हम सभी भूल जाते हैं और मरते दम तक यह अहसास ही नहीं कर पाते कि हमारा क्या मूल्य है और कौन हमारे मूल्य को आँक सकता है।  हमारे मूल्य को आँक पाना किसी के लिए संभव नहीं है क्योंकि हममें से हरेक इंसान अनमोल है।

मूल्य और मूल्यांकन दोनों वह महत्त्वपूर्ण कारक हैं जिन्हें हर वस्तु और व्यक्ति का पैमाना तय करने के लिए जरूरी समझा जाता है। हर व्यक्ति और विचार मूल्यवान है और इसका मूल्य तभी तक है जब तक कि इसका समुचित उपयोग हो। इसके बगैर न वस्तु का कोई मूल्य है, न व्यक्ति का।

मूल्य तय करने के लिए समाज के पास खूब सारे पैमाने हैं, कई सारे समीकरण हैं और ढेरों कसौटियाँ, जिन पर खरा उतरने के बाद ही मूल्यांकन का स्पष्ट निष्कर्ष सामने आ पाता है। आजकल आदमी का मूल्य अपने-अपने ढंग से आँका जाता है।

जीने का मजा और आनंद तभी है कि जब हम अपने आप को जानें। नहीं जान पाएं तो फिर हम भी सांसारिक वस्तुओं की तरह मूल्यों में उतार-चढ़ाव से लेकर मूल्यहीनता के दौर में पेण्डुलम की तरह पूरी की पूरी जिन्दगी गुजार दिया करते हैं।

कई बार तो हमारा मूल्य पशुओं से भी कम हो जाता है और कई मर्तबा या तो हम खुद बार-बार अलग-अलग बाजारों में बिकने को तैयार हो जाते हैं अथवा कोई दूसरा हमें हर बार बेचता और खरीदता रहता है। अक्सर ही हम बिकते रहते हैं।

एक बार बिकने का दौर शुरू हो जाए तो फिर हम सारी शरम छोड़कर बार-बार बिकते रहते हैं और हमारे लिए हर मण्डी में खरीदार भी उपलब्ध रहते हैं जो काम पड़ने पर खरीद लेते हैं और काम पूरा हो जाने के बाद किसी और के हाथों हमें बेच दिया करते हैं।

सबसे बड़ा कारक तत्व यही है कि जो आदमी अपने काम आ सके या आने की संभावना हो, वह मूल्यवान है। और इन्हीं मूल्यवानों में कई सारे बड़े लोग होते हैं जो अपने आप स्वयंभू अमूल्य हो जाते हैंं। पहले जमाने में लगातार आत्मचिंतन और मनन करते हुए आदमी अपने आप में सुधार लाने की सारी गुंजाइशों को खुला रखता था और सुधार लाने का निरन्तर प्रयास भी करता था।

उसे अपना मूल्य अच्छी तरह पता होता था तथा वह ऎसे कर्मों में निरन्तर लगा रहता था कि उसका मूल्य निरन्तर बढ़ता हुआ व्यक्तित्व इतना विराट हो जाए कि समाज के लिए वह अमूल्य थाती बन सके। उस समय आत्मचिंतन अनिवार्यता था और इसी वजह से आदमी अपने पैमानों को बनाकर उस पर चलने की कोशिश भी करता था।

और यही वजह है कि आत्मचिंतन के निष्कर्षों का सारभूत तत्व समझ कर वह अमूल्य बन जाता था। आदमी में अपने आपको हर दृष्टि से, खासकर समाज और राष्ट्र के लिए मूल्यवान होने और अमूल्य होने की सारी क्षमताएं विद्यमान थीं।

आजकल आदमी को न अपना पता है, न अपने मूल्य का। न ही उसमें वह सामथ्र्य है कि अपना सामथ्र्य नाप सके। आजकल आदमी का मूल्यों से रिश्ता कुछ विचित्र होता चला जा रहा है और यही कारण है कि आज का आदमी मूल्यहीनता का शिकार होकर समाज के लिए निरुपयोगी ज्यादा साबित होने लगा है, भले ही खुद अपने आपको कितना ही मूल्यवान या अमूल्य क्यों न समझ बैठे।

वर्तमान में कुछ बिरले किस्म के लोगों को छोड़ दिया जाए तो मूूल्य और आदमी का रिश्ता रहस्यों की परतों से घिरता जा रहा है जहाँ आदमी और उसके मूल्यवान होने पर हमेशा शक की सूइयाँ घूमने लगी हैं। आजकल आदमी का मूल्य अपने आपको पता नहीं है।

