हाहाकार

अब लगना-वगना पुरानी बातें हो चली हैं, अब तो महसूस होता है कि जैसे चारों ओर मचा हुआ है जबर्दस्त हाहाकार। न कोई शान्त है, न सन्तुष्ट। अपने आप से भी हम खुश नहीं हैं और अपनों से भी, परायों से तो खुशी पाने की कामना ही बेकार है।

लगता है कि जैसे किसी का अपना कोई रहा ही नहीं, सारे के सारे ऎसा व्यवहार करने लगे हैं कि जैसे पराये ही हों। और पराये भी कोई ऎसे-वैसे नहीं, हर इंसान दूसरे को दुकान या पुराने जनम का कर्जदार समझने लगा है या कि कोई जानी दुश्मन।

किसी एक का दूसरे से कोई लेन-देन न हो, कोई एक दूसरे का कुछ भी छीन नहीं रहा है, न किसी को परेशान कर रहा हो, फिर भी हर आदमी एक-दूसरे को काट खाने को लपकता हुआ लगता है। खुदगर्जी और स्वार्थ के ज्वालामुखी पर स्केटिंग करता हुआ आदमी काल का प्रतीक बना हुआ जीभ लपलपाता हुआ जोरों से गर्जना करता हुआ ऎसा सामने आ रहा है कि जैसे उत्तराखण्ड की वादियों से पहाड़ के पहाड़ दरक कर धड़ाम से नीचे गिरने लगे हों।

आदमी में न कोई धैर्य रहा है न किसी प्रकार का संयम। वह भारी नहीं रहा इसलिए मामूली बातों पर भी बादलों की तरह फटने लगा है। न आगे-पीछे देखता है न या दाँये-बाँये। बस गुब्बारे की तरह फट जाता है और कयामत ला देता है उनकी जो आस-पास या साथ होते हैं।

किसी जमाने में कुल की मर्यादाओं तथा संस्कारों का भारीपन मुँह बोलता था। पर आज उसकी जगह कर्कश आवाजों के साथ वाणी का विस्फोट ही पसरा रहने लगा है। जाने कहाँ खो गया है आदमी का माधुर्य और आकर्षण।

अब इंसानियत की गंध की बजाय हिंसक और खूंखार जानवरों की दुर्गन्ध भी आने लगी है और भय की आहट भी। पहले आदमी को देखकर आदमी खुश होता था। अब आदमी डरावना लगने लगा है।

बात बड़े-बड़े आदमियों की ही नहीं, मामूली दो टके के लोग भी अपने आपको आजाद भारत का स्वयंभू शहंशाह मान कर चलते और रुतबे दिखाने लगे हैं। अभिव्यक्ति के साथ ही उन्मुक्त व्यवहार की स्वच्छन्दता का भीषण और भयावह माहौल सब तरह पसरता जा रहा है।

किसी को संपट नहीं है क्या बोल रहा है, क्या लिख रहा है। बकवास करने और सुनाने वालों से कान तंग आ चुके हैं। लम्पट और लूटेरे नैतिकता और चरित्र की कहानियां सुना रहे हैं। चोर-उचक्के ईमानदारी की, भ्रष्ट-बेईमान और रिश्वतखोर पंचतंत्र की कथाओं की तर्ज पर उपदेश रचते हुए कथावाचकों और समाजसुधारकों की तरह पेश आ रहे हैं।

सब तरह गड़बड़ हो गया है। आदमी कहीं से आदमी नहीं लगता। अपनी वाहवाही और चाँदी कूटने के फेर में औरों के कंधों का इस्तेमाल कर रहा है। अपनी चवन्नियां चलाने के फेर में नामर्द और बाँझ मिलकर वाजीकरण के शर्तिया नुस्खे बता रहे हैं।

क्या जमाना आ गया है। बड़े लोग और बड़े होते जा रहे हैं। इनके बड़प्पन ने मिर्च बड़ों, आलू बड़ों और कचोरी-समोसों के तीखेपन को भी पछाड़ दिया है।

हर बड़ा आदमी अपने पीछे अहंकार की एसिडिटी छोड़ता जा रहा है। आखिर किससे मिलें कि मन खुश हो जाए, दिल बाग-बाग हो जाए। अब तो जो मिलता है उसकी क्रूर निगाह, कर्कश आवाज और हिंसक स्वभाव के डर से ही सुकून के सारे बाग जलकर खाक हो जाते हैं।

कोई भरोसा नहीं रहा आदमी का। पता नहीं कब क्या कहर ढा जाए, भला-चंगा आदमी कब पगला जाए और पागलपन की हरकतें करने लग जाए, कुछ कहा नहीं जा सकता। आदमियों को दौरे पड़ने लगे हैं पागलपन के।

बड़े लोग कुत्ते-बिल्लियों की तरह हाथियों और हिरणों के आगे-पीछे घूमने और परिक्रमा करने लगे हैं। गधे जी भर कर गुलाबजामुन खाते और चाशनी पीते हुए नाच-गा रहे हैं। पेट भर कोल्डड्रिंक्स पिये हुए ऊँट गर्दन ऊँची कर प्रशस्ति के गीत गा रहे हैं। घोड़े हिनहिनाते हुए दिन-रात बिना थके हुए उन सभी की जय-जयकार में मस्त हैं जिनकी बदौलत किसम-किसम के चने चबाने का आनन्द पा रहे हैं।

