दीप से दीप जलाते चलो ….

दीपावली रोशनी का पर्व है और यह संदेश देता है कि न केवल हमारा जीवन बल्कि सभी का जीवन आलोकित बना रहे, परिवेश में उजाला बना रहे और कहीं भी अँधेरे का नामोनिशान न रहे। दो-चार दिन दीप जलाकर रोशनी कर देने का कोई औचित्य नहीं है यदि हमारे अन्तर्मन में दीवाली के दीपों का संदेश साल भर न बना ... Read More »

वागड़ अंचल को गर्व है नवाचारी सृजनधर्मी शिक्षिका ऊषा पण्ड्या पर …

सुनहरा भाग्य लिखती है हर लकीर … लकीरों का कमाल अपने आप में इतना अधिक करामाती और तिलस्मी होता है कि यह अक्षर ब्रह्म की आराधना का आरंभिक चरण है। बांसवाड़ा जिले की होनहार शिक्षिका श्रीमती ऊषा पण्ड्या ने अपने मौलिक हुनर के बूते जिस तरह लकीरों से अक्षरों और वर्णों की दुनिया को नवीन आयाम दिए हैं, यह अपने ... Read More »

मनः सौन्दर्य ही देता है आकर्षक रूप-रंग

पूरी दुनिया रूप की दीवानी है। भारतीय संस्कृति में तो दीवाली और धनतेरस के बीच का पूरा दिन ही रूप की आराधना को समर्पित होकर रूप चौदस या रूप चतुर्दशी के नाम से जाना जाता है। धर्मशास्त्रीय महत्व के साथ ही यह पर्व रूप-रंग निखारने के लिए प्रसिद्ध है। आजकल इंसान के लिए गुणों, हुनर, ज्ञान और अनुभवों से लेकर ... Read More »

असली धन तो ये है

धन के मामले में हमारी सोच आज भी विकसित नहीं हो पायी है। धन और लक्ष्मी के मामले में हमने यही मान लिया है कि मुद्रा, आभूषण और जमीन-जायदाद ही धन हैं और जीवन के लिए ये ही सब सर्वोपरि हैं। इस धन को समझने के लिए एकमात्र शब्द निधन पर गंभीरता से सोचना चाहिए। धन वह है जो निधन होने से पूर्व हमें प्राप्त था। इसमें न केवल धन-दौलत, जमीन-भवन, स्वर्ण-रजत आभूषण या और कुछ ही धन नहीं है बल्कि धन है हमारा जीवन, प्राणों का ... Read More »

जो आजमाएं सो निहाल- सेहत और समृद्धि पाने का अनूठा दीवाली टोटका ….

दीपावली पर उपहारों, मिठाइयों और भेंट-पूजा से पाएं नई जिन्दगी दीपावली पर दो तरह के लोगों की भरमार रहती है। एक तरफ वो बहुसंख्य लोग हैं जिनके लिए यह विवशता होती है कि अपने बॉस-बॉसियों, आकाओं, कल्याणकारी समाज की नवरचना के लिए ही पैदा हुए मध्यस्थों और लोकपूज्य माने जाने वाले महान और बड़े लोगों को खुश करने के लिए ... Read More »

हिलने लगी है बुनियाद

सब तरफ अनिश्चितता का दौर व्याप्त हो गया है। आदमी का कोई भरोसा नहीं रहा। कभी इधर कूद पड़ता है कभी उधर। हर तरफ उछलकूद का जमाना है। किसी को सूझ नहीं पड़ रही है कि आखिर क्या करे और क्या न करे। जब से आदमी अपनी जड़ों से कट गया है, गाँव और संस्कृति से दूर हो गया है, ... Read More »

आकर्षित न हों, खुद में जगाएँ आकर्षण

सृष्टि का हर जीवन्त तत्व एक-दूसरे को आकर्षित करता रहा है। यह शाश्वत स्वभाव है। स्वजातीय वस्तुओं, व्यक्तियों, विचारों और तरंगों के बीच सहज, स्वाभाविक और सनातन आकर्षण भाव रहता है चाहे उनके गुणधर्म, स्वभाव और प्रकृति के कितने ही प्रकार क्यों न हों। दुनिया के अधिकांश कर्म और व्यवहार आकर्षण पैदा  करने के लिए होते हैं। प्रकृति भी समानधर्मा ... Read More »

शैतानी ब्लेकमेलर

दुनिया की आधी से अधिक आबादी निन्दा रस के फव्वारों से आनंद पाने के लिए हमेशा उतावली बनी रहती है। खाने-पीने और सोने में इन लोगों को जितना अधिक आनंद नहीं आता होगा उतना अनिर्वचनीय और अप्रत्याशित सुकून मिलता है इन लोगों को दुनिया भर की बातों, हरकतों और दूसरों की निन्दा में। एक जमाना वो था जब लोगों को ... Read More »

हर क्षण का उपयोग करें

संसार है ही सृजन और इतिहास बनाने के लिए। भगवान मनुष्य के रूप में धरती पर हमें इसीलिए भेजता है ताकि हम पूर्वजों के संचित ज्ञान, अनुभवों और सारभूत तत्वों को आत्मसात करते हुए अपनी बुद्धि और विवेक के अनुसार पुराने के मुकाबले कुछ और नया जोड़ें ताकि जीवों और जगत के कल्याण की गति तीव्रता को प्राप्त करे। मनुष्य ... Read More »

आत्म आनंददायी है निरपेक्ष जीवनधर्म

पूरी दुनिया और इसके लोग ध्रुवीकरण को अपना चुके हैं। हर तरफ समन्वय और सामन्जस्य तथा सामूहिक विकास से कहीं ज्यादा महत्व ध्रुवीकरण का होता जा रहा है। दुनिया भर में कुछ फीसदी ही बिरले, फक्कड़ और मनमौजी स्वाभिमानी लोग होंगे जो अब तक ध्रुवों में नहीं बंधे हैं और न  ही पेण्डुलम की तरह व्यवहार कर रहे हैं अन्यथा ... Read More »