असली धन तो ये है

धन के मामले में हमारी सोच आज भी विकसित नहीं हो पायी है। धन और लक्ष्मी के मामले में हमने यही मान लिया है कि मुद्रा, आभूषण और जमीन-जायदाद ही धन हैं और जीवन के लिए ये ही सब सर्वोपरि हैं। इस धन को समझने के लिए एकमात्र शब्द निधन पर गंभीरता से सोचना चाहिए। धन वह है जो निधन होने से पूर्व हमें प्राप्त था। इसमें न केवल धन-दौलत, जमीन-भवन, स्वर्ण-रजत आभूषण या और कुछ ही धन नहीं है बल्कि धन है हमारा जीवन, प्राणों का ... Read More »

जो आजमाएं सो निहाल- सेहत और समृद्धि पाने का अनूठा दीवाली टोटका ….

दीपावली पर उपहारों, मिठाइयों और भेंट-पूजा से पाएं नई जिन्दगी दीपावली पर दो तरह के लोगों की भरमार रहती है। एक तरफ वो बहुसंख्य लोग हैं जिनके लिए यह विवशता होती है कि अपने बॉस-बॉसियों, आकाओं, कल्याणकारी समाज की नवरचना के लिए ही पैदा हुए मध्यस्थों और लोकपूज्य माने जाने वाले महान और बड़े लोगों को खुश करने के लिए ... Read More »

हिलने लगी है बुनियाद

सब तरफ अनिश्चितता का दौर व्याप्त हो गया है। आदमी का कोई भरोसा नहीं रहा। कभी इधर कूद पड़ता है कभी उधर। हर तरफ उछलकूद का जमाना है। किसी को सूझ नहीं पड़ रही है कि आखिर क्या करे और क्या न करे। जब से आदमी अपनी जड़ों से कट गया है, गाँव और संस्कृति से दूर हो गया है, ... Read More »

आकर्षित न हों, खुद में जगाएँ आकर्षण

सृष्टि का हर जीवन्त तत्व एक-दूसरे को आकर्षित करता रहा है। यह शाश्वत स्वभाव है। स्वजातीय वस्तुओं, व्यक्तियों, विचारों और तरंगों के बीच सहज, स्वाभाविक और सनातन आकर्षण भाव रहता है चाहे उनके गुणधर्म, स्वभाव और प्रकृति के कितने ही प्रकार क्यों न हों। दुनिया के अधिकांश कर्म और व्यवहार आकर्षण पैदा  करने के लिए होते हैं। प्रकृति भी समानधर्मा ... Read More »

शैतानी ब्लेकमेलर

दुनिया की आधी से अधिक आबादी निन्दा रस के फव्वारों से आनंद पाने के लिए हमेशा उतावली बनी रहती है। खाने-पीने और सोने में इन लोगों को जितना अधिक आनंद नहीं आता होगा उतना अनिर्वचनीय और अप्रत्याशित सुकून मिलता है इन लोगों को दुनिया भर की बातों, हरकतों और दूसरों की निन्दा में। एक जमाना वो था जब लोगों को ... Read More »

हर क्षण का उपयोग करें

संसार है ही सृजन और इतिहास बनाने के लिए। भगवान मनुष्य के रूप में धरती पर हमें इसीलिए भेजता है ताकि हम पूर्वजों के संचित ज्ञान, अनुभवों और सारभूत तत्वों को आत्मसात करते हुए अपनी बुद्धि और विवेक के अनुसार पुराने के मुकाबले कुछ और नया जोड़ें ताकि जीवों और जगत के कल्याण की गति तीव्रता को प्राप्त करे। मनुष्य ... Read More »

आत्म आनंददायी है निरपेक्ष जीवनधर्म

पूरी दुनिया और इसके लोग ध्रुवीकरण को अपना चुके हैं। हर तरफ समन्वय और सामन्जस्य तथा सामूहिक विकास से कहीं ज्यादा महत्व ध्रुवीकरण का होता जा रहा है। दुनिया भर में कुछ फीसदी ही बिरले, फक्कड़ और मनमौजी स्वाभिमानी लोग होंगे जो अब तक ध्रुवों में नहीं बंधे हैं और न  ही पेण्डुलम की तरह व्यवहार कर रहे हैं अन्यथा ... Read More »

शोषक नहीं, मददगार बनें

हमारे आस-पास जो लोग होते हैं उनमें से अधिकांश जरूरतमन्द होते हैं और उनकी जरूरतों के बारे में संवेदनशील रहना तथा उनकी खुशहाली व समृद्धि में हिस्सेदारी निभाना हमारा फर्ज है। जो इस फर्ज को जितनी अच्छी तरह निभाता है उतना उसके साथ वाले उससे प्रसन्न और सन्तुष्ट रहते हैं। जो इंसान अपने आस-पास और साथ वालों के सुख-दुःख और ... Read More »

न राजधरम, न राम धरम

देश की सबसे बड़ी समस्या एकमात्र यही है कि हमें जो काम करना चाहिए उसे हम न तो फर्ज मानते हैं और न ईमानदारी से करते हैं और दूसरी तरफ उन सारे कमों-कुकर्मों में पूरी दिलचस्पी लेते हैं जो  हमें नहीं करने चाहिए। कर्म, कर्महीनता और कुकर्म इन तीनों के बीच की खायी इतनी अधिक बढ़ती जा रही है कि ... Read More »

श्री अपनाएं

लोग धन-सम्पदा और संसार भर का पूरा का पूरा ऎश्वर्य पाने को तो उतावले रहते हैं लेकिन इसे पाने के लिए जिन रास्तों से होकर चलना चाहिए, उन्हें भुला दिया करते हैं। प्राचीनकाल से श्री प्राप्ति के द्वार खोलने वाला पासवर्ड रहा है श्री।  लेकिन अपनी संस्कृति और गौरवशाली परंपराओं के प्रति आत्महीनता रखने वाले मूर्खों, पाश्चात्यों के तलवे चाटने ... Read More »