जरूरी है हर फिक्र का जिक्र

जरूरी है हर फिक्र का जिक्र

मानवीय संवेदनाओं से भरा वह दौर चला गया जब लोग औरों के दुःख और समस्याओं को देख कर इनके निराकरण के लिए अपनी ओर से पहल करते हुए मदद करते और दुःखों, संत्रासों और तनावों से मुक्त करने-कराने में समर्पित भागीदारी अदा करते हुए मानवी जीवन का आनंद प्रदान किया करते थे।

अब लोगों को अपनी ही पड़ी है, अपने स्वार्थों, कुटिल चालों, लूट-खसोट और ऎषणाओं के इस कदर दास हो गए हैं कि इन्हें औरों की कुछ नहीं पड़ी है चाहे वे कितने ही निष्ठावान, कर्मशील, ईमानदार और आदर्श इंसान हों।

आजकल किसी को इस बात से कोई सरोकार नहीं है कि कौन कितना सज्जन, सत्पुरुष, ईमानदार और आदर्शवादी है। आजकल इंसान उन्हीं लोगों की कद्र करता है या सहर्ष दासत्व स्वीकारता रहता है जो उसके काम आने वाले हों, उसके स्वार्थ पूरे करने में समर्थ हों चाहे फिर वे कितने ही धूर्त, लम्पट और भ्रष्ट क्यों न हों।

अपने स्वार्थ के चक्कर में आजकल इंसान कुछ भी करने-कराने, मारने-मरवाने के लिए सदैव तैयार रहता है। उसे धर्म, नीति, न्याय और मानवीय मूल्यों से कोई मतलब नहीं होता। मानव समुदाय में जिस तेजी के साथ स्वार्थ, मक्कारी और छीना-झपटी का दौर परवान पर चढ़ता जा रहा है उसने दुर्जनों और दुष्टों का जीना आसान कर दिया है, उनके कुकर्मो, अन्याय और शोषण को सहज मान्यता दे डाली है लेकिन इसका दुष्प्रभाव सज्जनों, सच्चे और अच्छे लोगों पर घातक स्वरूप में पड़ता जा रहा है।

इसीलिए आजकल यह जुमला सभी जगह सुना जाता है कि जो काम करने वाले हैं वे मरे जा रहे हैं, उन पर इतना अधिक बोझ लादा जा रहा है कि वे दुःखी, सन्तप्त और तनावग्रस्त रहने को विवश हैं। न कोई उनकी सुनता है और न उनकी परेशानियों को कम करने के लिए आगे आता है।

इसके ठीक विपरीत खिला-पिला कर, अपने आपका सर्वांग समर्पण कर खुश कर देने में माहिर या दूसरे सभी प्रकार के सुखों का इंतजाम करने-कराने वाले पूरी तरह स्वेच्छाचारी और स्वच्छन्द जीवन जीते हुए मौजमस्ती का मजा लूट रहे हैं।

इस वजह से कर्म और अकर्म के बीच की खाइयां निरन्तर बढ़ती और गहरी होती जा रही हैं।  इसका मूल कारण यह भी है कि एक तरफ मानवीय मूल्यों का क्षरण हो रहा है, और दूसरी तरफ गुणग्राहियों, प्रोत्साहित करने वालों और अच्छे कामों की तारीफ करते हुए आगे बढ़ाने वालों का अकाल है,  जो लोग संरक्षक की भूमिका में हैं वे कुनबे को ही खा जाने को उतावले बने हुए हैं और मार्गदर्शन करने वालों की सारी जमातें चापलुसी और गुलामी में इस कदर डूबी हुई हैं कि इन्हें यह तक नहीं पता कि वे जो कर रहे हैं उसका परिणाम क्या होगा और नरक में जाने लायक यह भीड़ अपने पापों का बोझ कितने जन्मों तक भुगतती रहेगी।

पूर्वजन्म और पुनर्जन्म की थ्योरी की उपेक्षा करते हुए ये लोग जो कुछ कर रहे हैं उसी का परिणाम है कि सज्जनों के भाग में बिना किसी पाप के उन लोगों को भोगने की विवशता है जिन्हें इंसान भी नहीं माना जा सकता।

