बड़बड़ियों की फौज, बतरसियों की मौज़

बातों में रस किसे नहीं आता। जिसे नहीं आता वह या तो मूर्ख है या फिर संसार से ऊपर उठा हुआ। अन्यथा कहीं कोई ऎसा देखने को नहीं मिलता जिसे बतियाने में दिलचस्पी न हो।

हो सकता है काफी सारे लोग इस किस्म के हों जो कि खुद ज्यादा नहीं बोलते, गंभीर होने के तमाम स्वाँग रचने में माहिर हों, फिर भी ऎसे लोग बाहरी चर्चाओं, रहस्यों और सम सामयिक हलचलों को जानने के प्रति आतुरता की हद तक तीव्र आकांक्षी, जिज्ञासु और सतर्क जरूर रहते हैं।

ये लोग दूसरे सामान्य लोगों से ज्यादा घातक होते हैं। सीधे-सादे और सामान्यजन तो अभिव्यक्ति के उपरान्त विचारों से मुक्त हो जाते हैं जबकि हमेशा गंभीर रहकर सुनने ही सुनने वाले लोग भले ही कम संख्या में हों, मगर वे अघिक घातक होते हैं और ऎसे लोगों पर विश्वास करना आत्मघाती ही सिद्ध होता है।

दुनिया के अधिकांश लोग बोलने वाले हैं। इसके बाद सुनने वालों का नंबर आता है।  लेकिन बोलने वालों की कोई कमी नहीं है। इस प्रजाति के लोग सर्वत्र पाए जाते हैं।

जहाँ-जहाँ इंसान का वजूद पहुंचा हुआ है वहाँ-वहाँ सभी स्थानों पर बोलने वालों की कई किस्मों की भरमार है। इनमें जोर-जोर से बोलने वाले, चिल्लाने वाले, गलाफाड़ू, बेवजह बोलने वाले और नॉन स्टाप बोलने वालों से लेकर हर आकार-प्रकार के ढपोड़शंख विद्यमान हैं।

लोगों को जितना आनंद अपने कर्म या घर-परिवार के लोगों के साथ पारिवारिक चर्चाओं में नहीं आता, उतना उद्यानों, पाटों, सर्कलों, दुकानों की पेढ़ियों और तरह-तरह के डेरों में बैठकर चर्चाओं में आता है। और यह चर्चाएं भी ऎसी कि कोई सीधा संबंध उनसे नहीं होता फिर भी चूंकि दुनिया जहान की बातें इनके जेहन में होनी चाहिएं इसलिए बनी हुई रहती हैं, इनका रोजाना अपडेशन भी होता रहता है।

इनके इंफोरमेशन और अपडेशन के स्रोत भी खूब सारे होते हैं जो इन्हीं की तरह सारे जहाँ के विषयों और चर्चाओं को अपने दिमाग में संकलित कर अपनी-अपनी खुराफाती बुद्धि और सबसे पहल हम वाली मनोवृत्ति का भरपूर इस्तेमाल कर दुनिया के टॉप मोस्ट खानसामाओं और केटरर्स की तरह दिन-रात परोसते रहते हैं। संभव है कि नींद में भी इनका यही चिन्तन और मसालों की मिलावट का यह दौर निरन्तर चलता रहता हो।

पहले जमाने में पनघट, बावड़ियों, कूओं, नदी-तालाबों के घाट इन चर्चाओं के केन्द्र हुआ करते थे। अब वे रहे नहीं, इसलिए नए ठिकाने बन गए। अब तो इन चर्चाओं ने आधुनिक युग में प्रवेश कर लिया है जहाँ मोबाइल और फोन ने सब कुछ आसान कर दिया है। बातें भी होती रहें और दूसरों को भनक भी नहीं लग पाए कि किससे हो रही हैं।

बतरसिया प्रजाति में काफी कुछ तो ऎसे हैं जो अपने मोबाइल या फोन का इस्तेमाल करते हैं। लेकिन अधिकांश के बारे में लोगों की पक्की धारणा यही है कि ये लोग पराये फोन या मोबाइल का ही इस्तेमाल करते हैं। फिर कई सारे गलियारे और बाड़े ऎसे हैं जहां हम काम धेले भर का नहीं करें मगर उन बाड़ों की हरेक वस्तु और संसाधन पर हम अपना जन्मसिद्ध अधिकार मानते हैं जैसे कि हमारे पुरखों ने ही हमारे लिए मुफतिया प्रबन्ध कर रखा हो।

