बदहवास कलियुग का नंगा नाच- अट्टहास

बदहवास कलियुग का नंगा नाच- अट्टहास

इंसान का अपना स्वाभिमान ही है जो उसके इंसान होने का सीधा सबूत पेश करता है। दुनिया में मनुष्य के अलावा कोई ऎसा प्राणी नहीं है जिसे स्वाभिमान का गर्व और गौरव प्राप्त हो।

स्वाभिमान है तभी इंसान सच्चा है अन्यथा वह झूठा है और केवल इंसानी खोल हथियाये हुए है। असली इंसान वही है जो अपने स्वाभिमान को बचाये रखता है और गर्व करता है। जिसका स्वाभिमान जिन्दा है वही इंसान जीवित है।

स्वाभिमान को बनाए और बचाए रखना हर इंसान के लिए पूरी जिन्दगी की सर्वाधिक कठिन चुनौती होती है। अभिमान कोई भी कर सकता है। यों भी आजकल अधिकांश लोगों में दो ही बातें घर की हुई हैं। एक अभिमान और दूसरा अहंकार।

कोई अपनी औकात में नहीं रहना चाहता। सभी चाहते हैं कि उन्हें औरों से पृथक पूज्य, सम्माननीय और स्वामी का दर्जा प्राप्त हो चाहे वे कितने ही गिरे हुए इन्सानों की श्रेणी में ही शुमार क्यों न हो।

मानव मनोविज्ञान का सिद्धान्त है कि जो लोग जितने अधिक नीच मनोवृत्ति के होते हैं वे उतने अधिक स्वाभिमानशून्य, खुदगर्ज, चापलुस और विध्वंसक मनोवृत्ति वाले होते हैं और दूसरों को नीचे गिराकर, धौंस-धींगामस्ती से खौफ पैदा कर अपने खाली पीपों को ड्रम के रूप में इस्तेमाल कर बजते ही रहने के आदी हो गए हैं।

इन खाली पीपों का शोर आजकल हर गलियारे से लेकर लोक पथ और राज पथ तक में प्रदूषण फैलाने लगा है। इनमें जंग लगे पीपे भी हैं, किराये के पीपे भी हैं और उन सभी किस्मों के पीपे हैं जो कभी अच्छी गुणवत्ता का माल भरने के काम आते थे या फिर कचरा पात्रों के रूप में इस्तेमाल हुआ करते थे।

प्रत्येक इंसान का अपना अन्यतम वजूद है और उसे इंसान के रूप में बनाए रखने और इंसानियत का परिपालन करते रहना उसी का दायित्व है। यह इंसानियत तभी तक बनी रहती है जब तक स्वाभिमान का गौरव और गर्व रहता है।

जैसे ही कोई अपना स्वाभिमान त्याग देता है तभी से उसके भीतर से इंसानियत भी बाहर निकल जाती है और इंसान के सभी गुण भी। स्वाभिमान शून्य हो जाने का सीधा सा अर्थ यही है कि हम इंसानियत खो चुके हैं और केवल इंसानी जिस्म पर अतिक्रमण किए हुए जमे हुए हैं अन्यथा हमें एक क्षण इंसान बने रहने का कोई हक नहीं है।

बहुत से लोग हैं जो या तो फालतू हैं या किसी न किसी के पालतु कहे जाते हैं।  खूब सारे ऎसे भी देखने को मिल जाते हैं जो या तो मदारी बने हुए फिर रहे हैं या फिर जमूरों की तरह बर्ताव कर रहे हैं। और खूब सारी संख्या उनकी भी है जो पालतु श्वानों,  बंदर-भालुओं आदि की तरह किसी न किसी के कहने पर नाच-गान कर रहे हैं या अपने मदारियों के इशारों पर नंगा नाच कर रहे हैं।

हर तरफ आदमी होने और दिखाने की हौड़ मची हुई है। कोई किसी का आदमी कहलाता है और कोई किसी का आदमी होने का नाम लेकर दुनिया भर के सारे फायदे ले रहा है। वे लोग वाकई भाग्यवान हैं जो किसी के आदमी नहीं हैं, खुद के स्वाभिमान के साथ जिन्दा हैं और कोई दूसरा इन्हें अपना पालतु नहीं बना सकता है।

बिरले ही होते हैं जो न बिकते हैं न उनका मोल लगाया जा सकता है। असल में ये अनबिकाऊ लोग ही टिकाऊ हैं। जो बिकने वाले हैं उन्हें बिकने में आनंद आता है। इन्हें खरीदने वालों की भरमार है।

आजकल हर किसी को पता रहता है कि कौन कितने में बिक सकता है और कौन किसे खरीदने की ताकत रखता है।  लगता है कि जैसे बस्तियां न होकर बकरों-बकरियों और मूर्गे-मुर्गियों की मण्डियां ही हो गई हों, जहाँ जो कुछ है वह सारा का सारा बिकने-बिकवाने के लिए ही है।

जो नहीं बिक सकता उसे मण्डी के पास फटकने तक का अधिकार नहीं है। फिर एक बार जो बिक गया, उसके लिए सारी लाज-शर्म बेमानी है। बहुत से हैं जिन्हें बार-बार बिकते रहने में परिवर्तन का आनंद आता है और परिभ्रमण का भी। बिना पैसे-टके हर तरह की मण्डियों के दर्शन का लाभ यों ही जिन्दगी भर मिलता रहता है।

घोर कलियुग का प्रभाव नंगा होकर नाच कर रहा है। गगनभेदी अट्टहास करने लगा है। न ईमान-धरम रहा, न स्वाभिमान। जिसकी लाठी उसकी भैंस की तर्ज पर जो जितना अधिक नंगा, खरीद-फरोख्त का उस्ताद, बदहवास और बेशर्म है, वह उतना ही अधिक मस्त होता जा रहा है।

ईमानदार और स्वाभिमानियों के सामने दसों दिशाओं से चुनौतियों के तीर रह-रहकर बिंधने की कोशिश करते हैं। हर बेईमान, भ्रष्ट, रिश्वतखोर और हराम का खाने-पीने वाला यही चाहता है कि कोई भी ऎसा न बचा रहे कि जिसे औरों से अलहदा होने का गौरव रहे।

जो एक बार स्वार्थ, प्रलोभन या भय से नाक कटवा लेता है वह दूसरों की नाक कटवाने के लिए तरह-तरह के बहाने बनाता है, भ्रम फैलाता है और हाथ धोकर पीछे पड़ जाता है- नाक कटवा लो या फिर गला कटवाने को तैयार हो जाओ।

किसम-किसम के कसाई अपनी छुरियों की धार तेज करने में लगे हुए हैं। कसाइयों में अब कोई भेद नहीं रहा। आदमी भी कसाई की तरह बर्ताव करते नज़र आ रहे हैं और औरतें भी।

तरह-तरह की छुरियां सबके पास हैं। स्वाभिमान खो चुके लोग भूत-पलीतों और डाकिनों की तरह उन सभी लोगों के पीछे पड़े हुए हैं जो अपने स्वाभिमान को बचा कर रखे हुए हैं।

स्वाभिमान का आवरण अभेद्य सुरक्षा कवच से कम नहीं है इसीलिए बचे हुए हैं वरना विषबुझे तीरों के साथ विषकन्याएं और विषपुरुष तो अवसर की प्रतीक्षा बेसब्री से कर ही रहे हैं।

विकल्प हमारे सामने खुले पड़े हैं। स्वाभिमान छोड़कर जिन्दा लाशों और गुलामों की स्थिति पा लें या फिर संघर्ष का शंखनाद करते हुए हुंकार भरते रहें।