श्री मणि बावरा के बारे में प्रबुद्धजनों के उद्गार …

प्रबुद्धजनों, शिक्षाविदों और साहित्यकारों के मन में श्री मणि बावरा जी के अपार स्नेह, श्रद्धा और आदर भाव हमेशा बना रहा। विभिन्न आयोजनों में उनकी रचनाधर्मिता, संगठन कौशल और साहित्य के प्रति समर्पित सेवाओं का जिक्र होता ही होता। उनके बारे में सभी ने अच्छा ही बोला, लिखा और सम्मानजनक भावों के साथ स्वीकारा कि बांसवाड़ा कर रचनाधर्मिता के संरक्षण और विस्तार में उनकी अहम् भूमिका रही है जिसे भुलाया नहीं जा सकता।

मणि बावरा ः कबीर की परंपरा का शब्द शिल्पी  – डॉ. निर्मला शर्मा

स्व. मणि बावरा मानसिक और बौद्धिक आजादी के लिए संघर्ष करने वाले वह अग्रणी रश्मि दूत थे जो सामाजिक सरोकारों और व्यवस्था विद्रोह के लिए निरन्तर अनथक संघर्ष करते रहे। उनकी कविताओं में आम आदमी के लिए संवेदनाओं के साथ शोषितों के प्रति वास्तविक सहानुभूति थी।

मणि बावरा के काव्य शिल्प, भाव सम्प्रेषण और प्रभाव को देखते हुए सहज ही कहा जा सकता है कि वे कबीर की परम्परा के शब्द शिल्पी थे। मणि बावरा शिक्षा, साहित्य, समाजसेवा से लेकर समाज-जीवन के कई-कई तटों पर रचनात्मक प्रवाह का नाम था।

भावान्जलि

– डॉ. निर्मला शर्मा

एक फूलों का शज़र था, खो गया

वो जो शायर की नज़र था, खो गया

खुशनुमा एहसास हर दहलीज़ पर

भरा-पूरा शहर था जो, खो गया

मुश्किलें चट्टान सी आती रहीं

और लड़ती लहर था वह खो गया

हर सफा उस ज़िन्दग़ी का दोस्तों

नज़्म का सुंदर बहर था खो गया

कितनी नाउम्मीद आँखों के लिए

भोर का पहला पहर था खो गया

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युगीन यथार्थ के चिन्तनशील साहित्यकार – स्व. ईश्वरलाल प. वैश्य

मणि बावरा समाजवादी साहित्यकार थे जिनके व्यक्तित्व और कृतित्व के हर पहलू में आम आदमी ही रचनाधर्मिता का केन्द्र बिन्दु रहा है। अपनी संवेदनाओं को उन्होंने जिस सरल, सहज और बेबाक ढंग से पेश किया है वे युगीन वास्तविकता से अच्छी तरह साक्षात कराते हैं। 

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सर्वहारा वर्ग के कवि – डॉ. युधिष्ठिर त्रिवेदी

     मणि बावरा सर्वहारा वर्ग के सशक्त कवि थे जिन्होंने साहित्य सृजन की हर विधा में फन आजमाया और प्रदेश तथा देश में धाक जमायी। – डॉ. युधिष्ठिर त्रिवेदी

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संघर्ष ताज़िन्दगी रहा उनका हमसफर – शारदा पटेल (ज्येष्ठ पुत्री)

कुछ ऎसे बिरले होते हैं जो जन्म तो बड़े परिवार में नहीं लेते पर काम बड़ा कर जाते हैं। ऎसे ही साहित्यकार मणि बावरा थे। पिता का साया बहुत जल्दी सिर से उठ गया था। नन्हें कंधों पर भरे-पूरे परिवार का बोझ था। उनका बचपन बहुत कष्टप्रद बीता।

भरण-पोषण के लिए उन्होंने अध्यापक की नौकरी की। चालीस रुपए में माँ पत्नी व तीन बहिनों का खर्च उठाने के साथ कर्जदारों से निपटना भी उनके सामने बड़ी चुनौती था। परन्तु उनमें साहस की कमी नहीं थी। नौकरी के लिए रोजाना पाँच से दस किलोमीटर पैदल ही जाते थे। भरी बरसात हो या गर्मी पैदल ही जाना पड़ता था। उस समय उनके पास साईकिल भी नहीं थी।

मुझे अच्छी तरह याद है जब मैंने बचपन में घड़ी की मांग की थी, तब उन्होंने छूटते ही कहा था- मैंने खुद ने सारी जिम्मेदारियां निपटाने एवं कर्ज भरने के बाद में ही घड़ी पहनी थी। परन्तु तुझे मैं जरूर दिलवाऊंगा। मैंने जी-तोड़ मेहनत कर यह सपना संजोया है कि गरीबी के जो दिन मैंने देखे हैं वो मेरे बच्चों को न देखने पड़ें।

इन विषम पारिवारिक और सामाजिक परिस्थितियों के बावजूद उनका रूख हिन्दी साहित्य की तरफ था। बिजली नहीं थी पर दीये की रोशनी में साहित्य को जिन्दा रखा।

ऎसे सरल हृदय नियम के पक्के, सादगी पूर्ण जिन्दगी जीने वाले पिता बावराजी की स्नेह धारा अब नहीं रही। उनकी यादों के सहारे ही सम्बल बने हैं। स्व. श्याम अश्यामजी की ये पक्तियाँ याद आती हैं – ‘‘उड़ चला पंछी तो क्या हुआ आशियां तो आबाद है।’’

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