न राजधरम, न राम धरम

न राजधरम, न राम धरम

देश की सबसे बड़ी समस्या एकमात्र यही है कि हमें जो काम करना चाहिए उसे हम न तो फर्ज मानते हैं और न ईमानदारी से करते हैं और दूसरी तरफ उन सारे कमों-कुकर्मों में पूरी दिलचस्पी लेते हैं जो  हमें नहीं करने चाहिए।

कर्म, कर्महीनता और कुकर्म इन तीनों के बीच की खायी इतनी अधिक बढ़ती जा रही है कि समाज और देश का कबाड़ा हो रहा है। हमारी सबसे बड़ी गलती यही है कि हम बुरे को बुरा कहना नहीं चाहते और अच्छे को अच्छा कहने में ईर्ष्या महसूस होती है।

जो बुरे हैं वे सारे के सारे या तो पशुबुद्धि हैं अथवा लूटेरे, हिंसक और असुरवृत्ति वाले। और ये सारे लोग संगठित हैं इसलिए उनके भय के मारे हम कुछ कह नहीं पाते। दूसरा इन्हीं बुरे लोगों से हमारे नाजायज कामों और स्वार्थों  की पूर्ति होती है, हमें अपने आत्महीन व्यक्तित्व व अपराधबोध को हल्का करने तथा अपराधों को ढंकने का अभेद्य सुरक्षा कवच इन्हीं लोगों से प्राप्त होता है। इसलिए हम इनसे बिगाड़ना नहीं चाहते।

हमारे पुरखों में तो वो दमखम था कि अकेले अपने बूते पर संसार को हिला सकने की क्षमता रखते थे। एक हम हैं जो निकम्मे वंशजों के रूप में खुद को भी हिला-डुला नहीं पाते। हम हर मामले में औरों पर आश्रित-पराश्रित और निराश्रित होकर अपने स्व अस्तित्व को भूल गए हैं।

एक तरफ बुरे और निकम्मे लोगों को रोकने-टोकने से बचते रहते हैं और दूसरी तरफ उनकी गुप-चुप और पीठ पीछे आलोचना भी करते रहते हैं। इन आलोचनाओं से कोई फर्क नहीं पड़ता।

बुरे, निकम्मे और कामचोर लोगों के लिए सतर्कता, कड़ी निगरानी और कठोर दण्ड का प्रावधान होना जरूरी है।  इसके अभाव में ही सामाजिक और परिवेशीय विषमताओं का दौर-दौरा परवान पर है।

होता यह है कि कामचोरों और बिना मेहनत किए सब कुछ पा जाने वालों की मौज-मस्ती और बेपरवाही की वजह से उन लोगों पर काम का बोझ इतना अधिक बढ़ जाता है कि जो कि पूरी वफादारी, स्वामीभक्ति, ईमानदारी और पारदर्शिता के साथ नैष्ठिक रूप से अपने दायित्वों को पूरा करते हैं और वह भी पूरी गुणवत्ता और बेहतरी के साथ।

काम करने वाले लोगों के साथ हर तरह से अन्याय, शोषण और दबावों का माहौल बना रहता है जिसकी वजह से मानसिक तनाव और शारीरिक क्षरण का ऎसा कुचक्र चलता रहता है कि इसका कोई समाधान नहीं है।

ऊपर वाले लोग अपने से ऊपर वालों की निगाह में आने और प्रिय पात्र बने रहकर वाहवाही लूटने के लिए नए-नए हथकण्डों और नवाचारों के सब्जबाग और तिलस्म दिखाकर भरमाने और सुनहरा टाईमपास करते रहने के लिए हर तरह की करामातों और फालतू के फण्डों को आजमाते रहते हैं।

और इसका सीधा असर पड़ता है नीचे वालों पर, और वह भी उन पर जो बेचारे गधामजूरों की तरह काम करने वाले आज्ञाकारी, ईमानदार, विनम्र, सुशील और धीर-गंभीर हुआ करते हैं।

