अन्दर-बाहर एक रहें तभी रहेगा ओज-तेज

जो जैसा है उसे वैसा ही रहना चाहिए ।  जो अंदर से जितना अधिक शुद्ध चित्त होता है वह  उतना अधिक प्रभावशाली होता है।बचपन जैसी शुद्धता और बाल सुलभ स्वभाव यदि हमारे जीवन में हमेशा बना रहे तो हमारा आकर्षण हमेशा इतना अधिक परवान पर रहे कि हमें अपने आपको ऊँचा दिखाने और खुद को लोकप्रिय और महान साबित करने के लिए किसी भी प्रकार के सांसारिक प्रपंचात्मक नेटवर्क का सहारा लेने की कोई आवश्यकता ही नहीं पड़े।

जिसका मन बच्चों की तरह कोमल, निर्मल और शुद्ध बना रहता है वह पूरी जिन्दगी अर्थात आजीवन सुनहरी आभा से मण्डित रहता है और उसका ओज-तेज तथा आभामण्डल इतना अधिक शुभ्र बना रहता है कि हर किसी को आकर्षित करता  रहता है चाहे वह जड़ हो या जीवन्त, पेड़-पौधे हों, हिंसक और खूंखार जानवर हों या फिर किसी भी किस्म के इंसान। बुरे लोग और बुराई इनके पास फटक तक नहीं सकते।

जो सच्चे और अच्छे लोग या जीव होते हैं वे इनकी दृष्टि पाकर ही अपने आप बदल जाया करते हैं,  इनकी वाणी का प्रभाव सीधा मन पर असर करता है और रचनात्मक परिवर्तन की भावभूमि रचने से लेकर स्वभाव परिवर्तन तक की सारी क्षमताओं से युक्त रहता है।

दिव्यता और ईश्वरीय प्रवाह के बीच सीधा रिश्ता होता है। जो जिस अनुपात में मन-कर्म और विचारों से दिव्य, शुद्ध और सत्यवादी होता है वह उतना अधिक प्रभावी, आकर्षक और परिवर्तनकारी सिद्ध हो सकता है। यों देखा जाए तो चित्त की शुद्धता हर इंसान के लिए जरूरी है लेकिन हर कोई ऎसा कर पाए, यह संभव नहीं हो पाता। एक-दो फीसदी को छोड़कर शेष सारे इंसान अपनी क्षमताओं और अपने भीतर समाहित दैवीय ऊर्जाओं से अनभिज्ञ रहा करते हैं और इस कारण दूसरों पर आश्रित रहने के आदी हो जाते हैं।

यहीं से शुरू हो जाती है इंसान की शुचिता भंग होने की यात्रा । तब उसे हर बार औरों पर आश्रित रहने को विवश होना पड़ता है तथा दूसरों के पालतु या आश्रित के रूप मेंं दया, करुणा और कृपा पर पलने की स्थितियां पैदा हो जाती हैं। इन कामों के लिए पग-पग पर तरह-तरह के नाजायज  और वीभत्स समझौते भी करने पड़ते हैं और जाने कैसे-कैसे घृणित असंतुलित समीकरण भी बिठाने को विवश होना पड़ता है।

अपने स्वार्थ और ऎषणाओं को लेकर किए जाने वाले शुचिताहीन कर्म की वजह से हमारी जिन्दगी अपना स्वाभाविक और मौलिक आकर्षण खो देती है और इसके बाद चक्र शुरू हो जाता है हमारे घनचक्कर होने का।हमें छोटे-मोटे कामों और प्राप्तियों के लिए दूसरों पर निर्भर रहना पड़ता है, उनकी परिक्रमाएं करनी पड़ती हैं और आगे-पीछे घूमने को विवश होना पड़ता है जिन्हें समझदार लोग अच्छा और करणीय नहीं मानते।

बस यहीं से हमारे मन-मस्तिष्क और शरीर की मलीनताओं का वह दौर शुरू हो जाता है जो मरने के बाद भी खत्म नहीं हो पाता। इन्हीं मलीन और दासत्व भरे संस्कारों को साथ लेकर हम मरते हैं और आने वाली योनियों तक इसे भुगतते रहते हैं।आजकल हमारी वाणी फलीभूत नहीं होने, हमारी बॉड़ी लैंग्वेज चरमरा जाने, चेहरे पर मलीनताओं की परतें जमा हो जाने तथा हमारे कर्म प्रदूषित हो जाने के पीछे यही कारण है कि हम सभी लोग मलीन होते जा रहे हैं, हमारे कर्म मैले हो गए हैं और हम जो कुछ लोक व्यवहार कर रहे हैं वह  न इंसानियत के अनुकूल है न हमारी मानवीय परंपराओं के।

और यही सब हैं जिनके कारण से हमारी शांति, आनंद और आरोग्य छीनता जा रहा है और हम सभी लोग अधिकांश समय मरे-मरे, उदासीन और उद्विग्न रहने लगे हैं, जीवन का लक्ष्य भूल चुके हैं और हँसी हमसे छिटक कर इतनी दूर हो चली है कि इसका अंदाजा नहीं लगाया जा सकता।

कभी कभार हम हँसते भी हैं तो लगता है कि कुटिल मुस्कान ही है वरना हमारी मुस्कान तो गायब ही होती जा रही है। बाल सुलभ स्वभाव बनाए रखने के लिए शुचिता को अपनाएं या यों ही अधमरे या मरे बने रहे। जिन्दगी से स्वाभाविक मुस्कान और बिंदासगी चली जाए तो फिर वह जीना मौत से अधिक बेकार होता है।