न शिव की समझ है, न सावन की

न शिव की समझ है, न सावन की

इन दिनों चारों तरफ शिवोसपाना की गूंज है। शिव कल्याणकारी देव हैं जिन्हें हर क्षण हमें भजना चाहिए लेकिन हमने सारे देवी-देवताओं को वार, महीनों और उत्सवों में बाँट दिया है ताकि साल भर उनके नाम कुछ करने की नियमित जिम्मेदारी से बचे रह सकें।

सोमवार, श्रावण मास, मंछाव्रत चतुर्थी, शिवरात्रि आदि को हमने  शिवजी के लिए आरक्षित कर रखा है।  इन दिनों श्रावण मास चल रहा है और देश का कोना-कोना शिवजी की महिमा, स्तुतिगान और शिवभक्ति में डूबा हुआ है।

हम बरसों से शिव और उनके मास सावन को धार्मिक महत्व का मानकर पूजते आ रहे हैं और तमाम प्रकार के कर्मकाण्डों में अधिक फंसे हुए हैं हमने न तो शिव उपासना के रहस्य को आत्मसात करने की कभी कोशिश की है और न ही सावन मास के महत्व को।

हमने शिवोपासना के नाम पर केवल यही सिखा है कि कुछ न कुछ कर्मकाण्ड करते रहो ताकि अपनी मनोकामनाएं पूरी होती रहें और इसी तरह जिन्दगी कटती रहे। हमने अपनी सारी उपासना पद्धतियों को इच्छाओं के फेर में देखने की आदत पाल ली है।

नगण्य सच्चे भक्तों को छोड़ दिया जाए तो लगभग सभी लोगों ने यह मान लिया है कि भगवान का एकसूत्री काम उनकी अतृप्त वासनाओं को तृप्त करना और मनमानी इच्छाओं को पूरी करने-करवाने तक ही सीमित है इसके सिवा भगवान और उसकी भक्ति किसी काम की नहीं।

कोई सी कामना सामने आ जाए या कोई सा दुःख दिख जाए, उसके निवारण के लिए हम पीछे पड़ जाते हैं भगवान के, और कोई न कोई उपासना पद्धति या कर्मकाण्ड का प्रचलित तरीका अपना कर साधना शुरू कर देते हैं।

थोड़ा-बहुत काम हुआ नहीं कि फिर लौट आते हैं उदासीनता या सांसारिक कर्म में। न हमें आत्म तत्व की प्राप्ति की कामना है, न भोलेनाथ या दूसरे भगवान से साक्षात्कार की कोई तमन्ना है, न हम जगत और जीवों के कल्याण के लिए कुछ सोचना चाहते हैं।

मनमाने कामों की पूर्ति को आसान बनाने के लिए भगवान का सहारा लेने के लिए हम भागते और भटकते फिर रहे हैं। बहुत से लोगों के लिए भगवान भी भूत-प्रेतों की तरह ही हैं जिन्हें खुश करने के तमाम जतन करते हुए अपने काम निकलवाने और मनमानी को मूर्त रूप देने से कहीं कोई ज्यादा नहीं हैं।

मन्दिरों में मत्था टेकने जाने वालों में चन्द भक्ताें को छोड़कर सभी किसी न किसी इच्छा की पूर्ति, शत्रुओं पर वशीकरण या उच्चाटन, काम-धंधे में बरकत, समृद्धि, जमीन-जायदाद और गाड़ी-घोड़े, जीवनसाथी पाने आदि के लिए प्रार्थना करने ही जाते हैं।

शिव और सावन के महत्व से बेखबर हम लोग पूजा-पाठ, कर्मकाण्ड, मंत्र और टोने-टोटकों से अभी उबर नहीं पाए हैं।  शिव की वैदिक उपासना से लेकर पौराणिक पूजा-पाठ तक सभी में शिव को प्रकृति का आदि देवता स्वीकारा गया है और प्रकृति आज की सीमेंट-कंक्रीट, लौह-लक्कड वाली नहीं बल्कि वह होनी चाहिए जो कि नैसर्गिक मौलिकता से परिपूर्ण है, जिसमें पंच तत्वों का भरपूर समावेश और दिग्दर्शन है तथा जहाँ आने व ठहरने पर आत्मीय प्रसन्नता, अगाध श्रद्धा और असीम शांति का अनुभव होता है। आज हम जिस शिव की कल्पना कर रहे हैं,

वास्तव में उस शिव का आदि शिव से कोई लेना-देना नहीं है बल्कि शिवालयों के नाम पर हमने संकीर्ण घरौंदे बनाकर शिवलिंग स्थापित कर दिए हैं जिनके भीतर न कोई दैवत्व है न दिव्यत्व।

