तभी तक रहती है दोस्ती या दुश्मनी

इंसान की पूरी जिन्दगी शत्रुता और मित्रता के दो ध्रुवों के बीच पेण्डुलम की तरह हिलती-डुलती रहती है। कभी एक छोर का आकर्षण बढ़ जाता है तो कभी दूसरे छोर का। कभी इधर तो कभी उधर करते रहते हुए दिन-महीने और साल गुजरते ही चले जाते हैं।

शत्रुता और मित्रता का भाव कभी भी स्थायी और एक ही परिमाण में नहीं हुआ करता बल्कि इसका घनत्व और समयावधि घटती-बढ़ती रहती है और कभी पूर्ण तो कभी शून्यावस्था को भी प्राप्त कर लिया करती है।

शत्रुता और मित्रता को दो प्रकार से परिभाषित किया जा सकता है। एक वह है जिसमें पूर्वजन्म के संबंधों और लेन-देन की स्थितियां होती हैं जहाँ पारस्परिक मित्रता या शत्रुता अथवा लेन-देन का क्रम तभी तक चलता रहता है जब तक कि इसका पूरा चुकारा नहीं हो जाए, फिर दोनों पक्ष अनायास या सायास, प्रसन्नता से अथवा दुःखों से प्राप्त वैराग्य भरी स्थितियों का सामना करते हुए अपने आप अलग हो जाया करते हैं।

ऎसे मामलों में यह देखा जाता है कि दूसरों से हमारा इस जन्म में किसी भी प्रकार का कोई संबंध हो ही नहीं, फिर भी वे लोग हमसे मित्रता करते हैं अथवा रखा करते हैं बेवजह शत्रुता का भाव। ऎसी परिस्थितियों के लिए पूर्वजन्म का लेन-देन और मैत्री-शत्रु भाव ही अहम कारक होता है वरना दुनिया में अरबों लोग हैं उनसे उनकी दुश्मनी या मित्रता क्यों नहीं है।

दूसरी तरह की मित्रता और शत्रुता स्वार्थ के कारण होती है अथवा हमारी अपनी नासमझी, दुराग्रहों और पूर्वाग्रहों के कारण। उच्च शिक्षित और बुद्धिजीवी कहे जाने वाले, उच्च पदों पर विराजमान और ऊँचे ओहदों पर प्रतिष्ठित लोगों में यह ईष्र्या, द्वेष और शत्रुता की बीमारी ज्यादा ही हुआ करती है क्योंकि इस किस्म के लोग यथार्थ के धरातल से अपने आपको ऊपर मानकर चलते हैं और ऎसे में इनकी कल्पनाओं की उड़ान तथा हमेशा आकार बढ़ाता रहने वाला भ्रमों, शंकाओं और आशंकाओं भरा इनका आभामण्डल, भविष्य की चिंताएं और उच्चाकांक्षाओं की भूख-प्यास मिलकर इन्हें असामान्य जीवनयापन की ओर प्रेरित कर देती है जहाँ से निकलना इनके लिए बड़ा ही मुश्किल होता है।

इन लोगों के जेहन में उन सभी लोगों के प्रति मित्रता का भाव अपने आप बन जाता है जो इनके जैसे कुटिल और खल विचारों व कुत्सित वृत्तियों के होते हैं तथा इन्हीं की तरह जायज-नाजायत कर्मों या कुकर्मों में रमे हुए होते हैं।  ऎसे लोगों को दुनिया के वे सारे लोग बुरे लगते हैं जो उनकी हरकतों और गलत कामों को गलत कहने का साहस रखा करते हैं। और यही कारण है कि ये अपनी बुद्धि को रचनात्मक दिशा की ओर मोड़ने की बजाय उस दिशा में मोड़ दिया करते हैं जहाँ नकारात्मकता की गहरी घाटियाँ मीलों तक यों ही चलती रहती हैं।

मित्रता या शत्रुता में से कोई से भाव हों, इनकी आयु तभी तक बनी रहती है जब तक पारस्परिक स्वार्थ पूर्ण नहीं हों। जैसे ही ये पूर्णता पा लेते हैं अपने आप दोनों ही प्रकार के संबंधों को पूर्ण विराम लग जाता है अथवा उदासीन अवस्था में आ जाते हैं।

