किस काम का यह धन-वैभव

सामाजिक प्राणी वही है जो समाज और देश के काम आए। जो लोग समाज, अंचल और राष्ट्र के किसी काम न आए, वे धरती पर भार के सिवा कुछ नहीं हैं। संसार में आकर हम जो कुछ पाते हैं उसका उपभोग करते हुए संतुष्टि भी प्राप्त करते हैं और जो अतिरिक्त होता है उसे समाज को समर्पित कर खुश भी ... Read More »

इंसान में खोजें वहीं मिलेगा सब कुछ

हर जीवात्मा का संबंध पिण्ड और परिवेश से है और जब तक जिन्दगी रहती है तब तक यह शाश्वत संबंध बना रहता है। जीवन समाप्ति के उपरान्त भी आत्मा का अस्तित्व समाप्त नहीं होता क्योंकि आत्मा अमर है इसका नाश कभी नहीं होता। धरती पर भगवान ने इंसान के रूप में ऎसी सँरचना बनाई जिसमें सभी प्रकार के तत्व पूर्णता ... Read More »

अभिशप्त है ऎसा प्यार और वैराग्य

बात चाहे संसार-यात्रा की हो, प्यार की हो या वैराग्य की, इन सभी का आनंद पाने के लिए शुचिता और आत्मिक भावों की नितान्त आवश्यकता होती है। साथ में यह भी जरूरी है कि हमारे प्यार, संबंधों अथवा संन्यासी परंपरा से किसी को भी यदि आपत्ति हो अथवा कहीं विरोध हो तो उस भावभूमि को न पवित्र माना जा सकता ... Read More »

कभी न हो रिटायरमेंट

रिटायरमेंट की आयु सीमा को ही खत्म कर देना चाहिए . . . कितना अच्छा हो कि रिटायरमेंट की आयुसीमा आमृत्यु कर दी जाए। जब तब जीयें, तब तक नौकरी करते रहें। इसके बाद क्रियाकर्म और बरसी तक के सारे खर्च सरकारी मद में किए जाने की कोई योजना बनाई जाए ताकि सामाजिक सरोकारों का निर्वाह अस्तित्व रहने पर भी ... Read More »

पापमुक्ति में सहायक हैं दुष्ट और नीच सहकर्मी

भौतिकता और दिखावों से भरे मौजूदा युग में आदमी बाहरी संसाधनों, पद-प्रतिष्ठा और वैभव से परिपूर्ण होने लगा है लेकिन इसी अनुपात में भीतर से खोखला होता जा रहा है। अब न किसी पर आसानी से भरोसा किया जा सकता है और न ही किसी भी काम को दूसरों को सौंपकर निश्चिन्त हुआ जा सकता है। इसी तरह हम सभी ... Read More »

अपना योगदान दें, भागीदारी निभाएँ

आत्मकेन्दि्रत जिन्दगी और स्वार्थों की पूर्ति के लिए हर तरफ मारामारी मची हुई है और इसने सामाजिक प्रबन्धन को पूरी तरह गड़बड़ा दिया है। जो इंसान सामाजिक प्राणी के रूप में जाना जाता रहा है वह अब अपने-पराये के भेद में उलझता जा रहा है। वह अपने समूहों या कुनबों पर ही ध्यान देने के चक्कर में समुदाय और क्षेत्र ... Read More »

न करें कल की प्रतीक्षा

समय न किसी का सगा होता है, न शत्रु। हम ही हैं जो समय को पहचान नहीं पाते और इसकी बेकद्री करते रहते हैं।  जो समय की कद्र नहीं करता, समय भी उसकी परवाह नहीं करता। यह  समय ही है जो अच्छे-अच्छे आलसियों और प्रमादियों को समय से पहले ही ठिकाने लगा देता है और हालत इतनी अधिक खराब हो ... Read More »

ये पति नहीं, पतित हैं

यों तो आजकल तकरीबन तमाम संबंधों में मिलावट और घालमेल हो गया है। और यह मिक्चरी कल्चर भी ऎसा कि पता ही नहीं चल पाता कि कौन क्या है। समाजशास्त्रीय दृष्टिकोण से अध्ययन किया जाए तो हम सारे ही लोग सामाजिक प्राणी हैं लेकिन हमारे ही भीतर कई सारे लोग ऎसे हैं जो असामाजिकता के पूरक और पर्याय हो चले ... Read More »

कुपुत्रों का मोह त्यागें

मोक्ष या गति-मुक्ति पाने के लिए यह जरूरी है कि जब ऊपर जाएँ तब हमारा मन किसी में अटका न हो, न संतति और न ही सम्पत्ति, संसाधनों या जमीन-जायदाद में। अक्सर हम कृपणता का आलिंगन करते हुए जिन्दगी भर भिखारियों और दरिद्रियों की तरह बने रहते हैं और जो समय मिलता है उसमें जमा ही जमा करते चले जाते ... Read More »

यह पोस्ट केवल ब्राह्मणों के लिए है – इसलिए हो रहे ब्राह्मण दरिद्री और भिखारी

ब्राह्मणों को लोग भोजन कराते हैं इसके पीछे कई सारे कारण हैं। इनमें एक कारण यह भी है कि ब्राह्मण भोजन से पुण्य की प्राप्ति होती है। जो ब्राह्मण नित्यप्रति संध्या और गायत्री करते हैं वे तो यजमानों का भोजन अपनी तपस्या के बल पर पचा लिया करते हैं लेकिन जो लोग संध्या-गायत्री नहीं जानते या नहीं करते, वे इसे ... Read More »