मेरी विनम्र राय

अपनी अपरिमित ऊर्जा और क्षमता हमारे सकारात्मक कल्याण के लिए है। निन्दा, विरोध और बाधाएं वहीं आती हैं जहां कार्यसिद्धि की संभावनाएं होती हैं। सबसे बढ़िया और बड़ा उपाय है उपेक्षा। अपने कर्म में कमी न लाएं, निरन्तर कर्म करते रहें।

ये स्थिति दुनिया के हर महापुरुष और हर अभियान के साथ रही हैं। अपनी दैवीय ऊर्जा और दिव्यताओं का क्षरण करने के लिए ही आसुरी शक्तियां नए-नए प्रपंच रचकर हमें भटकाने और भड़काने के प्रयत्न करती हैं।

हम यदि भटक या भड़क जाएं, वही उनकी विजय है। इसलिए अपनी लकीर को लम्बी ख्िंाचते चले जाएं, किसी को इतना अधिक महत्व न दें कि हमारे दिल और दिमाग के पवित्र परिसरों में मण्डराने लगे। केवल और केवल अपने कर्म को विस्तार दें, गति दें और आगे बढ़ते रहें। यों ही अगर उलझते रहे तो जिन्दगी भर खूब सारी सुरसाएं, पूतनाएं, शूर्पणखाएं, लंकिनियां, मारीच, कालनेमि, शुम्भ-निशुम्भ, चण्ड-मुण्ड, रक्तबीज मिलते ही रहेंगे।

प्रकृति और भाग्य पर विजय पाने के लिए निकले कर्मयोगियों और कर्मयोगिनियों के लिए यह माया हर युग में सामने आती रही है। जीवन को आनंद और प्रेम से परिपूर्ण रखते हुए स्व कर्म में लगे रहो, तभी हमारा और समुदाय का कल्याण संभव है। युवाओं का जोश सराहनीय और स्तुत्य है लेकिन अब शक्ति प्रदर्शन और सार्वजनिक प्रदर्शन का युग नहीं है, बौद्धिक क्षमताओं से आगे बढ़ने का युग है।