कब तक पालते रहें भीखमंगों और कामचोरों को

कब तक पालते रहें भीखमंगों और कामचोरों को

आखिर कब तक पालते रहें उनको जो किसी काम-काज के नहीं हैं।  जो कार्यस्थलों के लिए नाकारा हैं उनके लिए घर वाले भी यही कहते हैं कि घर के लिए भी इनका कोई उपयोग नहीं।

जो लाभ जहाँ से मिल सकता है, मिल रहा है उसमें कहीं कोई कमी नहीं आए, ऊपर से जो कुछ अतिरिक्त मिल जाए, उसके लिए ही लोग प्रयास करते रहते हैं।

हर जगह कार्य संस्कृति का बड़ा भारी संकट है और इसी वजह से निकम्मों और कामचोरों के लिए यह धरा स्वर्ग बनी हुई है। खूब सारे हैं जिनके पास कोई काम नहीं है या काम करना नहीं चाहते।

घण्टों का समय टाईमपास करते हुए भी वे सैकण्डों में हो सकने कामों से भी जी चुराते रहते हैं। आखिर क्या हो गया है इस देश की जवानी को। पुराने लोगों मेंं नगण्य ऎसे हो सकते हैं जो काम नहीं करना चाहते हों लेकिन अधिकांश के बारे में कहा जाता है कि पुराने चावलों में ही दम रहा है अन्यथा आज के घोड़े थक भी जल्दी जाते हैं और पस्त भी।

थोड़ा सा काम करवा लो कि दिन में भी आराम फरमाने के संसाधन चाहिएं, नींद के लिए उपयुक्त रेस्ट रूम की जरूरत पड़ती है।

कइयों के बारे में तो यही धारणा बनी हुई है कि ये कर्म स्थलों पर केवल गप्पे हाँकने और सोने के लिए ही आते हैं। कर्म का क्षेत्र या काम-काज का स्थल कोई सा क्यों न हो, हर तरफ निकम्मों ने कबाड़ा कर रखा है।

पहले जमाने में कोई भी इंसान बिना मेहनत किए कुछ भी स्वीकार नहीं करता था। आज इसका उलटा हो गया है। अब अधिकांश लोग यही चाहते हैं कि बिना कोई मेहनत किए, शरीर को हिलाये-डुलाये बिना, कोई सा दायित्व निभाए बिना बैठे-बैठे सब कुछ मिलता रहे।

जितना मिल रहा है उसमें भी संतोष नहीं है। चाहते हैं कि अलग से कुछ दान-दक्षिणा, सीधा, भेंट पूजा, गिफ्ट या किसी भी किस्म की भीख मिल जाए तो दिन सुधर जाए। लगता है कि जैसे अकाल मौत और भूखमरी में मरने वाले सारे के सारे भिखारियों का पुनर्जन्म इन्हीं बाड़ों और बरामदों में हो गया है। इतना सब कुछ मिल जाए तब भी पेट-जेब और पिटारे नहीं भरते।

पाने के मामले में सारे के सारे बेशर्म हैं। कोई मुद्रा बाजार में बिक कर खुश है, कोई आदमी को खरीद कर, पैसों की भूख भी है और खाने-पीने की। तभी तो बहुत सारे लोग मुँह मीठा कराने और कुछ इंतजाम करने की बात कहते हैं जैसे कि इनके लिए रामरसोड़ा और अन्नक्षेत्र खुले हुए हों या इनके बाप-दादे अपनी संततियों के लिए मुफ्त का खान-पान मुहैया कराने और तमाम प्रकार के शौक फरमाने के लिए धन-दौलत छोड़ गए हों या ये मांग कर खाने-पीने वाले लोग हमारे सदा अतिथि ही हों। सब तरफ मंगतों की जमातें जमा हो गई हैं।

कोई पैसे मांगता है और पैसे नहीं पहुंचने तक काम अटकाए रखता है, कोई अपने ही बाड़े में काम करने वालों से मुद्रा मांग लेता है, कोई घर के लिए गिफ्ट आईटम्स की लूट का शौकीन है, कोई हराम का खाने-पीने का जुगाड़ ही करता रहता है, कोई वह सब कुछ चाहता है जिससे कि देह तृप्त होने का अहसास कर सके।

शाश्वत सत्य यही है कि जिधर देखों उधर कामचोरों और भीखमंगों की जमातें ही नज़र आती हैं। लगता है कि जैसे पहले जन्म में लूट-मार करने वाली धाड़ (छापामार गिरोह) में शामिल लूटेरे नया जन्म ले चुके हैं।

इन लोगों को शरम भी नहीं आती कि कैसे सिद्धान्तों, ईमानदारी और देशभक्ति को गिरवी रखकर अव्वल दर्जे के मंगतों की तरह मांग खाकर, मुफ्त की बोटलें खाली कर और बिना परिश्रम का माल-असबाब पाकर खुश हो जाते हैं और लूटेरे, जेबकतरों की तरह व्यवहार करने के बावजूद खुद को चरित्रवान, ईमानदार, पाक-साफ और धार्मिक जताते हुए रोजाना ढेरों कसमें खाते रहते हैं।

कई बार तो भीतर के भिखारियों की हरकतों को देख-सुन कर चौराहों और सड़कों के भिखारियों को अपनी श्रेष्ठता और गौरव का मान होने लगता है।  वर्क कल्चर सब तरफ मरती जा रही है। बहुत बड़ी संख्या में लोग हर इलाके में हर बाड़े-परिसर में जमा हैं जिनके बारे में कहा जाता है कि ये किसी काम के नहीं हैं किन्तु मानवता के वशीभूत होकर हम उन्हें पाल ही रहे हैं।

यों भी हम भगवान, धर्म और दान-पुण्य के नाम पर कुत्तों, गायों, अनाथों, विधवाओं, विधुरों, वृद्ध-वृद्धाओं, अशक्तों आदि के लिए साल भर बहुत कुछ करते ही हैं। वर्तमान की सबसे बड़ी विसंगति और दुर्भाग्य यही है कि भीखमंगों, कामचोरों और लूटरों के पास हर तरह का हुनर है जिसके सहारे से वे अपने से बड़े और ब्राण्डेड भीखमंगों, डकैतों और निकम्मों को खुश कर लिया करते हैं।

थोड़ी भीख और हराम का माल इन तक पहुंच जाए तो क्या बुराई है। कौन सा अपनी मेहनत से कमाया है। इसी गणित के सहारे छोटे और बड़े चोर-डकैत और लूटेरे दुनिया भर में मौज उड़ा रहे हैं।

इंसानियत इस कदर गिरती जा रही है कि आदमी को दो-चार थप्पड़ें खाकर, सायास अपमान सहकर भी कुछ मिल जाए तो वह सहर्ष तैयार हो जाता है। इतना अधिक पैसों का दास हो चला है आज का आदमी।

कहा भी जाता है कि ईमानदारी, स्वाभिमान, सम्मान और निजता को जो खो देता है वह नंगा, बदहवास और बेशर्म होकर कहीं भी दाँव लगा सकता है, चाहे जहाँ हाथ मार सकता है, हाथ साफ कर सकता है।

आजकल सब तरफ काम-काज के बारे में स्थिति यही है कि समझदारों को लगता है कि कुछ लोग निरन्तर और निर्बाध भीख मांगने के लिए ही पैदा हुए हैं और आज की दुनिया इन्हें पाल ही रही है, चाहे ये कितने ही निकम्मे, हरामखोर और लूटेरे क्यों न हों।