इस मामले में चालाक और कृपण लोगों का कोई मुकाबला नहीं है। जहाँ कहीं मौका देखा नहीं कि टूट पड़े। अपना मोबाइल निकाला, नम्बर देख-देख कर डायल करो और फिर बतियाते रहो, चाहे जितनी देर। कोई नहीं है पूछने वाला।

बातें घर की रसोई से लेकर बाथरूम तक की हों या फिर प्रेमालाप। अश्लील बातें हो या दूसरों की। मुफत के फोन का लाभ उठाने वाले हर तरफ भारी संख्या में हैं। ये लोग मौके की फिराक में ही रहते हैं कि कब दाव लगे और फोन के आस-पास कोई न हो।

इस प्रजाति के लोग अपनी ड्यूटी या और कोई काम करें न करें, रोजाना अधिकांश समय फोन या मोबाइल पर गुजारना इनकी ऎसी आदत बन चुकी होती है कि घर के लोग तो परेशान रहते ही हैं, वे लोग भी हैरान-परेशान रहते हैं जहाँ के ये कर्मयोगी कहे जाते हैं।

एक बार बतियाने, मीठी-मीठी चिकनी-चुपड़ी बातें करने और पूरी दुनिया के बारे में जानने की जिज्ञासाओं की तलब जिस किसी को लग जाती है वह बतियाये बिना कभी रह नहीं सकता। कई लोग तो सवेरे जगने के बाद से ही बतियाने के डेरों के बारे में सोचना शुरू कर देते हैं और तीव्र प्रतीक्षा करते हैं उस घड़ी की, जब उन्हें चर्चाओं के लिए कोई ठौर मिल जाए जहाँ इन्हीं की तरह के बड़बड़ियों और ढपोड़शंखों का जमघट लगने की सनातन परंपरा रही हो।

कुछ लोग तो रोजाना बेवजह कई सारे लोगों से बातें करने के आदी हैं। ये लोग अपने दिमाग का कचरा फोन या मोबाइल के माध्यम से उन सभी तक पहुंचाने का दैनंदिन क्रम हमेशा बनाए रखते हैं जो इन्हीं  की तरह के नुगरे, नालायक और कामचोर होते हैं। इन्हें यदि इसका मौका नहीं मिले, तो विक्षिप्तों और अन्यमनस्कों की तरह हरकतें करना इनके लिए आम बात है।

आत्मचिन्तन से कोसों दूर ऎसे लोगों की पूरी जिन्दगी फालतू की चर्चाओं में गुजर जाती है। दुनिया के बहुत सारे विवादों के लिए इन लोगों को जनक या जननी अथवा उत्प्रेरक माना जाए तो कोई बुरा नहीं होगा।

ये लोग बातों को परोसने और उन्हें स्वादिष्ट बनाने के फेर में हर बात में अपनी ओर से नमक-मिर्च और जात-जात के तमाम मसाले मिलाकर और अपनी दिमागी खुराफात का तड़का लगाकर ही आगे से आगे परोसते चलते जाते हैं। इन लोगों को इसी में अनिर्वचनीय और अपार आनंद आता है।

सीधे सादे और सज्जनों को इन लोगों से एक निश्चित दूरी बनाए रखनी चाहिए क्योंकि इन लोगों के विवादित कथनों से कभी भी कोई सा विवाद पैदा हो सकता है और कभी कभार लेने के देने भी पड़ सकते हैं।

मसालची बतरसिया पुरुष और स्त्री दोनों वर्गों में हैं। इन लोगाें को जितना आनंद बातों में आता है, उतना न खाने-पीने मेें आता है, न घर वालों के साथ, और न ही अपनी ड्यूटी या दूसरे कर्मों में।

एक-दो दिन अपने चहेतों और इनकी ही तरह के बतंगड़ियों से बात करने न मिल पाए तो ये उन्मादी हो  जाएं, कई सारी बीमारियां हो जाएं।

