बचें महादरिद्र योग से –  असुरों के अवतार हैं पीक-थूँक पसारने वाले

बचें महादरिद्र योग से – असुरों के अवतार हैं पीक-थूँक पसारने वाले

आज हर तरफ वास्तु शास्त्र और वास्तु दोषों की चर्चा छोटे से छोटे मोहल्ले, गली, गाँवों और कस्बों से लेकर शहरों तथा महानगरों तक हो रही है। जिस अनुपात में वास्तु दोषों की चर्चा हो रही है उसी अनुपात में वास्तुविदों और वास्तु ज्योतिषियों की भरमार भी है और नई-नई फसलें भी पैदा हो रही हैं।

वास्तु के नाम पर अब हजारों किताबें छप कर बाजार में आ गई हैं, टीवी और दूसरे तमाम माध्यमों पर वास्तु के नाम से चर्चाओं के बाजार हमेशा गरमागरम रहने लगे हैं।

देश में हजारों लोगाें के लिए वास्तु ने रोजगार के नवीन द्वार खोल दिए हैं जिनमें पूंजी लगाए बगैर पूंजी बनाने के सारे करतब और तमाम प्रकार की लोक-लुभावनी करामातों और तिलस्म का भरपूर दिग्दर्शन हो रहा है वहीं दूसरी ओर वास्तु के नाम पर लोक जीवन और परिवेश में भय फैलाकर तमाम प्रकार के पदार्थ जगत की वस्तुओं की खरीद-फरोख्त का भी अपना लम्बा-चौड़ा बाजार उछालें मार रहा है।

पण्डे-पुजारियों, पण्डितों और ज्योतिषियों से लेकर मांत्रिकों, तांत्रिकों, बाबाओं, टोने-टोटके बाजों और तमाम प्रकार के धर्माधिकारियों व धर्म के नाम पर ठेकेदारी चलाने वाले भी इस मामले में मजानबूझकर मौन साधे हुए हैं जबकि यह हरेक आदमी के जीवन के लिए सबसे बड़ा दोष है जिसे वास्तु दोष से भी अधिक भयंकर माना गया है।

हम चाहे कितने ही अधिक समृद्ध और प्रभावशाली क्यों न हों, यदि यह एक आदत हमारा पीछा नहीं छोड़ पा रही है तो निश्चित मान कर चलियें कि यह पैसा और प्रभाव कुछ समय का ही है, फिर हमारी स्थिति दुनिया के आलसी, प्रमादी और निस्तेज लोगों में होनी ही है।

हमारी यह आदत वैयक्तिक दोष भी है और वास्तुदोष भी। कोई सी कॉलोनी, भवन, संस्थान, दफ्तर, कंपनी, प्रतिष्ठान और काम-धंधों के स्थल या दुकान आदि चाहे कितने ही वास्तुशास्त्रीय सिद्धान्तों के अनुसार वास्तु के हिसाब से परिपूर्ण क्यों न हों, इनमें वास्तुदोष से तभी  तक मुक्ति का अहसास हो सकता है जबकि इन भवनों और परिसरों की शुचिता अर्थात पवित्रता बनी रहे।

भवन व उससे जुड़े हुए समस्त परिसरों का वास्तु शुचिता के समाप्त होते ही बिगड़ने लगता है। इस तथ्य को न तो धंधेबाज तथाकथित वास्तु शास्त्री बताते हैं, न बाबा, पण्डित और ज्योतिषी या दूसरे लोग जो धर्म, समाज और देश के उद्धार का ठेका लिए हुए हैं।

कोई सा भवन और इसके परिसर चाहे कितने सुन्दर हों, अनाप-शनाप पैसा ही क्यों न लगा हो, उसमें रहने, काम करने वाले और आने-जाने वाले लोगाें में जहाँ-तहाँ थूँकने, तम्बाकू और पान-गुटखों की पीक करने की लत लग गई हो, उन परिसरों और भवनों की शुचिता भंग हो जाती है और फिर वहाँ सब तरफ गंदगी और झूठन-लार पड़ी और पसरी होने से दैवीय शक्तियाँ वहाँ एक पल भी रहना पसन्द नहीं करती, एक-एक कर सभी सकारात्मक और ऊर्जावान शक्तियाँ वहाँ से पलायन कर जाती हैं और जाते-जाते इन पान-गुटखा और तम्बाकू की पीक करने वालों तथा बिना किसी कारण से दिन-रात में सौ-सौ बार थूँकते रहने की लत पाले हुए लोगों को श्राप देकर जाती है।

इस श्राप का परिणाम यह होता है कि भवन और परिसरों का कोना-कोना और हवा-हवा अपवित्र एवं दुषित हो जाती है और नकारात्मक शक्तियाँ तथा अनिष्टकारी ऊर्जाएँ उस भवन तथा परिसर एवं आस-पास पसरने लगती हैं।

इनका दुष्प्रभाव इन भवनों के वास्तु और उपयोगिता पर तो पड़ता ही है, इनमें रहने और काम करने तथा आने-जाने वाले लोगों की जिन्दगी का सुकून भी छीन जाता है। इन अपवत्रिता और शुचिताभंग होने से दैवीय ऊर्जाओं का क्षरण इनकी लक्ष्मी का हरण कर लेता है, कोई न कोई ऎसी बीमारी दे डालता है कि ये लोग जिन्दगी भर डॉक्टरों और अस्पतालों के चक्कर काटते हुए अन्ततः असमय ही काल के गाल में समा जाते हैं।

