जरूरी हैं अवसर, प्यार और प्रोत्साहन

जरूरी हैं अवसर, प्यार और प्रोत्साहन

प्रतिभाएं हर इंसान में जन्मजात हुआ करती हैं। इसका पढ़ाई-लिखाई से कोई संबंध नहीं है। कई अनपढ़ लोगों में चमत्कृत कर देने वाली बौद्धिक क्षमताएं होती हैं और खूब सारे पढ़े-लिखे लोग समाज और देश के लिए शोषक, लूटेरे और नाकारा सिद्ध होते हैं।

ब्रह्माण्ड के असंख्य विषय हैं, ज्ञान, हुनर और प्रतिभाओं के अनुरूप मौलिक प्रतिभाएं भी असंख्य हैं, इनका कोई पार नहीं पा सकता। बीते युगों से लेकर आज तक ज्ञान-विज्ञान और तकनीक के साथ ही साधन-सुविधाएँ और संसाधन, पदार्थ और क्रियाएं आदि अपने स्वरूप में बदलाव के साथ हर युग में रही हैं।

अत्याधुनिक भौतिक युग को विज्ञान और तकनीक के क्षेत्र में सर्वोच्च मानना हमारी भूल होगी क्योंकि वैदिक काल में इससे भी बड़े और सृजन-विध्वंस के असंख्य प्रयोग हो चुके हैं और उस समय हमारा ज्ञान-विज्ञान आज के मुकाबले लाख गुना बेहतर था।

इतिहास की गौरवशाली परंपराओं के जानकार लोग अच्छी तरह जानते हैं और उनके लिए आज का युग ज्ञान-विज्ञान की दृष्टि से कोई ज्यादा महत्व नहीं रखता किन्तु जो लोग हमारी गौरवशाली परंपराओं, ऋषि-मुनियों की खोज और अनुसंधान तथा कालजयी शाश्वत निष्कर्षों और सनातन परंपराओं की जानकारी और गर्व से विमुख हैं उन सभी लोगों को लगता है कि आज का युग सर्वोत्तम और सर्वोपरि है।

विदेशी दासत्व, गुलामी से उत्पन्न  भेड़चालिया कल्चर, गोरी चमड़ी वालों को सर्वज्ञ एवं सर्वश्रेष्ठ मानने की भूल तथा आत्महीनता के जिस दौर से हम गुजर रहे हैं उसी का प्रभाव है कि हम अपनी किसी बात को श्रेष्ठ या उपयोगी मानने से परहेज करते हैं और विदेशी  जो कुछ कह दें उसे भगवान की बात मानकर बिना सोचे-समझे ग्रहण भी कर लेते हैं और उसे ही संसार और जीवन का सार्वभौमिक और सार्वकालिक सत्य मानकर पिछलग्गू होकर जीने को ही विकास मान लिया करते हैं।     पुरातन ज्ञान-विज्ञान और तकनीक की परंपरा में हमारे यहाँ आज भी असंख्य प्रतिभाएं हैं जिनके मौलिक ज्ञान और हुनर  की कोई दूसरी मिसाल नहीं हो सकती है। परन्तु ये प्रतिभाएं साधन-सुविधाओं, अर्थ, प्रोत्साहन और अवसरों के अभाव में आगे नहीं बढ़ पाती और आत्महीनता का शिकार हो रह जाती हैं।

यही हमारे समाज और देश का दुर्भाग्य है।  हमारे भीतर से वो हुनर गायब हो गया है जिसके जरिये हम किसी भी इंसान का निरपेक्ष भाव से स्वस्थ और सटीक मूल्यांकन कर लिया करते थे और जो लोग वाकई हुनरमन्द, ज्ञानी-विज्ञानी होते थे उन्हें उनके लायक अवसर प्रदान करने में मदद भी करते थे और  उनकी पीठ थपथपाने में भी कभी कंजूसी नहीं करते थे।

आज हमें कोई बच्चा, युवा या प्रौढ़ इंसान योग्य एवं प्रतिभाशाली लगता भी है तो हम उसे आगे बढ़ाने की बजाय नीचे गिराने के लिए दिन-रात एक किये रहते हैं। उसे अवसर मुहैया कराने, हर तरह का प्रोत्साहन देने और अभावों की पूर्ति करने की बात तो बहुत दूर है।

यही कारण है कि देश की प्रतिभाएँ कुण्ठित होकर जी रही हैं, ओज-तेज और पराक्रमी व्यक्तित्व नज़र नहीं आता। भरी जवानी मेंं लोग परिवेशीय समस्याओं और अर्थाभाव होने के साथ ही  प्रोत्साहन और मदद के अभाव में मायूस, हताश और निराश नज़र आते हैं।

जिन लोगों ने अपना भविष्य सुरक्षित कर लिया है और किसी न किसी शहदिया बाड़े या टकसाल में एक बार घुसपैठ कर गए हैं उन लोगों के भीतर से मानवीय संवेदनाएं पलायन कर चुकी हैं। और ऊपर से एक्स्ट्रा की चाहत में ये बेशर्म और नंगे-भूखों की तरह पेश आने लगे हैं।

