अब आ गए नए जीव – मोबाइल घूस्सू

कुछ लेना न देना, मगन रहना

कुछ वर्ष पहले तक यह शब्द जनमानस में सर्वाधित प्रचलित था – बोर हो गए। पर अब शायद ही कोई ऎसा बचा होगा जिसके मुँह से यह शब्द निकले कि बोर हो गए या बोर हो रहे हैंं।

पहले लोग मुँह बनाते हुए इस शब्द का दिन-रात में कई-कई मर्तबा उच्चारण कर दुःखी होते थे। लोग अपने इस दुःख को बार-बार सार्वजनिक रूप से अभिव्यक्त करते थे और वह भी पूरे गर्व के साथ।

बोर होना अपने आप में वह राष्ट्रीय समस्या थी जिसके कारण लोग अक्सर ऎसे दिखा करते थे जैसे कि किसी के शोक में डूब गए हों। किसी भी तरह की प्रतीक्षा में बैठे हों, वहाँ समय पर नंबर न आने, देरी होने तथा चुपचाप बैठे रहने की विवशता की स्थिति में हर आदमी बोर होने की बात करता था। दुनिया के अधिकांश लोग बोर होने की महामारी से ग्रस्त रहा करते थे।

भला हो संचार क्रांति का कि हम सभी लोग इस बीमारी से मुक्त हो गए हैं। यह कहना और अधिक प्रासंगिक होगा कि हममें से बहुसंख्य लोग ‘बोरियत मुक्त’ हो गए हैं और यह सब देन है आधुनिक संचार क्रांति के महाजनक मोबाईल की।

अब कोई बोर नहीं होता, न किसी को होने देता है। अब सब कुछ उल्टा होता जा रहा है। लोग बोर होने की बजाय अब समय चुराने लगे हैं। अब बोरियत किसी क्षण नहीं होती बल्कि अब समय कम पड़ने लगा है। जहाँ कहीं कोई देर-दार होती है वह अब हम लोगों के लिए वरदान सिद्ध हो चुकी है।

दिन और रात में चाहे जहाँ लगे कि एकान्त मिला है, हम सब लग जाते हैं मोबाईल से बात करने। इससे कई सारे फायदे एक साथ होने लगे हैं। दो लोग हमेशा व्यस्त रहते हैं, इनकी वजह से दूसरे लोग भी मुक्त महसूस करने लगे हैं।

लोग-बाग बातचीत करने में मिनटों से घण्टों तक लगाने लगे हैं। और कुछ नहीं व्हाट्सएप, फेसबुक और दूसरी बहुत सारी साईट्स हैं, फिल्मों और गानों की इतनी अधिक भरमार है कि सुनते ही जाओ, महीनोें और बरसों तक कोई कमी नहीं आए।

फिर उन स्मार्ट फोन धारियों के तो कहने ही क्या जिनको अपने बाड़ों और परिसरों में मुफ्त के वाय-फाय सिग्नल भरपूर मात्रा में उपलब्ध हैं। इनके लिए कर्मयोग के साथ मनोरंजन और चैटिंग से लेकर वह सब कुछ आनंददायी हो गया है जो इनको हर किस्म का सुकून दे रहा है।

ऊपर से मुफतिया अपलोडिंग व डाउनलोडिंग की सुविधा का सदुपयोग करने वाले इनसे बेहतर और कौन हो सकते हैं। यही वे लोग हैं जो बिना पैसे खर्च किए सारी अत्याधुनिक सुविधाओं का जमकर लाभ पाने में रमे हुए हैं।

बच्चों से लेकर बूढ़ों, दुर्गम क्षेत्रों, पहाड़ी इलाकों से लेकर गाँव-कस्बों, शहरों और महानगरों तक में रहने वाले तमाम किस्म के लोगों के पास मोबाइल सुविधा उपलब्ध है जिसकी वजह से आजकल हर कोई आत्ममुग्ध व्यस्तता का आनंद ले रहा है।

दुनिया की आधी से ऊपर आबादी मोबाइल पर हमेशा भिड़ी रहती है। यही वजह है कि हर कोई अब व्यस्त नज़र आता है। कोई किसी से बतियाने का आनंद पा रहा है तो कोई गाने सुनने, पिक्चर और वीडियों का मजा पा रहा है। सब लोग अपने-अपने हिसाब से मोबाइल के जरिये दुनिया भर का लुत्फ उठा रहे हैं। जिसे सनक चढ़ी नहीं कि मोबाइल का चक्कर शुरू। कइयों के लिए तो यह तलब ही हो गया है।

