शराब मुक्त भारत के लिए यह है जरूरी …

शराब मुक्त भारत के लिए यह है जरूरी …

हम सभी लोग शराब या मदिरा की बुराई करते हैं, सब सार्वजनिक तौर पर शराब बन्दी की बात करते हैं, लेकिन शराबियों के विरूद्ध़ कुछ भी कहने का साहस नहीं रखते, यही कारण है कि शराब का प्रचलन लोक मान्यता पाता जा रहा है।

हालात ये हैं कि हर जाति-वर्ग और क्षेत्र के लोगों की शादियों में बाराती प्रोसेशन के दौरान ‘झूम बराबर झूम शराबी’ वाला फिल्मी गाना बजता ही है और इस पर बाराती बड़ी ही मस्ती से बोतलें दिखाते हुए डाँस करते हैं और बारात में शामिल सारे तमाशबीन इनके नृत्य को देखकर खुश भी होते हैं और वाहवाही भी।

इसी तरह हमारे परिजनों, मित्रों, सम्पर्कितों आदि में खूब सारे देशी दारुडिये और विदेशी ब्राण्डों की शराब के पियक्कड़ों की भरमार होती जा रही है और हम ही लोग इन शराबियों के बारे में सब कुछ जानते-बूझते हुए भी इन्हें पूजनीय मानते हैं, आदर-सम्मान देते हैं और इनकी चापलुसी में रमे रहते हैं। कहीं भय के कारण, कभी स्वार्थ के कारण, और बहुत सी बार भविष्य में किसी काम के होने की उम्मीद में।

इन शराबियों को हमारी ओर से कुछ कहा नहीं जाता बल्कि इन्हें सम्मान दिया जाता है। हम सभी को पता है कि हमारे परिचितों में कौन व्यभिचारी, शराबी और भ्रष्ट है, फिर भी हम अपने स्वार्थों में इतने डूबे हुए हैं कि हम इन दारूड़ियों को कुछ कह नहीं पा रहे हैं।

इसका सामाजिक क्षेत्रों पर असर ये हो रहा है कि कोई सा काम निकलवाना हो, इन कमीनों और मुफ्तखोरों को खुश करना हो, तो शराब परोसनी पड़ती है या इसी का सहारा लिया जाता है।  इन शराबियों के घर-परिवार की माँ-बहनों की स्थिति क्या होती है, इसका अन्दाजा हम कभी नहीं लगाते, न हमारी संवेदनशीलता कभी जग पाती है। और तो और हमारे आस-पास और साथ वाले ही नहीं, हममें से भी खूब सारे लोग ऎसे मिल जाएंगे जो स्वयं शराब पीते हैं किन्तु सार्वजनिक तौर पर या दूसरे मंचों पर अथवा ग्रुप में शराब के विरोधी मेंं लफ्फाजी करते हैं।  कई लोग चोरी छिपे दारू पिया करते हैं, जिनसे बेचारे घर वाले परेशान हैं।

शराब बन्दी के लिए हमारी कथनी और करनी में समानता लानी जरूरी है।

जो लोग शराब पीते हैं उनका सामाजिक और वैयक्तिक बहिष्कार करने की आवश्यकता है।

यह बात दिमाग से निकाल देनी चाहिए कि दारूड़िये कभी सुधर सकते हैं। क्योंकि जिसके गले से होकर एक बार भी दारू पेट में चली जाती है उसके भीतर कलि का प्रभाव प्रवेश कर जाता है।  फिर ऎसे लोगों का स्वभाव और हर कर्म आसुरी हो जाता है और इन शराबियों को लगता है कि वे जो कर रहे हैं, कह रहे हैं, वही सत्य और पालनीय है, शेष सब बेकार।

शराबियों को सार्वजनिक तौर पर, समाज के स्तर पर, जहां मंच उपलब्ध हो, खुलकर इन्हें तिरस्कृत करें और बताएं कि वे जो कुछ कर रहे हैं वह घर-परिवार की बर्बादी के साथ ही सामाजिक अपराध और देशद्रोह भी है क्योंकि ये लोग मनुष्य के रूप में किसी काम के नहीं रह पाते। और दूसरे लोगों को बिगाड़ते हैं वो अलग।

इन लोगों से सम्बन्ध विच्छेद करें।

हम दारूड़ियों के खिलाफ बोलें और उन्हीं के साथ घूमते-फिरते और काम करते रहें, साथ-साथ चाय-पानी और भोजन करते रहें और उनकी चापलुसी या सहयोग करते रहें, उनके कामों में भागीदारी बनाए रखें, यह दोहरा चरित्र ही है जिसके कारण से समाज और देश का पतन हो रहा है।

और यदि हिम्मत है तो उन सभी लोगों के नाम अपने-अपने व्हाट्सअप ग्रुप  में डालें जो लोग शराब पीते हैं या जिनके बारे में प्रामाणिक तौर पर यह सिद्ध है कि ये दारूड़िये हैं।

शराबियों के साथ असहयोग आन्दोलन के बिना शराबबन्दी की सारी बातें बेमानी हैं।

आईये हम उन सभी हरामखोरों, नालायकों और मुफतखोरों से दूरियां बनानी आरंभ करें जो शराबी हैं और हमेशा नशे में धुत्त रहते हैं। इनके लिए इनके घर वाले भी भगवान से यही प्रार्थना करते रहते हैं कि इन्हें जल्दी से ऊपर उठा लें।  इस प्रार्थना में हम भी सहभागी बनें ताकि समाज और देश के लिए कलंक और भार से मुक्ति पा सकें और शुचिता का माहौल बना रह सके।

उन सभी लोगों से क्षमायाचना सहित जो शराबियों के लिए आश्रयदाता, संरक्षक और प्रोत्साहन प्रदाता बने हुए हैं।

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