फटे में टाँग न अड़ाएँ

लोगों की निगाह सामने होती है और सामने की तरफ देखकर ही जुबाँ अपने आप हलचल करने लग जाती है। अधिकांश लोगों की आदत होती…

हम आदमी हैं या आवारा ?

आजकल हर कहीं आवारा या लावारिश मवेशियों की चर्चा होती है और इन पर प्रतिबंध की बातें अक्सर छायी रहने लगी हैं। एक बात अच्छी…

सरलता न आए तो जीना है बेकार

मनुष्य का पूरा जीवन मनुष्यत्व से दैवत्व के सोपान तय करने के लिए बना होता है लेकिन समझदारी आते ही जीवात्मा मायावी संसार की भुलभुलैया…

देवतुल्य हैं हमारे बुजुर्ग

सामाजिक जीवन धाराओं में आज बुजुर्गों के प्रति नई पीढ़ी का नज़रिया बदल सा गया है। इसका मूल कारण पारिवारिक संस्कारों की कमी के साथ…

उल्लू-चमगादड़ भाई-भाई

जो भी इन्सान धरती पर पैदा हो गया, वह सामाजिक प्राणी के रूप में अपने आपको स्थापित करने का प्रयास करता ही है। समुदाय के…

भौंकू तो भौंकेगे ही

अभिव्यक्ति के लिए सबके पास अलग-अलग विधाएं हैं और इन्हें सारी प्रजातियां आपस में अच्छी तरह समझ जाया करती हैं। जलचर, थलचर, नभचर और उभयचर…