नालायकों का सबसे बड़ा हथियार है असहयोग

नालायकों का सबसे बड़ा हथियार है असहयोग

जिन लोगों को एक ही तरह के बाड़े में वर्षों गुजारते रहने की आदत पड़ जाती है वे लोग यह कभी बर्दाश्त नहीं करते कि नई हवाओं की ताजगी आए, कोई अच्छा काम करने वाला उनके वहाँ आ जाए।

ऎसे लोगों का सबसे बड़ा हथियार असहयोग है। आजकल बहुत जगहों पर पुराने पापियों और मठाधीशों के डेरे हैं जो बरसों से अपनी चवन्नियां चलाने के अभ्यस्त हैं। ऎसे लोग कभी नहीं चाहते कि उनकी सत्ता, आरामतलबी या आनंद छीन जाए, ऎसे लोग अपने साथ वालों के साथ मिलकर असहयोग का हथियार उठा लेते हैं।

इस स्थिति में कर्मयोग में निष्ठा रखने वाले लोगों के सामने दो ही रास्ते हैं। या तो इन यथास्थितिवादी मठाधीशों और महंतों के सामने हथियार डालकर चुपचाप बैठे रहें, अथवा वहां से पलायन कर जाएं। तीसरा रास्ता इन बाड़ों की सफाई का भी है लेकिन इसमें सभी बड़ी बाधा वे लोग हैं जो इनसे बड़े मठाधीश हैं जो इन्हीं के तरह के समानधर्मा होते हैं।

सिद्धान्तवादी और ईमानदार लोगों की खासियत यह है कि वे सिद्धान्त छोड़ नहीं सकते। स्वाभिमानी भी इतने कि घटिया लोगों के सामने झुक नहीं सकते।

यही कारण है कि सज्जन और अच्छे लोग अपनी दैवीय ऊर्जा नष्ट करने की बजाय इन सडान्ध भरे बाड़ों से सायास पलायन करने के लिए सदैव प्रयत्नशील रहते हैं।

इन प्रयासों में सफलता मिल जाए तो यह मान लेना चाहिए कि हमारा भाग्य अच्छा है। और असफलता हाथ लगे तो यह मान लें कि पूर्वजन्म के किसी पाप की वजह से गंदे और बदबूदार डेरों में आसुरी और पाशविक लोगों के बीच  उतने दिनों तक रहना ही है जितने दिन तक किस्मत में लिखा हुआ है।

यह भी शाश्वत सत्य ही है कि सज्जनों की मुक्ति और आनंद के रास्ते इन्हीं सड़ान्ध भरी गलियों और बदबूदार बाड़ों की बस्तियों से होकर गुजरते हैं, इस ईश्वरीय भौगोलिक संरचना को दरकिनार करना इंसान के बस में नहीं है।

अपने आपको अमर मानकर तरह-तरह के बाड़ों में गंदगी फैलाने वाले मोटी चमड़ी वाले स्वयंभू  और खुद को ईश्वर से अधिक शक्तिशाली मानने वाले लोगों पर कोई असर होने वाला नहीं है।

ईश्वर सभी सज्जन लोगों को शक्ति दे ताकि वे नैष्ठिक कर्मयोग को अपनाते हुए समाज और देश की निष्काम सेवा की ओर अग्रसर बने रहें।