आदमी के लिए परिवेशीय व्यामोह और ऎषणाओं के मकड़जाल ही तय करते हैं मूल्य। आदमी का पूरा चरित्र ही ऎसा हो गया है कि उसका मूल्य शेयर मार्केट या सैंसक्स ही तरह गिरता-उठता रहा है और यही वजह है कि आदमी अपनी कामनाओं और क्षुद्र स्वार्थों में रमते हुए पेण्डुलम ही हो गया है।

अब आदमी का मूल्य वह खुद नहीं बल्कि और लोग तय करते हैं। ये वही लोग हैं जो आदमी को कभी पशु की तरह चलाते हैं, कभी अपने जायज या नाजायज कामों के लिए इस्तेमाल करते हैं और कभी औरोें के लिए इस्तेमाल होने के लिए निर्देशित कर खुला छोड़ देते हैं। जब से आदमी अपने आपको बेचने लगा है तब से जाने कितनी मण्डियाँ खुल गई हैं जहाँ आदमी को खरीदा जा सकता है, कभी अपने स्वार्थ में आदमी खरीदा जाता है तो कभी किसी दूसरे के स्वार्थ से, कभी प्रलोभन से तो कभी दबावों से।

आदमी की खरीद के कई नायाब नुस्खों और तिलस्मों का पूरा-पूरा वजूद हमारे आस-पास भी है और दूर-दूर तक भी। कुछ ही लोग हैं जो न बिकते हैं न किसी को खरीदने की कोशिश करने में विश्वास रखते हैं। खूब सारे लोग ऎसे हैं जो हमेशा बिकने के लिए तैयार रहते हैं।

इनका एकसूत्री उद्देश्य होता है अपने स्वार्थ को पूरा करने के लिए किसी भी हद तक बिक जाना या अपने आपको सौंप देना। ऎसे लोगों के लिए न कोई लाज-शरम होती है, न लोगों के उलाहनों का कोई भय, और न ही और किसी प्रकार का कोई संदेह।

ऎसे लोग अपने लाभ के लिए नंगे होने की किसी भी सीमा को पार कर सकते हैं और पार कर गुजरते हैं। न परिवार का भय, न समाज का। इनकी जिन्दगी में इनके स्वार्थ से ऊपर कुछ नहीं होता। माँ-बाप, गुरु और कुटुम्बी भी नहीं, फिर औरों की तो इन्हें क्या परवाह?

एक बार किसी छोटे से काम के लिए इन्हें कोई खरीद लेता है फिर इनके बिकने का दौर हमेशा के लिए आरंभ हो जाता है और जिन्दगी पूरी होने तक बना रहता है। जो लोग ऎसे बिकने वालों को खरीदना जानते हैं वे इनकी कमजोरियों का भी अच्छी तरह पता रखते हैं और इन्हें खरीदने के नुस्खों को आजमाते रहते हैं।

कभी मुद्राओं से खरीदने की कोशिश करते हैं, कभी कुछ तो कभी कुछ से। बिकने वालों की अपने यहाँ कहाँ कमी है?  फिर आजकल तो खरीदार और बिकने वालों दोनों की भरमार है। जो लोग अपना मूल्य समझते हैं वे अमूल्य ही रहते हैं और ऎसे लोगों को खरीदने का कोई दुस्साहस तक नहीं कर सकता, ऎसे लोग खुद भी किसी कीमत पर बिकने को तैयार नहीं होते और जो भी चुनौतियाँ सामने होती हैं उन्हें सहर्ष स्वीकार कर लिया करते हुए मस्ती से जीवन जीते हैंं।

वास्तव में ऎसे ही लोग अमूल्य हुआ करते हैं और इन्हीं का समय अमूल्य होता है। उन लोगों का नहीं जो अपने आपको बड़ा मान लेते हैं या लोग जिन्हें बड़ा मान लेते हैं, और जिनके बारे में कहा जाता है कि अमूल्य समय निकाल कर पधारे हैं।

जो खरीदार हैं वे भी अमूल्य नहीं हो सकते क्योंकि आदमी को अपने स्वार्थ के लिए खरीदना और इस्तेमाल करना भी मानवता और धरा का अपमान है। अपने आस-पास ऎसे बिकाऊ और खरीदार लोगों को देखने पर साफ पता चल जाता है कि ये लोग न मनुष्यता के पोषक हैं, न धर्म और समाज या क्षेत्र के लिए हितकारी।

बल्कि ऎसे लोग काम, क्रोध, लोभ और मोह से ग्रस्त ऎसे व्यापारी हैं जिनका अपना कोई धर्म नहीं होता सिवाय अपने स्वार्थ के। आने वाला समय उन्हीं को याद करता है जो अमूल्य बने रहते हैं। वे लोग तो जीते जी ही भुला दिए जाते हैं जो बिकने और खरीदने के आदी होते हैं। अपना मूल्य पहचानें और अमूल्य बने रहें, इसी में है जीवन की सफलता।