इन लोगों को अपने उन लाखों बंधुओं-भगिनियों की कोई परवाह नहीं है जो अपने भविष्य के निर्माण के लिए दिन-रात मेहनत कर रहे हैं, बावजूद इसके कोई मुकाम नहीं पा सके हैं।

हम लोगों को उतना संघर्ष नहीं करना पड़ा इसलिए हमें उनकी पीड़ाओं, अभावों और समस्याओं के प्रति कोई सहानुभूति नहीं है, हमारी संवेदनाएं मर चुकी हैं। जमीर बेच दिया है अथवा किसी के यहाँ गिरवी रख दिया है।

लाखों युवा आज तरस रहे हैं अपने सुरक्षित भविष्य के लिए। उनके माता-पिता तथा घर वालों की चिन्ताओं के बारे में कल्पना भी नहीं की जा सकती है।  और हम  हैं कि एक बार क्या घुस आए, बाड़ों, गलियारों और परिसरों को अपने बाप-दादाओं की बपौती मानकर अहंकारों में भरे इतने अधिक इतरा रहे हैं कि हम अपने आपको अमर मानकर सारे व्यवहार कर रहे हैं।

हमें न भगवान का भय है, न यम यातना का डर और न ही नरक का खौफ। हम धर्म, नीति, सत्य, ईमानदारी और मानव धर्म के सारे लक्षणों को तिलांजलि दे चुके हैं।  भारतमाता को परम वैभव प्रदान करने की बातें बेमानी साबित होने लगी हैं।

अपने पद, प्रतिष्ठा और पॉवर के मद में इतने चूर हो गए हैं कि हमेंं यह भान तक नहीं हो रहा है कि जिन बाड़ों, गलियारों और परिसरों को हम अपना मानकर खोटे सिक्के चला रहे हैं, समय आने पर वहाँ से उछाल कर ऎसे बाहर धकिया दिए जाएंगे कि पता ही नहीं चल पाएगा कि कहाँ थे और कहाँ आ गए।

और ऎसे ही एक दिन जब अनचाहे आ धमकने वाली मौत अपने पंजों में दबोच कर ले जाएगी तो लोग उत्साह से खुशी पर्व मनाते हुए कहेेंगे कि अच्छा हुआ, चले गए वरना धरती पर पापों का बोझ बढ़ाते और कुकृत्यों की और अधिक बाढ़ ले आते। ऎसे कुख्यात और शोषकों को लोग किसी न किसी खूंखार जानवर, असुर और अश्लील नामों से संबोधित करते हुए भी नहीं हिचकते।

बहुत से लोग हैं जिनके बारे में कहा जाता है कि ये लोग मृत्यु को भी भुला बैठे हैं और परायों की झूठन और रसोई में बघार की गंध पर मदान्ध होते हुए अन्याय, अत्याचार और शोषण का कहर बरपा रहे हैं, सज्जनों को तंग करने में कोई कसर नहीं छोड़ रहे, हरामी की तरह व्यवहार करते हुए सब कुछ हराम का ही खा-पी रहे और दैहिक भोग पा रहे हैं। कई सारे जो कैंकड़ा जूंओं की तरह व्यवहार करने लगे हैं।

इन्हें यह भी पता नहीं है कि जो कुछ हराम का जमा किया है, जिस हराम के खान-पान से शरीर बना है, वह सब कुछ जब तक सड़-सड़ कर देह से बाहर नहीं निकलेगा, तब तक मौत नहीं आनी है। और जब तक मौत नहीं आएगी, तब तक खटिया पर सड़ते रहना है या आईसीयू में भरती रहना है।

क्योंकि इन्हीं हरामखोरों, शोषकों और अत्याचारियों के सताये लाखों लोग रोजाना कई-कई बार इनके लिए यही बददुआएं निकालते रहते हैं कि स्साले सारे के सारे सड़-सड़कर मरेंगे या कुत्ते की मौत।

अपनी आँखों के सामने रोजाना खूब सारे लोगों की यही स्थिति देखने के बावजूद हमारी चेतना का जागरण नहीं हो पाता, क्योंकि हम अपनी कमाई से बने ही नहीं, सब कुछ पराया और परायों का ही पाते रहे हैं। शरीर का हर कतरा तक परायों के पैसों या झूठन से बना हुआ हो, तब  ऎसा ही होता है।

अपने अहंकारों को त्याग कर लोगों को निष्काम भाव से प्यार-दुलार दें, उन्हें अच्छे कामों और सुनहरे भविष्य के लिए प्रोत्साहित करें, अपनी ओर से हरसंभव मदद दें और उन्हें अपने इच्छित मुकाम तक पहुंचाने में भागीदारी बनें, यही आज का युगधर्म