लिया ही लिया है या कुछ दिया भी है

हम क्या हैं, क्या कर रहे हैं? इसके बारे में सब जानते हैं। हमें यह बताने की आवश्यकता नहीं है कि हमारे करम किस तरह के रहे हैं या हम कैसे हैं। इसे वे सभी लोग अच्छी तरह जानते हैं जो हमारे आस-पास रहते हैं या हमें जानते हैं। इन लोगों के सामने हमें आँकने के बहुत सारे सटीक पैमाने ... Read More »

कृष्णार्पण करें मुक्त हो जाएँ

जब तक हम अपने अहंकार के बोझ के मारे दबे रहते हैं, ‘हम चौड़े और बाजार संकरा’ वाली स्थिति में जीते रहते हैं, अपने अलावा किसी और को कुछ नहीं मानते, अपने अधिकारों और शक्तियों का बेजा इस्तेमाल करते हैं, औरों पर धौंस जमाते हुए धींगामस्ती करते हैं, खुद तो चोरी-डकैती, भ्रष्टाचार, रिश्वतखोरी और व्यभिचारों में रमे रहते हैं और ... Read More »

हम सब असामाजिक हैं !

हम सारे लोग सामाजिक प्राणी की पहचान रखते हैं और कहे जाते हैं। लेकिन हमारे स्वभाव, लोक व्यवहार, रहन-सहन और जीवन जीने के रंग-ढंग को देख कर ईमानदारी से यदि सोचें और हमारी सामाजिकता के प्रतिशत का आत्म मूल्यांकन  करें तो हमें अपने आप पर शर्म ही आएगी क्योंकि हम जिस सामाजिकता और सामुदायिकता की बात करते हैं वह हमारे ... Read More »

आत्मघाती है यह मेहमानवाजी

आजकल सब तरफ चाय-नाश्ते का प्रचलन जीवन की अनिवार्यता की श्रेणी में आ चुका है। जहां जाएं वहाँ आतिथ्य सत्कार के नाम पर ड्राईंग रूम में सजी-धजी तरह-तरह की टी टेबल्स पर नाश्ता पहले से परोसा हुआ मिलता है नाश्ता करते हुए ही चर्चाओं का दौर जारी रहता है। कई लोग मन से खिलाते-पिलाते और आनंदित होते हैं। खूब सारे ... Read More »

बेवफा होते हैं कसम खाऊ

किसी भी बात की पुष्टि के लिए कसम खाना और खिलवाकर ही विश्वास जताने का सीधा सा अर्थ यही है कि जो कसम खा रहा है वह भी आत्मविश्वासहीन और विश्वासघाती है और कसम दिलवाने वाला भी। इंसान अपने आप में प्रामाणिक जीव है, वह जो कुछ बोलता है उसके लिए किसी और पुष्टि के पुट की आवश्यकता नहीं होती। ... Read More »

बेमानी हैं पर्यावरण संरक्षण की बातें

प्रकृति पूरी दुनिया पर यों ही कुपित नहीं है। अकारण ही नहीं आ रहे भयानक भूकंप, भीषण गर्मी के जानलेवा ताण्डव, असहनीय शीत के प्रकोप, बेमौसम बरसात, भयंकर बाढ़ और तबाही के खौफनाक मंजर। सूखा और अकाल भी बिना वजह के नहीं आते। सब तरफ मचा हुआ है भीषण शोर पर्यावरण की दुर्गति, प्रदूषण और मारक-घातक परिवेशीय हलचलों का। जल, ... Read More »

धरती चाहती है अपना श्रृंगार …

हमारे हाथ से रोपा गया पौधा यदि सुरक्षित पल्लवित हो जाए, तभी समझें हम पुण्यशाली हैं। अन्यथा साहस के साथ यह मान लें कि हम पापी ही हैं। जो लोग गप्पे लगा सकते हैं वे पेड़ कभी नहीं लगा सकते क्योंकि गप्पे हाँकने वाले मायावी दुनिया को लक्ष्य मानते हैं और पेड़ लगाने में रुचि रखने वाले प्रकृतिस्थ, प्रकृति और ... Read More »

संघर्ष ही निखारता है हमारा व्यक्तित्व

इंसान के लिए संघर्ष ताजिन्दगी चलने वाला वह कारक है जो जितना अधिक परिमाण में होता है उतना अधिक मजबूती देता है। संघर्ष किसी भी इंसान के लिए कभी नकारात्मक नहीं होता बल्कि वह मन-मस्तिष्क और शरीर की हर तरह की मानसिक एवं शारीरिक प्रतिरोधी शक्ति के घनत्व को बढ़ाता हुआ जड़ों को मजबूती देता है। जिसके जीवन में जितने ... Read More »

छातीकूटिए अमर रहें

आज अगर छाती कूटने वालों की गणना शुरू हो जाए तो सभी जगह बहुत से लोग मिल जाएंगे जो बिना किसी कारण के छाती पीटते रहने के सिवा कुछ नहीं करते। इनके छाती पीटने के पीछे के कारणों को तलाशा जाए तो इनकी जिन्दगी से जुड़ा एक भी कारण  ऎसा नहीं मिलेगा जिसकी वजह से इन्हें छाती कूटनी पड़े। दूसरों ... Read More »