जीवन्मुक्ति का गूढ़ रहस्य …

यदि हम जीवन्मुक्ति यानि की जीते जी मुक्ति अथवा मोक्ष का अहसास करना चाहें तो इसके लिए सबसे पहले जरूरी है कि पूर्वार्ध की आयु में जो सर्जन-सृजन किया है, चाहे वह ज्ञान, अनुभव अथवा पदार्थों का हो, उत्तरार्ध आयु की शुरूआत हो जाने के बाद उसका विसर्जन करना आरंभ कर दें।

जो अर्जित किया है वह समाज, अपनी मातृभूमि और देशवासियों से ही प्राप्त किया है, और उन तक पहुंचाकर उत्तरोत्तर शून्यावस्था प्राप्त करना जरूरी है अन्यथा इन सभी का भार या संग्रह अपने पास होते हुए इतने भारी हो जाएंगे कि ऊपर जाना मुश्किल हो जाएगा।

इसलिए जो जिसका है उसे उस पात्र तक पहुंचाकर खाली हो जाएं। और प्रयास यह करें कि उत्तरार्ध में खुद सारे संग्रह, जंजालों और झंझावातों से मुक्त होकर शून्य हो जाएं।

असल में यही जीते जी मुक्ति है और मरने के उपरान्त बिना किसी दिक्कत के मोक्ष प्राप्त हो जाना निश्चित है।

गति-मुक्ति प्राप्त करने का इससे बड़ा और सरल उपाय और कुछ हो ही नहीं सकता।

त्वदीयं वस्तु गोविन्दं तुभ्यमेव समर्पये …

ॐ नमो नारायण।