ऊपर-ऊपर से लगता है कि जैसे हम खूब तरक्की कर रहे हैं, खुशहाली के फव्वारें चल रहे हैं और गांव-शहर स्मार्ट दर स्मार्ट होते जा रहे हैं। किसी की समझ में नहीं आ रहा है कि इतना सारा भौतिक विकास का स्वर्णिम दौर होने के बावजूद मानसिक और शारीरिक रोगियों और उन्मादियों की भारी भीड़ क्यों बढ़ रही है। डिप्रेशन या कि तनावों से हर कोई परेशान क्यों हैं। दवाखानों में बीमारों का ज्वार लगातार इतना बढ़ता जा रहा है कि इतने सारे अस्पताल खुल जाने के बाद भी भीड़ कम नहीं हो पा रही है।

छोटे-बड़े सभी के चेहरों की मुस्कान गायब है। हँसना भी कठिन अभिनय हो गया है। कोई दावे के साथ नहीं कह पा रहा है कि वह स्वस्थ है। मस्त होने की बात को बहुत दूर की है। आखिर क्या होता जा रहा है इंसान को, मुस्कुराहट और मस्ती पलायन करती जा रही है।

बड़े और महान वैभवशालियों के पास पद का मद है, प्रतिष्ठा का कभी खत्म न होने वाला शहद है और अधिकार इतने कि सामने वाले को पूरा का पूरा कच्चा चबा खायें, फिर भी डकार न लें। किसे अपना आदर्श मानें। जिन्हें आदर्श मानने लगते हैं, कुछ अर्से बाद भूखे, नंगे, बदहवास, डकैत और लम्पट नज़र आते हैं।

लगता है कि वैश्वीकरण का दौर होने के बावजूद दुनिया किसी पागलखाने, कत्लखाने या काईनहाउस में तब्दील होती जा रही है जहां हर कोई अनिश्चितता के माहौल में जी रहा है, पता नहीं कब कौनसा संकट आ जाए, किस आदमी में कोई सा पागलपन सवार हो आए।

इन हालातों ने मनोरोगियों का विस्फोट कर रखा है। लोग टिड्डियों, मोयलों और मच्छरों की तर्ज पर हमले करने और खून चूसने लगे हैं। जो जितना अधिक कहर ढा सकता है वह अपने आपको उतना ही संप्रभु व शक्तिशाली समझ बैठता है।

रातों की नींद और दिन का चैन छीन कर भी मनचाहा और मनमाना काम लेने वाले लोगों ने समझ लिया है कि इंसानों से भी भूत-प्रे्रतों और जिन्नों जैसा काम लिया जा सकता है।

लगता है कि जैसे कलियुग नंगा होकर आदमी के पीछे पड़ गया है। कलियुग का जिन्न बड़े-बड़े लोगों में घुस कर अपनी चला रहा है। इन हालातों में इतना तो तय हो ही गया है कि अब कलियुग किसी को न तो स्वस्थ रहने देगा, न मस्त।

सब तरह पानी सूखने लगा कहीं किसी पर पानी ठहर नहीं रहा। पानी गले-गले से ऊपर तक आ गया है फिर भी कोई पानी-पानी नहीं हो रहा। कोल्हू के बैलों, रोबोट्स या कम्प्यूटर की तरह दिन-रात घिसते हुए जो समय आ रहा है वह भयावह होगा ही।

मौज-मस्ती और सहज-स्वाभाविक आनंद की नदियां सूख रही हैं और तनावों की त्रिवेणियां असामयिक अस्थि विसर्जन के लिए तैयार हो रही हैं, हवाओं में स्वार्थ और हरामखोरी की गंध आने लगी है।

मदमस्त और बेफिक्र सिर्फ वही है जो बहती गंगा में हाथ धोना जान गया है या कि सम सामयिक धाराओं में बहते हुए पूरी बेशर्मी से नंग-धड़ंग नहाने का हुनर सीख गया है।

अच्छे, सच्चे और ईमानदार लोगों को लगता है कि या तो प्रलय का समय आ ही गया है या फिर सज्जनों के लिए कंदराओं में जाकर तपस्या करने का वक्त आने वाला है।

जब इंसान इंसान ही नहीं रहा तो फिर क्या अर्थ रह गया है इन बस्तियों, इंसानों के अनचाहे विस्फोट को दर्शाती मदमाती वीथियों और अपार चकाचौंध का। बात किसी एक मुल्क की नहीं, सब तरफ हवाएं उतर आयी हैं बदचलनी पर, और उन्मुक्त व्यभिचारी बादलों का कोई भरोसा नहीं रहा, खुद पर भी नहीं रहा बस उनका। पता नहीं हवाएं अपनी पीठ पर बिठाकर किस समय कहाँ ले जाएं और सूरज की रोशनी पर पहरा बिठा दें।

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