जिन भवनों और परिसरों में जगह-जगह थूंक, पीक आदि दिखाई देता है उनका वास्तु भंग हो जाता है चाहे ये करोड़ों की कीमत के ही क्यों न हों। वास्तुपुरुष इन अपवित्र हो चुके भवनों को धराशायी करा देने के तमाम जतन करना शुरू कर देता है क्योंकि उसे इन अपवित्र और दूषित स्थानों पर रहना पसंद नहीं होता।

इन भवनों का ओज-तेज और प्रभाव इनके निर्माण के दो-तीन साल बाद ही खत्म हो जाता है यदि थूक और पीक का डेरा पसरा हुआ हो। बहुत से भवनों की बरबादी के लिए इनमें रहने वाले और काम करने वाले लोग जिम्मेदार होते हैं क्योंकि उनमें गुटखा-तम्बाकू और पान चबाने की आदत होती है और ऎसे लोग अपनी पीक को अधिक देर तक मुँह में रख पाने का धैर्य नहीं रख पाते इसलिए जहाँ मन किया वहीं पीक कर दिया करते हैं।

इसके अलावा कुछ फीसदी लोग दुनिया में हमेशा से ऎसे सनकी रहे हैं जिन्हें बिना किसी कारण से कुछ-कुछ मिनट में थूकने की लत पड़ी होती है।

पीक करने वाले और थूकने वाले लोगों का जीवन भी अफलातून, गंदगी और आलस्य-प्रमाद भरा होता है और इनके जीवन तथा हरकतों को देखा जाए तो इस  बात से आश्चर्य होता है कि ये लोग इंसान भी हो सकते हैं क्या। कभी इनमें कोई सा जानवर नज़र आता है और कभी कोई सा नरपिशाच या राक्षस। इनकी शक्ल देखकर ही घिन आने लगती है जब ये कभी जुगाली करते दिखते हैं, कभी मुँह पिचका कर पीक की धार छोड़ते हुूए।

पता नहीं इन लोगों के इनके उत्तमांग और घर वाले कैसे बर्दाश्त करते होंगे। सच तो यही है कि जो लोग गुटखा और तम्बाकू खाते हैं उनके लाईफ पार्टनर और पर््रेमी-प्रेमिका यदि इनसे प्यार करते हैं तो यह स्पष्ट मान लें कि या तो यह उनकी मजबूरी है अथवा कोई न कोई स्वार्थ। अन्यथा गुटखा और तम्बाकू की दुर्गन्ध से भरे मुँह न किसी को प्रेम दे सकते हैं न आत्मीयता।

नब्बे प्रतिशत महिलाएं ऎसे पुरुषों से घृणा करती हैं जो गुटखा-तम्बाकू के शौकीन हों। शेष दस प्रतिशत प्रतिशत महिलाएं भी वही हो सकती हैं जो इन्हीं की तरह गुटखा और तम्बाकू का शौक फरमाती हों, शराबी, या प्रोफेशनल दुव्र्यसनी हों।

पीक-थूंक वाले संस्थानों, परिसरों, भवनों, कार्यस्थलों, आवासों का भविष्य कुछ साल के भीतर खराब होने लगता है और इनमें रहने और काम करने वालों पर भी इसका अनिष्टकारी प्रभाव पड़ना शुरू हो जाता है।

अधिकांश लोगों और संस्थाओं के अपयश और बीमारू या दिवालिया हो जाने के पीछे यही सबसे बड़ा कारण है जिसकी हम सभी लोग जानबूझकर अनदेखी करते जा रहे हैं।

अपना विकास चाहें, अपनी संस्थाओं और संस्थानों की तरक्की चाहें, अपने घरों और कार्यस्थलों की खुशहाली चाहें, खुद की सेहत चाहें तो उन लोगों से दूरी बनानी आरंभ कर दें जो तम्बाकू-गुटखा चबाते हुए पशुओं की तरह जुगाली करते रहते हैं और बिना किसी वजह से थोड़ी-थोड़ी देर में थूँकने की आदत पाल लेते हैं।

अपने परिसरों और भवनों को पीक एवं थूँक से मुक्त रखें। कहीं ऎसा न हो कि कुछ गन्दी मछलियों और गैण्डों-घड़ियालों के कारण से पूरा तालाब बरबाद हो जाए।

One comment

  1. Rajender Prasad Agarwal

    सर,बहुत अच्छा विषय लिया है जिसके परिणाम और परिमाण दोनों की गंभीरता को लगातार नज़रअंदाज़ किया जा रहा है। ऐसी मानसिकता और अंधविश्वास के लिए एक प्रसिद्ध लेखिका ने अपने आलेख का शीर्षक दिया था
    ‘दरिद्री देश का दिमागी दलद्दर’
    सटीक एवं बेहतरीन प्रस्तुतीकरण।
    बधाई एवं शुभकामनाएं
    राजेन्द्र प्रसाद अग्रवाल