न युग सुधरेगा, न हम

न युग सुधरेगा, न हम

बरसों से कहा जाता रहा है- हम सुधरेंगे, युग सुधरेगा। पर दशकों बाद भी यह उक्ति सार्थक नहीं हो पायी है और आज भी हम वहीं के वहीं ठहरे हुए हैं, न सुधर पाए हैं, न किसी को सुधार।

बचपन से लेकर पचपन तक की बात हो या फिर साठ पार से लेकर शतायु पार तक के लोगों की। कोई सा आयु वर्ग हो, सभी में सुधार की गुंजाईश बनी रहती है।

कुछ फीसदी लोग हो सकते हैं जो कि कलियुग की छाया से दूर रहकर अपने आपको संयमित और विकसित कर इस तरह निखर गए हों कि उन्हें रोल मॉडल के रूप में जाना जाता रहा हो लेकिन अधिकांश के बारे में कहा जा सकता है कि उनका व्यक्तित्व विकास मरते दम तक नहीं हो पाता है और उनमें सुधार की अपार संभावनाएँ हमेशा बनी रहती हैं।

इनसे मिलने वालों को हमेशा यही अनुभव होता है कि इन लोगों में बहुत सी कमियाँ हैं जिनमें सुधार आए बगैर इन्हें मनुष्य के रूप में स्वीकार करना संभव नहीं है। दुनिया में व्यक्तित्व विकास  से बढ़कर और कोई कठिन कार्य है ही नहीं।

पदार्थ जगत की प्राप्ति से लेकर दुनिया के तमाम मायावी कर्मों में सफलता और प्राप्ति के मार्ग पाए जा सकते हैं लेकिन अपने व्यक्तित्व का आदर्श विकास करने का धर्म बहुत कम लोग ही अपना पाते हैं। जो लोग मनुष्य के रूप में अपने आपको स्थापित करने की क्षमताएं रखते हैं वे लोग जगत में अपनी विशिष्ट छवि बना पाने में सफल हो जाते हैं जबकि शेष के लिए जीवन पृथ्वी पर जैसे-तैसे टाईमपास करने के सिवा और कुछ नहीं रहता।

इंसान के बारे में साफ तौर पर कहा जा सकता है कि वह उन्मुक्त स्वेच्छाचारी और स्वच्छन्द जीवन जीने का आदी होता जा रहा है और इस चक्कर में वह मर्यादाओं का व्यतिक्रम करना अपनी आदत बना डालता है। इसका नतीजा यह होता है कि मर्यादाओं, अनुशासन और विवेक के मूल्यों से परे होता चला जाता है और जितना वह मर्यादाओं से दूर होता जाता है उतना ही इंसानियत को खोता चला जाता है।

आज के इंसान की हरकतों, कारगुजारियों और करतूतों को देखना हो तो सबसे अधिक आसान है सोशल मीडिया, जहाँ कहीं कोई वर्जना नहीं है, सब कुछ उगला जा रहा है, वमन किया जा रहा है और इधर से आयात कर उधर इतना कुछ परोसा जा रहा है कि किसी को कोई सूझ ही नहीं पड़ रही है कि क्या अच्छा और क्या बुरा है, तथा क्या कुछ परोसने लायक है।

अनपढ़ों से लेकर पढ़े-लिखों, बुद्धिजीवियों और बौद्धिक अजीर्ण से ग्रस्त प्रबुद्धजनों तक की हालत ऎक जैसी हो गई है। बात व्हाट्सअप या फेसबुक की हो अथवा किसी भी प्रकार की सोशल साईट की।

इनके उद्देश्यों और उपयोग की समझ से अनजान लोग खिलौनों की तरह इनका इस्तेमाल कर रहे हैं और हर कोई भिड़ा है मनोरंजन करने में। व्यक्तित्व विकास और घर-परिवार तथा अपने कर्मयोग से जुड़े कामों से भी कहीं अधिक महत्व दिया जाने लगा है सोशल साईट्स पर परोसगारी में।

नब्बे फीसदी कचरा इधर से उधर आयात-निर्यात किया जा रहा है और हम स्वच्छ भारत अभियान की सफलता को लेकर फूले नहीं समा रहे हैं।