मित्रता के भाव उदासीन अवस्था में आकर पड़े भी रहते हैं और भविष्य में इनका पुनः अंकुरण भी संभव है लेकिन घोर शत्रुता के भाव आमतौर पर या तो बने रहते हैं अथवा संबंध पूर्ण विच्छेद ही हो जाते हैं। किसी एक स्थान पर रहने और काम करने वाले लोगों में किसी भी प्रकार की शत्रुता सामने आ जाने पर इसका संबंध स्वार्थ से होता है अथवा स्थान से। काम की पूर्णता हो जाए अथवा स्थान बदल जाने पर अपने आप यह शत्रुता विराम ले लिया करती है। इसी प्रकार मित्रता और शत्रुता का एक निश्चित समय भी होता है। उस समय तक ही ये बनी रहती हैं। कई गहरे से गहरे मित्र भी एक समय सीमा तक ही बने रह सकते हैं।

दूसरी तरफ यह भी देखा जाता है कि जिन लोगों को ईश्वर दैवीय कार्य से लोक कल्याण के लिए धरा पर भेजता है वे लोग निष्कामी, निस्पृही और निर्लोभी होने के साथ ही हर काम को ईश्वरीय मानकर करते हैं और इस कारण उनकी मित्रता पर समय, स्वार्थ या स्थान का बंधन नहीं होता।

पर शत्रुता के मामले में ऎसा नहीं है। कई बार अच्छे कर्मयोगियों के सामने भी बेवजह शत्रुता करने वाले लोग हमेशा बने ही रहते हैं ये लोग आलोचक और निंदक बने हुए हर कर्म पर निगाह रखते हैं और इन शत्रुओं की वजह से ही कामों की गुणवत्ता बनी रहती है और कर्मयोगियों को अपनी गलती सुधारने तथा व्यक्तित्व को शुचितापूर्ण बनाने का सहज सुलभ अवसर प्राप्त होता रहता है।

शत्रुता करने वाले लोगों की पहचान का सबसे आसान तरीका यह है कि ऎसे लोग बिना किसी कारण से शत्रुता करने लगते हैं और उन्हें स्वयं को भी इस बात की कोई सूझ मरते दम तक नहीं पड़ती कि वे शत्रुता क्यों कर रहे हैं, इसका क्या औचित्य है। मूर्खता और दंभ से भरे ऎसे लोगों को हमेशा यही लगता है कि वे ही जमाने के सिकंदर हैं, उनसे ऊपर भी कोई नहीं है, और उन्हें पूछने वाला भी कोई नहीं। यही कारण है कि इनका व्यवहार ताजिन्दगी उन्मुक्त, स्वेच्छंद और व्यभिचारी वृत्तियों का पर्याय बना रहता है।

जो लोग मित्रता और शत्रुता दोनों ही स्थितियों में समत्व रखते हैं और इसे सामान्य सांसारिक औपचारिकताएं मानकर चलते हुए अच्छे कर्म करते रहते हैं उनके लिए इस बात का कोई फर्क नहीं पड़ता कि कौन उनके साथ है, कौन उनसे दूर, कौन मित्र है और कौन शत्रु।

इनके लिए व्यक्ति की बजाय विचार और कर्म ही प्रधानता रखा करते हैं। यह कभी संभव हो ही नहीं सकता कि सब लोग हमारे मित्र हो जाएं, और यह भी संभव नहीं होता कि सारे के सारे हमारे दुश्मन हो जाएं। आजकल प्रीति का सीधा सा संबंध स्वार्थ से है।

स्वार्थ और लाभ-हानि की गणित को सामने रखकर ही संबंध बनाने, निभाने और समाप्त करने का कारोबारी व्यवहार आज का इंसान बिना किसी लाज-शर्म के अपनाने लगा है। इसलिए अब संबंधों को देखकर किसी को अच्छा या बुरा कहना बेमानी हो चला है।

हाँ, इतना अवश्य है कि संबंधों को देखकर कोई भी सामान्य इंसान किसी भी रिश्ते के पीछे छिपे एजेण्डे और स्वार्थ का कयास लगा सकता है क्योंकि आजकल सभी जगह यही स्थिति देखने को मिलती है। और यही कारण है कि स्वार्थ पूरे न होने पर दोस्ती या तो समाप्त हो जाती है अथवा दुश्मनी में परिवर्तित हो जाया करती है। बावजूद इन सबके मित्रता और शत्रुता जिन मूल आधारों पर निर्भर है उनमें स्वार्थ, समय और स्थान का विशेष महत्व रहा है और रहेगा ही।

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