प्रकृति पूजा, स्वाद और सेहत का संदेश देता है तारणा तेरस का अनूठा व्रत

प्रकृति पूजा को सर्वोपरि मानने वाली भारतीय संस्कृति में वैज्ञानिक रहस्यों और शाश्वत सत्य से परिपूर्ण सदियों पुरानी परंपराएं विद्यमान हैं जिन्हें ऋषि-मुनियों ने दिव्य अनुसंधानों के माध्यम से लोक तक पहुंचाया और पिण्ड से लेकर ब्रह्माण्ड तक के कल्याण के प्रयोग सुझाए।

दुर्लभ हो गया है यह व्रत

इनमें से खूब सारे समय के साथ समाप्त हो गए और बहुत से रामबाण नुस्खों और इनसे जुड़ी परंपराओं को हमने भुला दिया। इन्हीं में से एक है तारणा त्रयोदशी व्रत, जिसके अस्तित्व को बनाए रखने के लिए उदयपुर के स्वदेशी जागरण मंच ने पहल की और इसके सार्थक परिणामों का असर ये हुआ कि साल दर साल इसकी लोकप्रियता बढ़ती जा रही है।

त्योहारों के माह भाद्रपद में शुक्ल पक्ष की त्रयोदशी के दिन तारणा त्रयोदशी का व्रत मेवाड़ की सदियों पुरानी परंपरा का हिस्सा रहा है। बरसात के बाद नवोन्मेषी प्रकृति के मनोहारी माहौल में भादों की तेरस को होने वाला यह एक दिवसीय व्रत इंसान को साल भर तक निरोगी रखने लायक ऊर्जाओं का पुनर्भरण कर देने के लिए काफी है।

भाद्रपद शुक्ल पक्ष की त्रयोदशी, बुधवार, प्रदोष आदि अनुकूल संयोगों से भरे इस दिन को अखण्ड तेरस, तांत्या तेरस और तारणा तेरस के नाम से भी जाना जाता है। तेरस को दिन भर व्रत के बाद शाम को भगवान को नैवेद्य समर्पित कर खास तरह के भोजन के साथ व्रत खोला जाता है।

सर्वांग पोषणदायी है 13 तरह का खास भोजन

यह भोजन अपने आप में इतना पूर्ण होता है कि इसमें शरीर के तमाम अंग-उपांगों और अवयवों को ऊर्जित करने लायक दिव्य पोषक तत्व प्राप्त हो जाते हैं जिनसे सेहत का वरदान मिलता है।

इस भोजन में 13 प्रकार के अनाज और सब्जियों को स्थान दिया गया है। अनाजों में ब्राउन राईस(लाल चावल), मक्का, जौ, ज्वार, बाजरा, माल (रागी), कुलथ, चीणा, कांगणी, सामा, मूंग, चना एवं गेहूं के आटे को मिलाकर रोटी बनाई जाती है।

इसी प्रकार 13 प्रकार की सब्जियों लौकी, कद्दू, तुरई, कीकोड़ा, करेला, टिण्डोरी, भिण्डी, पालक, चन्दलोई, गिलकी, परवल, चँवला फली एवं ग्वार फली को मिलाकर मिक्स सब्जी बनाई जाती है।

आरोग्य का वरदान लुटता है इस एक दिन

यह खाद्य प्रयोग इतना अधिक दिव्य, गुणकारी एवं प्रभावी है कि इससे शरीर को साल भर के लिए ताजगी प्राप्त हो जाती है। साल भर में केवल एक बार इसका सेवन करने से विजातीय द्रव्य बाहर निकल जाते हैं और शरीर के लिए उपयोग सभी तत्वों का पुनर्भरण हो जाता है। यह माना जाता है कि साल भर हम गेहूं की अधिकता रखते हैं इससे दूसरे जरूरी पोषक तत्वों का अभाव रहता है। इसका पुनर्भरण यह व्रत अच्छी तरह कर देता है।

बढ़ रहे हैं कद्रदान

जैव विविधता की दृष्टि से पृथ्वी पर उपलब्ध सभी अनाजों और वनस्पतियों को संरक्षित रखने और प्राचीन परंपराओं को प्रोत्साहित कर जीवों और जगत के कल्याण की भावना से स्वदेशी जागरण मंच ने सन् 2010 से यह पहल आरंभ की और बीएन कॉलेज में इसके शुरूआती आयोजन में 30 जनों ने भागीदारी निभायी। इसके बाद हर साल कद्रदान बढ़ते गए और गत वर्ष 800 जनों ने इस अनूठे भोजन का आनंद पाया। इस बार एक हजार लोगों का लक्ष्य है। इसके लिए प्रति व्यक्ति डेढ़ सौ रुपए शुल्क रखा गया है। सन् 2011 से यह आयोजन हिरण मगरी सेक्टर-4 स्थित विद्या निकेतन स्कूल में होने लगा है।

