उल्लू-चमगादड़ भाई-भाई

जो भी इन्सान धरती पर पैदा हो गया, वह सामाजिक प्राणी के रूप में अपने आपको स्थापित करने का प्रयास करता ही है। समुदाय के बिना इंसान की कल्पना ही नहीं की जा सकती क्योंकि उसकी सम्पूर्ण जीवनचर्या और मरते दम तक बनी रहने वाली जिन्दगी उन लोगों के लिए है जो उसके आस-पास या साथ रहते हैं अथवा उसके अपने क्षेत्र में रहते हैं।

इसके अलावा सामाजिक प्राणी होने के नाते इंसान को उन सभी के लिए जीना पड़ता है जो धरती के जीव हैं चाहे उनका स्वभाव, प्रकृति और व्यवहार कैसा भी क्यों न हो। आखिर दुनिया के सभी जीवों को एक इंसान से ही अपेक्षा रहा करती है क्योंकि सभी जीवों में यही भावना कूट-कूट कर भरी होती है कि इंसान को बनाया ही इसलिए गया है ताकि वे जीवों और जगत के काम आए।

यह अलग बात है कि हमारे अपने मामले में हम दूसरे प्राणियाें जितना भी भरोसा नहीं रखते। हमें आप पर कभी भरोसा नहीं रहा तभी तो हम दूसरों के भरोसे जिन्दगी निकाल देने के लिए हमेशा उतावले और उत्सुक बने रहते हैं।

हममें से खूब सारे लोग हैं जो इंसान के रूप में पैदा जरूर हो गए किन्तु बाद में हैवान के रूप में अपने आपको प्रतिस्थापित कर लिया और जब मरे तब पूरे और पक्के शैतान के रूप में ही। और खूब सारे लोग हैं जो कि पैदा होने के बाद जैसे ही समझदार हुए उन्होंने अपने आपको धरती का भगवान मानने-मनवाने के लिए पूरी की पूरी जिन्दगी दाँव पर लगा दी।

उन्हें इसमें तो कोई सफलता नहीं मिली परन्तु इस पूरी प्रक्रिया में इन लोगों ने खुद के भीतर से इंसानियत तक खो दी और आज इन्हें पिशाचों और पिशाचिनियों अथवा राक्षस-राक्षनियों के रूप में देखा और अनुभव किया जा रहा है।

और ऎसे ही आसुरी स्त्री-पुरुषों ने  हर युग में अपने आधिपत्य और साम्राज्य को जमाने के लिए वह हर प्रकार की धींगामस्ती, दमन, शोषण और अन्याय को अपनाया जो राक्षसी परंपराओं का अंग हुआ करता है।

पुराने युगों में असुरियों के मुकाबले असुरों ने खूब धमाल मचायी और जमाने भर को हैरान-परेशान किया। ऋषियों के यज्ञ को विध्वंस किया और हिंसा पर उतारू होकर अपनी सत्ता का डंका बजाया।

बीते युगों में हालांकि राक्षसियों के दमन और शोषण की घटनाएं अपेक्षाकृत कम पढ़ने को मिलती हैं किन्तु राक्षसियों के कारनामे ऎसे रहे कि उन्होंने राक्षसों से भी अधिक खूंखार और हिंसक षड़यंत्रों को अंजाम दिया।

शूर्पणखा, पूतना, सुरसा, लंकिनी जैसी कई सारी राक्षसियों ने जो कुछ किया वह पुराणों और इतिहास का वह हिस्सा है जो राक्षसी परंपरा के हिंसक वैभव की बानगी पेश करता है। पुराने युगों के राक्षसों और राक्षसियों का पुनर्जन्म कलियुग में भी हो गया प्रतीत होता है तभी तो हमारी पूरी जिन्दगी में यहाँ-वहाँ खूब सारे पिशाच और पिशाचनियां देखने में आते हैं जिनकी वजह से ऋषि परंपरा में जीने वाले, सच्चे और अच्छे लोग दुःखी हो रहे हैं।

दुर्भाग्य से किसी भी बाड़े में एकाध भी ऎसा राक्षस या राक्षसी दिख जाए तो उस बाड़े का कबाड़ा तो तय ही है। कई सारे बाड़े और गलियारे इनके कारण ही मरघट जैसे नज़र आते हैं। इनमें रहने और काम करने वालों के लिए यह एक ऎसा मरघट होता है कि जहाँ चतुर्दिक अशान्ति, भय, खौफ, अनिष्ट की आशंका, दुर्भाग्य, बीमारियां, तनाव और वह सब कुछ व्याप्त हो जाता है जो अन्ततोगत्वा शोक और विषाद का ही सृजन करने वाला होता है।