जिसे जहाँ फुरसत मिली नहीं कि लग जाता है मोबाइल से खेलने। बच्चों के लिए जैसे खिलौनों का महत्त्व है वैसे ही अब हर आयु वर्ग के इंसान के लिए  मोबाइल हो गया है। खिलौनों की किस्में अलग-अलग हैं मगर उपयोग एक सा ही।

शादी-ब्याह का मौका हो या फिर श्मशान घाट पर दाह संस्कार का वक्त। या और कुछ। सभी जगह मोबाइल अपनी उपयोगिता सिद्ध करता हुआ हम सभी को धन्य कर रहा है।

सभी प्रकार के लोग मोबाइल युग में जीने के आदी हो गए हैं। घर-परिवार, समाज और देश के लिए मोबाइल ही है जो सबसे अधिक उपयोगी और प्रभावी सिद्ध हो रहा है। ये मोबाइल न हो तो अब आधी दुनिया आत्महत्या ही कर ले, खूब सारे लोग पागल हो जाएं और दूसरों की जाने क्या गति हो जाए।

सबको काम मिल गया है। काम वालों की स्पीड़ बढ़ गई है और बिना काम वालों को पक्का काम मिल गया है। खुद भी व्यस्त रहो, दूसरों को भी व्यस्त रखो। समाज और देश पर इससे बड़ा हमारा उपकार कुछ और हो ही नहीं सकता।

हमारी पारस्परिक संवेदनाओं और एक-दूसरे के लिए काम आने की भावनाओं को कोई साकार कर रहा है तो वह यब मोबाइल ही है। जिन लोगों के पास मोबाइल है, जो लोग दिन-रात वजह-बेवजह इसके इस्तेमाल का आनंद पा रहे हैं, वे सभी लोग धन्य हैं, उनके उपकार को कोई भुला नहीं हो सकता।

3 thoughts on “अब आ गए नए जीव – मोबाइल घूस्सू

  1. अब आ गए हैं
    मोबाइल वाले भूत-पलीत, प्रेत-पिशाच, वंत्रियां और ब्रह्मराक्षस…

    इन्हें न अपनों से कोई मतलब है, न माँ-बाप, पति-पत्नी, भाई-बहन, घर-परिवार के लोगों, कुटुम्बियों से, न समाज, परिवेश, क्षेत्र और देश से। ये अपने मोबाइल अस्त्रों के साथ अपने आप में ही खोए हुए हैं। कई तो इतने डूबे हुए हैं कि अपने आपे तक में नहीं हैं।
    कोई स्वयं में आत्ममुग्ध होकर जीने लगा है, कोई किसी और में खोया-चिपका हुआ आनंद का अनुभव कर रहा है। सारे के सारे मुन्ना भाई और मुन्नी बहनें लगी हुई हैं इस खिलौने के साथ। कहीं यह खिलौनों की तरह मनोरंजन करता है, कहीं टेड़ी बीयर की तरह अठखेलियां करता नज़र आता है और कभी बिजूकों या कठपुतलों-कठपुतलियों की तरह तरह-तरह की ध्वनियों को तैराता हुआ हिलता-डुलता।
    ईश्वर की तरह सर्वग्राही व सर्व व्यापक भी है और रसोई से लेकर पूजाघर और सड़कों से लेकर शौचालयों तक यह सदा पवित्र व सर्वस्पर्शी होकर निर्बाध आवागमन का लाइसेंस प्राप्त भी। अब कोई नहीं कहता कि बोर हो रहा हूं। जहां प्रतीक्षा वहां मोबाइल देव हाजिर। सबके सब भिड़े हुए हैं आँखें गड़ाए। चलने दो जो चल रहा है, आखिर कभी तो इसका अंत आएगा की। संयम से न आ पाएगा तो प्रकृति डण्डे मारकर सब कुछ सिखा देगी।

    http://drdeepakacharya.com/now-come-mobile-ghost/

  2. अब बोर तो कोई हो रहा है, मोबाइल फोबिया नामक बीमारी ने जकड़ लिया है, लेकिन उन्हें इसकी कोई फिक्र नहीं। क्योंकि आखिर बोरियत से तो राहत मिल गई। चाहे अब पत्नी बच्चे तो क्या अब तो अपने आप के लिए भी फुर्सत नहीं है।
    इस मोबाइल देवता ने अब युवाओं के पेट की बुक को ही मिटा दिया है तभी वे अक्सर कभी भी समय पर ना खाते हैं ना ही पानी पी पाते। क्योंकि उनके पास समय ही नहीं है अब वह इतने व्यस्त हैं।

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