मंगतों की पंगत

आजकल संबंधों के कई सारे प्रकार हमारे सामने हैं। अब कई तरह के नवाचारी संबंध हैं जिनमें आंशिक से लेकर आधे-अधूरे और विकृत-व्यभिचारी संबंधों को समाहित किया जा सकता है।

पहले संबंध मानवता के पोषक हुआ करते थे आजकल इन संबंधों का स्वरूप बदल कर स्वार्थ और कारोबारी मानसिकता ने ले लिया है।

अब संबंधों में मानवीय मूल्य, संवेदनशीलता और परमार्थ आदि तमाम परम्परागत मूल्यों का पलायन हो चुका है और इन सभी संबंधों की बजाय एक ही संबंध रह गया है और वह है कि कारोबारी संबंध।

इंसान दूसरे इंसान से आजकल बात भी करता है तो वह तभी जबकि उसे कुछ न कुछ लाभ हो, किसी न किसी प्रकार की स्वार्थ सिद्धि की उम्मीद हो अथवा भविष्य में कोई सा काम पड़ने वाला हो।

बहुत कम लोग अब ऎसे पाए जाते हैं जो कि बिना किसी स्वार्थ से मानवीय रिश्तों का परिपालन करते हुए एक-दूसरे को सहयोग करते हैं, दुःखों के निवारण और अभावों तथा समस्याओं से मुक्ति दिलाने में मददगार साबित होते हैं तथा सदैव शुभचिन्तक की भूमिका में ही रहा करते हैं और शुभ-शुभ ही चिन्तन करते हुए लोक मंगलकारी स्वभाव और निष्काम कर्मयोग का दिग्दर्शन कराते हैं।

अन्यथा बहुत सारे लोगों की भीड़ तो ऎसी ही है जो लाभ-हानि और भविष्य की आशाओं-आकांक्षाओं और मांग-आपूर्ति को देखकर ही संबंध बनाती है और जिन्दगी भर इसी एक सूत्र के आधार पर चलती रहती है।

इन हालातों को देखकर कहा जाए कि घोर कलियुग का यह समय ही ऎसा आ गया है कि आदमी आदमी न रहकर कारोबारी या कबाड़ी-जुगाड़ी हो गया है।

जिन लोगों को हम देखते हैं उनमें अधिकतर इंसान नहीं बल्कि छोटा-मोटा कियोस्क, ठेला या परचूणी की दुकान ही नज़र आते हैं।

बहुत सारे लोग हैं जिनके लिए किसी भी प्रकार के कोई से संबंधों का कोई मायना नहीं होता। इन लोगों का सिर्फ और सिर्फ पैसों से ही संबंध होता है। इसके अलावा ये न अपने माँ-बाप के हो सकते हैं, न अपने उत्तमांग के, बच्चों के या फिर कुटुम्बियों के।

हालात ये हो चले हैं कि लोगों के सामने कोई पैमाना नहीं रहा। जो पैसा दे वो अपना, जो न दे पाए वो पराया, चाहे कितना ही निकट का क्यों न हो। और पैसा न मिले तो ऎसा कुछ मिल जाए तो देह को आनंद देने वाला हो।

सब तरफ लूटने वाले लोग इतने अधिक बेशर्म हो चले हैं कि टुच्चे भिखारियों की तरह दिन-रात मांगते ही नज़र आते हैं। ये लोग उनसे भी जबरन मांग लिया करते हैं जो इनके करीबी और शुभचिन्तक होते हैं।  पता नहीं लोग इतने अधिक नंगे-भूखे, बदहवास और लज्जाहीन क्यों होते जा रहे हैं।

किसी जमाने में विदेशियों की नज़र में हमारा मुल्क सपेरों और मदारियों का माना जाता था। लगता है कि मंगतों की संख्या इसी तरह बढ़ती रही तो आने वाले समय में सब जगह इतने अधिक मंगते हो जाएंगे कि भिखारियों का देश कहीं न कहा जाने लगे।

दुर्भाग् केवल यही है कि ये मंगते खुद को भिखारी मानने को तैयार ही नहीं हैं।  सब तरह की जायज-नाजायज मांग करने वाले ये लोग खुद को ईमानदार, परिश्रमी और कर्मयोगी सिद्ध करने में’ भी पीछे नहीं रहते। इन्हें लगता है कि वे ही हैं जो नीचे आधार देते हुए बैलगाड़ी चला रहे हैं, वरना कुछ नहीं हो पाता।