पहले कहा जाता था कि एक मछली पूरे तालाब को गंदा करती है। अब कहा जा सकता है कि एक दुष्ट या दुष्टा पूरे कुनबे को बरबाद करने के लिए काफी है।  अब हर शाख पर कहीं न कहीं उल्लू बैठे हैं। कहीं सफेद उल्लुओं का कब्जा है और कहीं काले। इन्हीं के साथ रहते हुए अब  चितकबरे उल्लुओं की जमात भी दिखने लगी है।

वर्णसंकर उल्लुओं की यह जमात किसी की नहीं है बल्कि इस जमात का मकसद जहाँ मौका मिले, उस स्थान को श्मशान बना देना ही रह गया है।  कई शाखों पर तो उल्लुओं के पूरे के पूरे परिवार ने कब्जा कर रखा है। कहीं ये उल्लू बिना लव के स्वार्थ पूरे करने की खातिर लीव इन रिलेशनशिप में रह रहे हैं।

जब तक आवक और आनंद का दौर बना रहता है तब तक रिलेशन रहते हैं फिर विच्छेद हो जाते हैं। कहीं उल्लुओं को खपाने लायक कोई मण्डी है ही नहीं, इसलिए जहाँ एक बार जम गए वहीं के खोखरों में हुड़दंग मचाते रहते हैं।

कई सारे उल्लुओं को यह दिव्य दृष्टि प्राप्त है कि कहाँ धन छिपा कर रखा पड़ा है और किस तक पहुंचाना है। उल्लुओं को साफ-साफ सिखाया गया है कि वे ही काम करो, जिनसे अपना फायदा होता हो। और इसके लिए सारे उल्लुओं के गले में स्वच्छन्दता की सुन्दर सी चिप लगा दी गई है। इससे एक-दूसरे को पहचान जाते हैं और मददगार बनते चले जाते हैं।

उल्लुुओं में हुनर के अनुसार खूब सारी प्रजातियां हैं। हर प्रजाति को अलग-अलग जिम्मेदारी सौंपी गई है। उल्लु अपने-अपने खोखरों में दुबक कर हुक्म चलाते हैं और चमगादड़ उनकी जी भर कर सेवा करते हैं। कोई उल्लुओं का घर चलाता है, कोई हिसाब रखता है, कोई चम्पी करता रहता है, तो कोई मुखबिरी करता हुआ पल-पल की खबर अपने उल्लू आका तक पहुंचाता है।

उल्लुओं की माया को चमगादड़ भी समझ नहीं पाते इसलिए उल्लुओं को सिद्ध मानकर उनकी हर बात पर अमल करते हैं और जरखरीद दास की तरह वे सारे काम करते हैं जो सामान्य दास नहीं कर पाते।

उल्लुओं को न सूरज से कोई सरोकार है, न रोशनी से। उल्लुओं के लिए फौज का काम करते हैं चमगादड़। दुनिया का कोई डेरा ऎसा नहीं बचा है जहाँ ये चमगादड़ पूरी बेशर्मी के साथ नंग-धड़ंग उल्टे लटके न दिखें।

सरे दिन यह हालत है। और रात में तो वायुयानों की तरह ऎसी उछालें भरते हैं जैसे कि इन्हें पूरे आसमान में उड़ने का लाइसेंस मिला हुआ हो।  उल्लुओं के खोखर और चमगादड़ों के डेरों का चलन हर युग में रहा है।

अंधेरों के हमसफर और अंधेरों का जयगान करने वाले उल्लुओं और चमगाइड़ों का याराना आजकल हर तरफ देखा जा रहा है। पता नहीं यह गठबंधन क्या कुछ गुल खिलाएगा। चाहे कुछ भी हो, इतना जरूर है कि चमगादड़ों और उल्लुओं का यह चोली-दामन का साथ हर तरफ अंधेरों की सियासती भूमिका का विस्तार जरूर कर रहा है।

बादलों से इनका नापाक समझौता भी अक्सर देखा जा रहा है। सूरज चाहे कितना शौख चटक चमकीला क्यों न हो जाए, बदचलन हवाओं और बदहवास बादलों को अपने साथ मिलाकर उल्लुओं और चमगादड़ों ने अंधेरा पसरा देने में कभी भी कहीं कोई कमी नहीं छोड़ी है।

सूरज चीख-चीख कर कह रहा है हमें, जलाओ मशालें हर तरफ और खोखरों-गुफाओं से लेकर कोने-कोने तक उजियारा भर दो ताकि उल्लुओं को अपनी औकात पता चल जाए।

और हम हैं कि जाने किसके भरोसे बैठे हैं। अब कोई मशालची आने वाला नहीं, यह पुण्य कर्म हमें ही करना है। आईये कमर कस लें और मशाल जलाकर बढ़ चलें उस तरफ जहाँ उल्लुओं और चमगादड़ों ने अंधेरों को सर्वस्व और संप्रभु मान लिया है।

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