यह बात हम सभी को जान लेनी चाहिए कि शिव वहीं विराजमान रहते हैं जहाँ प्रकृति के सभी उपादान भरपूर मात्रा में विराजमान हों, एकान्त और नीरवता हो, पेड़-पौधे,पानी, हरियाली, जंगल और प्रकृति का ऎसा उन्मुक्त आंगन हो, जहाँ दूर-दूर तक कोई शोर न हो, ध्यान में बाधा उत्पन्न करने वाला कोई शोर या अवरोध न हो।

शिव अकेले कहीं निवास नहीं करते बल्कि उनका पूरा परिवार साथ रहता है, सभी प्रकार के गण और अनुचरों की फौज उनके साथ रहती है। और इन सभी के रहने के लिए विस्तृत परिसर, परिक्रमा स्थल आदि का होना जरूरी है।

आजकल देखा यह जा रहा है कि मन्दिरों के परिक्रमा स्थल और आस-पास पूरे परिसर में दुकानें स्थापित हैं, माईक और दूसरे सभी प्रकार के शोरगुल हावी हैं और शिवालय के नाम पर मात्र एक छोटी सी कोठरी ही बची रह गई है।

ऎसे में शिव ही नहीं शिव कोई गण भी वहाँ नहीं रहता। ऊपर से मूर्ख पुजारियों, शिव के नाम पर दुकानें चला रहे ठेकेदारों ने माईक से निरन्तर महामृत्युन्जय, शिव पंचाक्षरी मंत्र, भजन और स्तुतियां लगवाकर मन्दिर का माहौल अशान्त कर रखा है। जहां न कोई एकाग्र होकर ध्यान कर सकता है और न ही भोलेनाथ की प्रसन्नता के लिए कोई वैदिक या पौराणिक स्तोत्र पाठ।

प्रदोष व श्रावण में तीनों प्रहर अभिषेक का विधान भी है लेकिन नासमझ और मूर्ख शिवभक्तों ने शिव को इस कदर नज़रबंद कर दिया है कि फूलों और तरह-तरह के श्रृंगार से उसे पूजनीय की बजाय दर्शनीय होने तक सीमित कर दिया है।

शिवलिंग के श्रृंगार का कहीं कोई विधान नहीं है लेकिन दुनियावी आकर्षण और चकाचौंध से लोगों को आकर्षित करते हुए पैसा बनाने के चक्कर में पण्डों, पुजारियों और शिवभक्ति का ढोंग करने वाले लोगों ने शैव उपासना को मटियामेट करके रख दिया है।

सावन में शिव पर अर्क व धतुरा पुष्प, बहुत बड़ी संख्या में बिल्व पत्र, पुष्प आदि चढ़ाकर पुण्य कमाने का कर्मकाण्ड भी परवान पर रहता है। शिवभक्तों को यह पता नहीं है कि यह प्राकृतिक सामग्री केवल वही उपयोग में ला सकता है जिसने बिल्व सहित दूसरे वृक्ष लगाए हों।

शिव तभी जीव का कल्याण कर सकता है कि जब जीव स्वयं शिव के द्वार आकर इन्हें समर्पित करे। कोई दूसरा कितने ही लाख बिल्व पत्र चढ़ा दे, टनों दूध से अभिषेक कर दे, हजारों लघु रूद्र कर डाले, लाखों जप कर डाले, इसका कोई खास महत्व नहीं है। यह स्वयं शिवभक्त को अपने शरीर से करना चाहिए तभी फल प्राप्त हो सकता है।

शिव को पाने के लिए पहले शिव के लिए प्रकृति की पूजा करें, पेड़-पौधे लगाएं, जलाशयों को आबाद करें, खुले परिसर छोड़ें, हरियाली लाएं और चतुर्दिक वातावरण को एकदम शांत रहने दें, तभी शिव की प्रतिष्ठा संभव है।

अन्यथा शिवभक्ति के नाम पर हम लोग बरसों से पाखण्ड कर ही रहे हैं, कौर रोकने वाला है। चारों तरफ अंधविश्वासियों की भारी भीड़ अपनी चवन्नियां चला रही हैं।

बाबाओं, पुजारियों से लेकर पण्डितों और हर-हर महादेव, जय महादेव का उद्घोष करते हुए शिवभक्ति का सार्वजनीन प्राकट्य करने वाले लोग बरसों से शिवजी के निमित्त बहुत कुछ कर या करवा रहे हैं और फिर भी वहीं के वहीं हैं जहां बरसों पहले थे। बरसों बाद भी वहीं रहने वाले हैं। हर-हर महादेव ।

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  1. हर हर महादेव