बुधवार को है आयोजन

इस बार यह कार्यक्रम 14 सितम्बर, बुधवार शाम  होगा।  इसमें सायंकाल 5 बजे स्वदेशी उत्पाद प्रदर्शनी होगी।  6 बजे से 7.30 बजे तक स्वदेशी विचार गोष्ठी तथा इसके उपरान्त दिव्य सहभोज होगा। इस दौरान 13 तरह के अनाजों का आटा भी सशुल्क उपलब्ध रहता है जिसके लिए हर कोई साल भर से लालायित रहता है।

हलवाई भी है खास

यह भोजन सामग्री बनाने का काम भी एक विशेष हलवाई ही करता है जिसे पिछले वर्षों का अनुभव है। हालांकि इसके लिए सामग्री एकत्रित करना अत्यन्त कठिन कार्य है और कई अनाज तो दुर्लभ ही हो गए हैं लेकिन आयोजक इसके लिए काफी समय पहले से ही तैयारी रखते हैं।

इनमें से कई अनाज विलक्षण हैं। इनमें ही चीणे अनाज के बारे में कहा जाता है कि यह दशकों तक खराब नहीं होता इसलिए मेवाड़ महाराणा इसकी कोठियां भरवा रखते थे ताकि अकाल के समय प्रजा के काम आ सके।

खुले आसमान तले खोला जाता है व्रत

आज भी गांवों में अस्सी-नब्बे पार कई बुजुर्ग महिलाएं हैं जो इस व्रत को करती हैं। इसमें दिन भर व्रत रखकर शाम के समय घर के आँगन में भोजन पकता है और पूजा-अर्चना एवं भोग लगाने के बाद खपरैल वाले घर में उस जगह बैठकर भोजन किया जाता है जहां बरसाती पानी आँगन में गिरता है। इसे नैवं, नैवेग या निवाल कहा जाता हैं।

व्रती महिलाएं 13 धान के मिश्रित आटे की केवल चार पूड़ियां ही खाती हैं। इससे कम या ज्यादा नहीं। इसका बाकायदा उद्यापन भी होता है जिसमें 13 सुहागिनों को जिमाया जाता है और तेरह प्रकार की श्रृंगार, सुहाग व उपयोगी सामग्री के साथ दक्षिणा भी दी जाती है।

प्रकृति महिमागान और शिव पूजा का सालाना उत्सव

इन वृद्धाओं ने बताया कि यह व्रत प्रकृति के महिमागान और भगवान शिव की पूजा के निमित्त होता है और खासकर महिलाओं के सर्वांग पोषण की दृष्टि से करिश्माई कमाल दिखाता है। इसमें यह बाध्यता है कि खुले आसमान के नीचे बैठकर ही व्रत खोला जाए।

भुल नहीं पाते तारणा तेरtarana-teras-udr-13-sept-2016स को

स्वदेशी जागरण मंच के उदयपुर विभाग संयोजक डॉ. सतीशकुमार आचार्य बताते हैं कि इसमें सभी सामग्री का अनुपात न्यूनाधिक होता है। माल (रागी) के लड्डू और मेवाड़ी खिचड़ी, कढ़ी, मिक्स आटे की पूडियां एवं पराठे, स्थानीय चावल और मक्का की राबड़ी सहित ढेरों व्यंजनों का स्वाद लोग साल भर तक नहीं भूलते। एक बार जो इस आयोजन का हिस्सा बन जाता है वह फिर तारणा तेरस को आना भूलता नहीं। बहुत से लोग 13 अनाज का मिक्स आटा पाने के लिए आतुर बने रहते हैं।

 

जरूरत है व्यापक शोध की

आरोग्य, आनन्द और आत्मतोष प्रदान करने वाला तारणा तेरस का यह व्रत भारतीय परंपरा में पोषण विधियों की सर्वश्रेष्ठता के साथ ही जीव और शिव के संबंधों और प्रकृति के प्रति कृतज्ञता ज्ञापन का वह वार्षिक पर्व है जो शरीर की रोग प्रतिरोधक क्षमता को बढ़ाता हुआ  बीमारियों से बचाता है और आरोग्य का वरदान देता है। इस दिशा में मंच द्वारा किए जा रहे प्रयास सराहनीय एवं अनुकरणीय हैं और इन पुरातन पोषण विधियों पर शोध-अध्ययन के लिए प्रेरित भी करते हैं।