ये लोग अपने घर-परिवार से भी बढ़कर अपनी ड्यूटी को मानते हैं और इनसे ड्यूटी लेने वालों के लिए ये वरदान ही सिद्ध होते हैं। हर कोई चाहता है कि काम अच्छा हो तथा समय पर हो ताकि ऊपर वाले देवी-देवता, भूत-पर््रेत और पितर खुश रहें।

इस परम लक्ष्य को सामने रखने वाले लोगों के लिए निकम्मे, नालायक और नुगरे कामबिगाडू लोग हमेशा हाशिये पर रहते हैं। कोई नहीं चाहता इन नाकाराआें से काम लेना, क्योंकि इनके बारे में यह जगप्रसिद्ध रहता है कि ये दुनिया के सर्वाधिक निकम्मे, व्यसनी, दुराचारी, शिकायती, आलसी, काम बिगाड़ने वाले और प्रमादी होते हैं।

इन लोगों की यह यश-कीर्ति एक से दूसरे आकाओं तक अपने आप पहुँचती रहती है कि ये लोग दुनिया के निकम्मों में सर्वश्रेष्ठ हैं और इन लोगों से कोई काम लेने का मतलब है काम बिगाड़ना और अपनी किरकिरी कराना। ,

देश में समाज-जीवन के विभिन्न क्षेत्रों में आजकल खूब सारे ऎसे लोगों का बोझ बढ़ता जा रहा है जो न तो किसी काम के हैं और न कोई काम करना चाहते हैं।

ऎसे निकम्मे लोगों के निरंकुश और स्वेच्छाचारी होने के पीछे हम सभी लोग जिम्मेदार हैं जो कि राजधर्म के पालन में कहीं न कहीं फिसड्डी साबित हो रहे हैं।  राजधर्म का निर्वाह यदि हम ईमानदारी से करें तो दुनिया में स्वर्ग स्थापित किया जा सकता है।

आजकल सभी स्थानों पर बहुत सी भीड़ ऎसी है जिसमें शामिल निकम्मे लोग अपने फर्ज के अलावा वे सारी हरकतें कर रहे हैं जो इंसान के लिए अशोभनीय हैं। इनसे साथ वाले भी परेशान हैं और घर वाले भी।

इनमें ड्रग्स, भंग-दारू, गांजा-चरस वाले भी हैं, व्यभिचार वाले भी हैं और खाने-पीने और लूटने वाले भी। कई तो ऎसे हैं जो कि अपने पूरे के पूरे बाड़े और खेत को ही चरने लगे हैं।

इन लोगों पर अंकुश के अभाव और राजधर्म के पालन में कमी ही वे कारण हैं जिनकी वजह से ये लोग मजे मार रहे हैं अन्यथा इन कामचोरों, नुगरों और नालायकों की क्या मजाल कि ये हरामखोरी और बेईमानी को अपना सकें।

समाज और देश को सुधारने और परम वैभव प्रदान करने के लिए और कुछ करें न करें, कामचोरों और बोझ बने हुए निरंकुश लोगों पर कड़ा अंकुश लगाने की जरूरत है तभी इनका ईलाज हो सकता है अन्यथा देश के लिए बोझ बने लोग इसी तरह हराम का खाते-पीते और पाते रहें तो न समाज उन्नत हो सकता है, न देश।

उल्टे इन लोगों की धींगामस्ती के कारण कर्मशील लोगों में निराशा पनपती है और लम्बे समय तक इस स्थिति का बने रहना समाज और देश के लिए घातक है।

राजधर्म का पालन करने वालों के लिए यह जरूरी है कि इसका ईमानदारी से पालन करें। इसके लिए कामचोरों और दुष्ट लोगों के प्रति दया, ममता, करुणा आदि किसी भी मानवधर्म का पालन करना आत्मघाती है। जो बुरा है उसे बिना किसी दया के ठिकाने लगाएं ताकि नया और उत्साही पानी आ सके।