अक्षय तृतीया पर विशेष – लीमथान का प्राचीनतम परशुराम धाम

जहाँ आज भी होते हैं भगवान परशुराम के दर्शन

दुनिया का प्राचीनतम परशुराम तीर्थ है लीमथान गांव में। राजस्थान के ठेठ दक्षिण में पर्वतीय अंचल बांसवाड़ा जिले के लीमथान गांव में स्थित इस मन्दिर में सदियों पुरानी परशुराम प्रतिमा है। DSCN4341श्वेत पाषाण से निर्मित सुन्दर परशुराम मूर्ति ओजस्वी है जिसके दर्शन से आत्मीय आनंद की अनुभूति होती है और सारे विकार तिरोहित होकर भक्त अपने आपको दैव कृपा से अभिभूत महसूस करते हैं। नदी के किनारे, पहाड़ों के बीच भगवान परशुराम का यह धाम एकान्त में होने से भले ही प्रचार नहीं पा सका हो लेकिन जो भी यहां आता है वह इस दिव्य धाम को कभी नहीं भूल सकता। हर सच्चा भक्त यहां आकर भगवान परशुराम की कृपा पाकर लौटता है। इसके सामने ही भगवान श्रीकृष्ण का मन्दिर है जिसमें काले पत्थर पर भगवान की सुन्दर मूर्ति है। यह मूर्ति भी अत्यन्त प्राचीन है। कृष्ण मन्दिर के जीर्णोद्धार का काम अब हो रहा है।  हर वर्ष परशुराम जयन्ती पर यहाँ भक्तों का तांता लगा रहता है। इस बार परशुराम जयन्ती के उपलक्ष में रविवार से चार दिवसीय अनुष्ठान शुरू हुआ। पहले दिन भक्तों ने दर्शन किए और परशुराम स्तोत्र, मंत्र आदि का अनुष्ठान किया।

बुजुर्गों का अनुभव है कि साधकों को यहाँ चंद सैकण्ड के लिए भगवान श्री परशुDSCN4322रामजी के दिव्य दर्शन होते हैं। इसकी अनुभूति मुझे भी दस वर्ष पूर्व हुई थी जब मैं अपने गुरुदेव ब्रह्मर्षि पं. महादेव शुक्ल को अपनी मोटरसाईकिल पर बिठाकर मन्दिर की ओर जा रहा था कि नदी पार करते हुए दिव्य विभूति दिखी जो बाद में हरे-भरे खेतों में ओझल हो गई है। ब्रह्मषि पं. महादेव शुक्ल ने तो कई बार दिव्य दर्शन पाए। यही कारण था कि साल भर में कई बार वे एकान्तिक साधना के लिए परशुराम धाम आते और दिन भर साधना करते।

भगवान परशुरामजी का यह मन्दिर पूरे देश में गौरव पा सकता है यदि इसके विकास और इसके आस-पास हरीतिमा विस्तार के लिए कुछ किया जाए।  लीमथान के ही कुछ भक्त परिवार इस दिशा में निरन्तर सहयोग कर रहे हैं। उन्हें सम्बल प्रदान करने की जरूरत है।