इस शाश्वत सत्य को स्वीकार करने में कोई हिचक नहीं होनी चाहिए कि हम सभी लोग किसी न किसी प्रकार के भिखारियों से त्रस्त हैं या फिर उनसे घिरे हुए हैं। इस मामले में कोई छोटा-बड़ा नहीं है।

बड़े-बड़े समृद्ध और प्रतिष्ठित कहे जाने वाले लोग भी घटिया दर्जे के मंगतों और उठाईगिरों की तरह व्यवहार कर रहे हैं और छोटे-छोटे फुटपाथी भिखारी भी बड़े-बड़े भिखारियों से तुलना कर रहे हैं।

जब हर तरफ भिखारियों को बोलबाला हो तब कौन पंगा मोल ले इन लोगों को भिखारी कहकर। हर चौराहे, रास्ते और बाड़े-गलियारे में भिखारी ही नज़र आ रहे हैं।  पहले भिखारियों का उद्घोष वाक्य था – जो दे उसका भला, न दे उसका भला।

अब नई सदी के भिखारी निर्णायक भूमिका में हैं। कुछ न दो तो काम बिगाड़ दें, कबाड़ा कर डालें फिर भी अपराध बोध का अहसास न करें। इन लोगों के लिए भीख मांगना इनका जन्मसिद्ध अधिकार है और भीख लेकर ही रहेंगे।

भीख नहीं मिले तो सारा प्रवाह रोक लें, स्पीड़बे्रकर बन कर रास्ते में अड़ जाएं और तब तक बाधाएं खड़ी करते रहें जब तक इन नंगे-भूखों को भीख न मिल जाए। एक जमाना था जब इंसान पुरुषार्थ की कमाई के सिवा किसी पर विश्वास नहीं करता था।

समय बदला और चुपके से ऊपरी कमाई का दौर आरंभ हुआ। अब तो सरेआम यह कमाई ली जाने लगी है और बिना किसी हिचक के। भिखारियों के डेरों में न शर्म है, न लज्जा। हर किसी से ये ले उड़ते हैं भीख, और वह भी कभी पूरा अधिकार जता कर, तो कभी जोर-जबरदस्ती से।

अब सज्जनों की बजाय लोग भिखारियों से डरने लगे हैं और उनकी आवभगत करने लगे हैं। हर एक भिखारी दूसरे भिखारी का पूरा आदर-सम्मान करता हुआ साथ देता है और साथ निभाता है।

इन भीखमंगों को वैयक्तिक संबंधों, आत्मीयता और सामाजिक तथा आंचलिक सरोकारों से कोई संबंध नहीं होता। इन्हें पैसा चाहिए चाहे कहीं से भी आए। डरा-धमका कर आए या काम अटका कर।

हालात इतने अजीबोगरीब हैं कि आजकल भिखारी इतने अधिक वैभवशाली हो गए हैं कि ब्याज पर धन चलवा रहे हैं, फाईनेंस में पैसा लगवा रहे हैं और मालामाल हो रहे हैं। हालांकि यह भी सच है कि ये भिखारी चाहे कितने अधिक समृद्ध, वैभवशाली और प्रतिष्ठित हो जाएं, लोग दिल से इन्हें कभी भी प्रतिष्ठित नहीं मानते बल्कि इनकी निगाह में ये भिखारियों से भी गए-बीते होते हैं।

हमारे साथ और आस-पास भी ऎसे लोगों की कोई कमी नहीं है जो कि नीच और हीन किस्म के मंगतों से कम नहीं हैं। इन लोगों को सब कुछ हराम का चाहिए।

लोग इन भिखारियों से पारस्परिक आत्मीय संबंधों की आशा रखते हैं और जिन्दगी भर इस भ्रम में जीते रहते हैं कि ये भिखारी उनके शुभचिन्तक, सहयोगी और आत्मीय हैं।

जबकि हर भिखारी सामने वालों के इन्हीं भ्रमों को आधार बनाकर जिन्दगी भर शोषण करता रहता है और भीख जमा करता हुआ खुद को वैभवशाली मानता रहता है। अपने जीवन में संबंधों के सच को जानने की आवश्यकता है ताकि कौन अपना है, कौन पराया है, इसका निर्णय हम स्वयं के बूते कर सकें और भिखारियों से दूरी बनाए रख सकें।

जो लोग भिखारियों से किसी भी प्रकार का खान-पान और रोटी-बेटी या मुद्रा व्यवहार रखते हैं उन्हें भी दोष लगता है। भिखारियों के साथ-साथ रहते और साथ निभाते हुए ये लोग भी खुद भिखारीपन को अपना कर मंगतों की पंगत में शामिल हो जाते हैं।

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