पदार्थ जगत का पूरा का पूरा कचरा अब सोशल साईट्स पर बिखेरा जा रहा है। सामाजिक मूल्यों, नैतिकता, चरित्र, राष्ट्रीय सरोकारों से लेकर हर मामले में कचरा ही कचरा परोसा और पसराया जा रहा है।   कोई सा ग्रुप देख लिया जाए, हर तरफ भाई लोग कचरा फैला रहे हैं, कहीं रायता फैला रहे हैं।

हर ग्रुप को देख कर लगता है कि जैसे देश में मनोरंजन का बड़ा भारी संकट पैदा हो गया है या कि देशवासियों को बौद्धिक अजीर्ण होता जा रहा है, या फिर आगे से आगे रहने के फेर में हर तरह का कचरा पसराने का काम पूरी शिद्दत से किया जा रहा है।

अपने कर्तव्य, कर्म और सामाजिक एवं आंचलिक दायित्वों, कौटुम्बिक सम्पर्क व सान्निध्य को भुला कर हर तरफ हालात विषम होते जा रहे हैं। हम इतने अधिक लज्जाहीन, बेशर्म और जड़ होते जा रहे हैं कि बार-बार चेतावनियों के बावजूद हमारे कानों पर जूं नहीं रेंगती, जिसे जो मन में आ जाए वह इधर से उधर फेंकने लगा है। हर ग्रुप का उद्देश्य अलग होता है किन्तु मनोरंजन को ही जिन्दगी समझ बैठे मूर्ख लोगों की इतनी अधिक भीड़ हर तरफ जमा हो गई है कि जिसे इसी में मजा आता है।

लगता है कि जैसे व्हाट्सअब, फेसबुक कोई सोशल साईट्स न होकर भेल-पूरी, कचोरी, गराडू, फास्ट फूड़ की ब्राण्डेड दुकानें ही हो गई हों या फिर स्वच्छ भारत मिशन के डम्पिंग यार्ड।  नब्बे फीसदी माल-मसाला घटिया, अनुपयोगी और टाईमवेस्ट करने वाला हो गया है।

इंसान के लिए उपयोगी विचारों और जानकारी का प्रतिशत घटता जा रहा है। गुड मॉर्निंग, गुड नाईट और तमाम तरह के संदेशों की रोजाना हो रही बरसात को देखकर लगता है कि ज्ञान, विद्वत्ता और महानता के बादल ही फटे जा रहे हों।

मूर्ख और नाकारा लोगों को हमेशा टाईमपास खिलौने और इंसानों की जरूरत रहा करती है और आज की सोशल साईट्स, तमाम जाति-प्रजातियों के व्हाट्सअप ग्रुप अपनी अर्थवत्ता खोते जा रहे हैं।  हम सारे लोग या तो जासूस हो गए हैं या फिर खोजी।

यही सब चलता रहा तो दिमागी पागलपन और शारीरिक विकृतियों और अक्षमता लाने वाली बीमारियों के सर्जक के रूप में सोशल साईट्स भी गिनी जाने लगेंगी।  हम लोग नकलची बंदर-भालुओं की तरह व्यवहार करने लगे हैं। खुद का दिमाग या तो है नहीं, अथवा लगाना नहीं चाहते। हर मामले में नकलची बनते जा रहे हैं।

बात संदेशों, फोटो, विचारों की हो या फिर जीव और जगत के किसी भी क्षेत्र की, हम हर मामले में अपने आपको विद्वान और जानकार मानकर इतरा रहे हैं और अपनी फितरत दर्शाते हुए औरों पर जो सामग्री थोंपते चले जा रहे हैं यह अपने आप में आतंकी कार्यवाही से कम नहीं है।

पता नहीं हम कब सुधरेंगे या कि कभी सुधर भी पाएंगे अथवा नहीं, क्योंकि वर्तमान हालातों को देखकर तो यही लगता है कि हम उन लोगों में से हैं जो मरे नहीं सुधरने वाले। लगता है युग सुधरेगा तभी हम सुधर पाएंगे। और यह युग कभी सुधरने वाला नहीं।  हम बिना सुधरे ही नरकगामी होंगे।

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