हालात भयावह, गंभीर और इतने घातक हैं कि इसका कोई अन्दाजा नहीं लगाया जा सकता। बहुत से लोग त्रस्त हैं किसी न किसी के प्रति।  बावजूद इसके सज्जन और कर्मवादी लोग कभी भी अपने दुःखों, विषादों, अभावों और तनावों का जिक्र नहीं करते। और इस कारण से मानसिक अवसाद और शारीरिक पीड़ाओं का दौर बना रहने लगा है।

सिद्धान्तवादी और सच्चे लोेगों में से अधिकांश इसी अवसाद के शिकार होते हैं और इस वजह से कुण्ठाओं का भण्डार अपने मन-मस्तिष्क में दबाए हुए असमय मृत्यु को प्राप्त हो जाते हैं। इस स्थिति में यह बहुत जरूरी हो चला है कि अपने साथ जो कुछ अच्छा-बुरा होता है, हमारी जो चिन्ताएं हैं उनके बारे में हम अपने मित्रों, घर-परिवार वालों, सगे-संबंधियों और सार्वजनिक रूप से किसी न किसी प्रभावशाली मंच पर बताएं, अपनी पीड़ाओं की पृष्ठभूमि, इसके लिए जिम्मेदार लोगों तथा उनके कारनामों व करतूतों के बारे में अवगत कराएं ताकि समाज को भी यह अच्छी तरह पता चल सके कि परिवेश में क्या कुछ हो रहा है।

हमारी चुप्पी के कारण से वर्तमान की सही वस्तुस्थिति सामने नहीं आ पाती है और समाज यह समझता रहता है कि जो कुछ हो रहा है अच्छा ही हो रहा है। हमारी चुप्पी ही उन लोगों के लिए प्राणवायु साबित होती है जो शोषक, अन्यायी और दुराचारी हैं।  अपने जीवन की किसी भी तरह की फिक्र को कभी न दबाएं।

इसका उपयुक्त जगह पर सायास विरेचन करें। ऎसा करना हमारे दिल-दिमाग और शरीर के लिए भी अच्छा है क्योंकि मन हल्का हो जाता है और उस कारण से तनावों की तरंगे और लहरें उठ नहीं पाती, शान्त हो जाया करती हैं।

दूसरा अन्यायी, व्यभिचारी और दुराचारी लोगों के चेहरों की कलई खुलती है और समाज के सामने इनका वो असली चेहरा आ जाता है जिसे छिपाने के लिए ये लोग लाख-लाख जतन कर पूरी दुनिया को भरमाने में लगे होते हैं।

किसी भी बात को अपने मन में नहीं रखें, हर छोटी से छोटी बात को दुनिया के सामने लाएं। इन बातों के हमारे मन-मस्तिष्क से बाहर आने का तात्कालिक फायदा हमें न भी हो तब भी दूरगामी फायदा यह होता है कि हमारे विचार व्योम में वैचारिक क्रान्ति की धमाल मचा देते हैं और इसका देर सबेर असर उन पर अवश्यंभावी है जो लोग राक्षसी कर्म, स्वभाव और व्यवहार में जुटे हुए हैं।

खासकर आज के माहौल में तो यह नितान्त आवश्यक हो ही गया है जब संरक्षक, मार्गदर्शक और सहयोगी ही हमें काट खाने के लिए पीछे पड़े रहने लगे हैं, हमारे अस्तित्व के लिए खतरा बनकर सामने अड़े हैं और चाहते हैं कि दुनिया में वे ही रहे, दुनिया वही करे जैसा वे चाहते हैं।

One comment

  1. आसुरी वृत्तियों वाले लोगों का आज नहीं तो कल सर्वनाश होना तय है। सत्य ही शिव है , शिव ही सुन्दर है।
    सत्य परेशान हो सकता है लेकिन परास्त नहीं ….मानवीय संवेदनाओं की रक्षा हो।

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