सामान्य जन ही है हमारा आईना, वही है सटीक मूल्यांकन

हमारे व्यक्तित्व का पैमाना वे लोग नहीं हुआ करते हैं जिनसे हम जुड़े हुए हैं। चाहे स्वार्थ से जुड़े हुए हैं या समाज, जाति, क्षेत्र और विचारधारा या और किसी गोपनीय अथवा अज्ञात कारणों से। हमारे व्यक्तित्व का निर्णय वे लोग नहीं करते जो रुपए-पैसों या पदों से  अथवा अपने किसी न किसी रौब से प्रभावशाली हैं, या हमारे नाते-रिश्तेदार और कुटुंबी हैं, वे भी नहीं कर सकते जो कि अपने साथ किसी न किसी अपराध बोध या संयुक्त आपराधिक भागीदारी या भ्रष्टाचार में रमे हुए होें बल्कि हमारे बारे में स्वस्थ, निरपेक्ष और सटीक तथा खरी-खरी निष्कर्ष वे ही लोग निकाल सकते हैं जिनसे हमारा न कोई स्वार्थ है, न कोई संबंध। 

पैसे वालों, पूंजीपतियों, पदों और मदों वालों, भयभीत कर देने वालों से लेकर हर तरह के स्वार्थ पूरे कर देने वालों के काम तो कोई भी कर सकता है। जो बिकाऊ है वह भी, और जो भयभीत है वह भी। हमारी महानता इसमें नहीं है कि हम बड़े लोगों के काम चंद मिनटों में निकाल दिया करते हैं बल्कि हमारी महानता इसमें है कि हमारे जिम्मे जो भी काम आते हैं उन्हें बिना किसी देरी या पक्षपात के पूर्ण कर  दें और हमारे कारण किसी के काम कहीं अटके नहीं।

जो व्यक्ति हमारा किसी भी प्रकार से परिचित नहीं हो, उसका हमसे किसी भी प्रकार का कोई काम पड़ जाए, और ऎसे में हम बिना किसी अपेक्षा के उसका काम सहज भाव से इस प्रकार संपादित कर दें कि किसी भी प्रकार का समय जाया न हो, यही हमारे मूल्यांकन का स्वस्थ आधार है जो हमारे व्यक्तित्व की गंध चहुँ ओर बिखेरता है और हमारे लिए दुआओं का नया संसार रचता है।

यही दुआएं हमारे लिए उस समय काम आती हैं जब हम सब ओर से निराश और हताश हो जाते हैं अथवा लोग हमारा साथ छोड़कर चले जाते हैं। आजकल हर इंसान अपने आपको ट्रस्टी मानने की बजाय सर्जक और स्वामी समझ बैठा है और इस कारण से व्यक्ति के मन में अहंकार और तन में अकड़न का जो दौर चल पड़ा है वह पूरे देश में आसानी से दिखाई देने लगा है।

हर आदमी इस गलतफहमी में जी रहा है कि सामने वालों को बार-बार चक्कर देते रहो, उनका टाईम बरबाद करते रहो और तब तक कामों को लटकाए रखो जब तक कि कोई मलाई-मक्खन, चाशनी या जलेबियों की गंध न आने लगे। 

इंसान के रूप में सबसे सफल कोई व्यक्ति कहा जा सकता है तो वह वही हो सकता है  जो अपने फर्ज अदायगी के समय भगवान और धर्म, सत्य एवं ईमान को सामने रखकर काम करे और जो कोई व्यक्ति उसे संपर्क में आए, उसका काम जितना जल्द हो सके, निपटाए।

अपने संपर्क में आने वाले लोेगों के मन में हमारे तथा हमारे कामों के प्रति श्रद्धा या विश्वास की भावना न हो, तो हमें आदमी होने की बजाय किसी नदी की चट्टान होना चाहिए था।  कुछ लोग ऎसे होते हैं जो न किसी का काम करते हैं, न किसी के काम आते हैं बल्कि अपने ही स्वार्थों के मकड़जाल में उलझे रहते हैं।

ऎसे लोगों के लिए दुनिया अपने आप में भार है, तथा दूसरे लोगों के लिए ये लोग भार स्वरूप ही हैं। कई सारे लोग ऎसे हैं जो प्रभावशाली लोगों का काम तो वीआईपी ट्रीटमेंट देकर चंद मिनटों में कर डालते हैं और पूरा का पूरा श्रेय अपनी झोली मेंं डाल दिया करते हैं जबकि सामान्य लोगों का कोई सा काम ये कभी समय पर नहीं करते, और न निरपेक्ष भाव रखते हैं।

एक आम आदमी हमारा रेफरी है जो यह तय करता है कि हम कैसे हैं। आम इंसान में वो क्षमता होती है कि दूध का दूध पानी का पानी कर  सकता है। उसे अच्छी तरह पता होता है कि कौन कितने पानी में है। मगर अपनी शालीनता की वजह से वह जुबाँ खोल नहीं पाता।

हमारे अपने बारे में हमारे आस-पास के लोग चाहे कितने ही तारीफ के पुल बाँध दें, हम कितने ही बड़े-बड़े और प्रभावशाली लोगों की छत्रछाया के बैक्टीरिया बनकर क्यों न किसी कोने में दुबके रहें, अपने आपको कितना ही फूला-फूला कर बड़ा मानने का भ्रम क्यों न पाल लिया करें।

हकीकत का पैमाना तो आम आदमी ही होता है, ये बड़े लोग चाहे कितनी बड़ाई कर लें उसका कोई अर्थ नहीं। अपने बारे में आमजन की धारणाएं ही वह पैमाना होती हैं जो जीते जी हमारे पाप और पुण्य का लेखा-जोखा कहलायी जा सकती हैं।

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