खूब सारे बाड़े हैं जहाँ इन मुफतिया बतरसियों के बारे में चर्चाएं आम रहती हैं पर ये ढीठ लोग कभी सुधरने वाले नहीं।  इन्हें सुधारने या बतरस से दूर करने का कोई जतन भी ना करे, वरना इनकी सेहत ठीक कैसे रहेगी, मनोरोगी तो पहले से हैं हीं।

इनकी मानसिक और शारीरिक ऊर्जाओं का इतना अधिक क्षरण फालतू के बोलने और चर्चाओं में रमे रहने के कारण हो रहा है कि मुख को छोड़कर शेष सारे अंग शिथिल होते जा रहे हैं और घातक बीमारियों का घर होने लगे हैं। लगता है कि जैसे इनकी सेहत के क्षरण के लिए इन आत्मघातियों ने एक द्वार को इतना अधिक खोल दिया है कि सारी की सारी शक्ति और ऊर्जा इसी छिद्र से व्यर्थ बहकर बाहर जा रही है।

सच कहें तो इन बतरसियों की जिन्दगी में समस्याओं, अभावों और असफलताओं का यह भी एक बहुत बड़ा राज है लेकिन बातें सुनने और बोलते रहने की इतनी खराब आदत पड़ चुकी है कि मरते दम मे इन्हें इसका भान नहीं होता कि केवल इस एक संयमहीन अवस्था के कारण उनकी कितनी अधिक दुर्गति होती जा रही है।

बहुत से समझदार लोग इन बड़बड़ियों से हैरान-परेशान भी हैं लेकिन किससे कहें? फिर इनकी तरह ही बकवासियों और फालतू की चर्चाओं में रस लेने वालोें की संख्या का कोई पार नहीं है इसलिए ये ढपोड़शंख सब जगह चल निकलते हैं।

हमारा गांव-शहर हो या महानगर, देहात से लेकर राजधानियों और जनपथ से लेकर राजपथ पर इन बतरसियों की जबर्दस्त धमाल है। इन सभी के पास और कोई हुनर नहीं होने के बावजूद केवल बातों की बादशाहत ही है कि ये चल निकले हैं। कहा भी कहा भी गया है – जो बोलेगा उसके बेर बिकते हैं। फिर इनके पास तो दुनिया भर का सारा माल दिमाग में ठूंसा पड़ा है। इस मामले में ये किसी मॉल या उपभोक्ता भण्डार से कहाँ कम हैं?

देश और दुनिया की तकरीबन आधी से अधिक आबादी न्यूनाधिक रूप से बतरसिया महामारी से बुरी तरह त्रस्त है। इस उन्मादी ज्वर ने दूसरी सारी बीमारियों को पीछे छोड़ दिया है। यही सब कुछ चलता रहा तो आने वाले कुछ समय में ऎसे विक्षिप्तों का आंकड़ा इतना अधिक विस्फोटक हो जाएगा कि बड़बड़ियों की जनसंख्या बढ़ जाएगी और बाकी बचे सारे लोगों के कान पक जाने का खतरा हमेशा के लिए बना रहेगा।

1 thought on “बड़बड़ियों की फौज, बतरसियों की मौज़

  1. हर कहीं जमा हैं बातूनियों की फौज, न काम की – न काज की

    वर्तमान युग की सबसे दुर्भाग्यपूर्ण स्थिति यह है कि बिना काम का बोलने और बकवास करने वालों की भारी भीड़ हर तरफ जमा होकर देश और दुनिया भर की चर्चाओं में रमी रहती है, निन्दा और आलोचनाओं के ज्वार में नहाती हुई अपने आपको धन्य मानने लगी है।
    हर आदमी अपने आपको सबसे पहले और विद्वान मानने-मनवाने की गरज से दिन-रात फालतू के हजारों शब्दों का वमन करता हुआ सडान्ध फैलाता है। इनसे कोई काम नहीं होता, परिश्रम से जी चुराने वाले, समाज और देश की सेवा से मुँह मोड़ने वाले ऎसे बतरसिया बातूनियों का भयंकर प्रदूषण जिस तेजी से फैलता जा रहा है उसने समाज और देश का कबाड़ा करके रख दिया है।
    मौन साधक कम होते जा रहे हैं और बकवास करने वालों की संख्या विस्फोटक होती जा रही है। समाज और देश के लिए यही सबसे बड़ी आत्मघाती स्थिति है। हम सभी लोग भी ऎसे ही बकवासियों में रमने लगे हैं।

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