स्मृतिशेष – रामेश्वरप्रसाद पण्ड्या

चट्टानी व्यक्तित्व, सहृदयता और औदार्य संवेदनाओं का अद्भुत-अनुकरणीय समन्वय शिखर

पं. रामेश्वरप्रसाद पण्ड्या का अचानक चले जाना मन को व्यथित कर गया। उन्हें किसी एक विधा या क्षेत्र के सीमित दायरे या फ्रेम में बाँध कर कभी नहीं देखा गया।

 बात चाहे शिक्षा और कठोर शैक्षिक प्रशासन की हो, धर्म-कर्म-अनुष्ठान और साधना की हो या फिर सामाजिक सेवा क्षेत्रों की अथवा रचनात्मक कर्मयोग और परिवेशीय गतिविधियों में आत्मीय भागीदारी की, हर मामले में वे इक्कीस ही सिद्ध हुए।

ईश्वर प्रदत्त आकर्षक और सौष्ठवपूर्ण कद-काठी के साथ ही उनके व्यक्तित्व में ढेरों खासियतें थी जिनका अनुभव वही कर सका, जिसने उनका सामीप्य-सान्निध्य पाया, साथ काम किया अथवा पारिवारिक आत्मीय संबंधों को निभाते हुए महसूस किया। 

अपार आत्मविश्वास और दृढ़ता की दृष्टि से उनका कोई सानी नहीं कहा जा सकता। जैसा उनका रौबदार व्यक्तित्व था वैसी ही उनकी अडिग निर्णय क्षमता। जीवन में कई सारे विघ्नसंतोषियों और शातिर तूफानों ने उनका रास्ता रोकने की कोशिश की लेकिन पं. रामेश्वर प्रसाद पण्ड्या ने कभी हार नहीं मानी, वे संघर्षों की ज्वालामुखियों की छाती चीरकर आसमानी ऊँचाइयां निरन्तर पाते ही रहे।

विजवा माता और अंकलेश्वर शिव की कृपा उन पर इतनी बरसती रही कि जिसकी कल्पना या आकलन भी कोई नहीं कर सकता। पारिवारिक संस्कारों के साथ संस्कृत और संस्कृति के प्रति प्रगाढ़ निष्ठाओं ने ही उनके व्यक्तित्व को दिव्य बनाया और ओज-तेज में कभी कमी नहीं आने दी।

धर्म-संस्कृति और प्राच्यविद्याओं के प्रति उनका अनुराग और अभ्यास ही था कि अच्छे साधक के रूप में उनकी अपनी खास पहचान रही। शिक्षा विभाग में सेवाओं के कई पड़ावों में उन्होंने जिस सहयोगी और आत्मीय भावना से प्रोत्साहन और प्रतिभाओं के विकास में उदारतापूर्वक भागीदारी निभायी, उसे आज भी अनगिनत परिवारों की पीढ़ियां विभिन्न अवसरों पर अभिव्यक्त करते हुए गर्व का अनुभव करती हैं।

अपनी ही बात कहूँ तो आजीविका के आरंभिक दौर में जब शिक्षा विभाग में मैंने नौकरी की, तब उन्होंने हमेशा पुत्र की तरह स्नेह दिया और कभी बड़े अधिकारी होने का अभिमान नहीं रखा। अन्यथा आजकल अधिकारी बन जाने के बाद इंसानियत, आत्मीयता और स्नेह का होना दुर्लभ हो चला है और जो लोग बड़े हो जाते हैं वे आम इंसान से दूर होते चले जाते हैं। लेकिन पं. रामेश्वरप्रसाद पण्ड्या ऎसे बिरले शख्स थे जो हमेशा जमीन से जुड़े रहे और सम सामयिक अहंकार से मुक्त रहे। 

यों भी पड़ोसी होने के नाते उनका सान्निध्य, स्नेह और आशीष हमें सदैव प्राप्त होता रहा। उनसे बहुत कुछ सीखने, समझने और जीवन में उतारने का मौका मिला, और इसका लाभ भी प्राप्त हुआ। हम उन्हें ‘दासाब‘ कहकर श्रद्धा और आदर-सम्मान देते हुए स्वयं को गौरवान्वित महसूस कर आनंद भाव से सराबोर हो उठते।

बीच-बीच में जब भी अवकाश में बांसवाड़ा जाना होता, करीब-करीब रोजाना ही ‘दासाब’ से मुलाकात हो ही जाती। पास के मन्दिरों के दर्शन और कुछ देर वहां विश्राम उनका नित्यप्रति का नियम था। और इस दौरान उनका क्षेत्र भर के लोगों से मेल-मिलाप भी हो जाता और परिवेशीय हलचलों की जानकारी भी मिल जाती। जब भी उनसे मुलाकात होती, वे हमेशा कुछ मिनट रुककर खैर-खबर लेते और पूरी उदारता के साथ आशीष देते। दो माह पहले ही पण्ड्याजी से महालक्ष्मी चौक पर ही काफी देर तक बातचीत हुई।

उन दिनों हमारे पैतृक निवास महालक्ष्मी चौक और आस-पास गजेटेड अफसर दो-तीन ही थे। इनमें पण्ड्याजी और स्व. चन्द्रशेखर व्यास जी दो ही ऎसे श्रेष्ठ शिक्षा अधिकारी थे जिनके वहां दस्तावेज अटेस्टेट कराने वालों की भीड़ लगी रहती। हालात यह होते थे कि इन्होंने कभी किसी को निराश नहीं किया, चाहे कोई किसी भी वक्त उनके दर पर क्यों न पहुंचा हो। फिर काम होने के साथ ही भरपूर आतिथ्य भी मिलता।

दासाब श्री रामेश्वरप्रसाद पण्ड्या जी जैसे किरदार ही दुनिया की हर समस्या पर विजय प्राप्त कर सकने में समर्थ हो सकते हैं। अच्छे गौभक्त और गौसेवक के रूप में भी उनकी भूमिका को सदैव याद किया जाता रहेगा। पुरखों के पुण्य और उनकी ही बदौलत उनका पूरा परिवार शिक्षा और संस्कारों का गढ़ माना जाता है।

बहुआयामी और अनुकरणीय व्यक्तित्व के रूप में पं. रामेश्वर प्रसाद पण्ड्या जी ‘दासाब’ का समग्र जीवन इंसानियत और लोक कल्याण के भगीरथ के रूप में जीने का संदेश संवहित करता है।

आज वे हमारे बीच नहीं हैं लेकिन बचपन से लेकर अब तक दशकों तक मिलता रहा उनका सान्निध्य, अनगिनत जीवनानुभवों की सीख और सर्वस्पर्शी व्यक्तित्व कोई भुला नहीं पाएगा।

एक मनीषी चिन्तक, शिक्षाविद्, प्राच्यविद्यामर्मज्ञ, संवेदनशील और कठोर प्रशासक, नैष्ठिक गौभक्त और अच्छे-सच्चे इंसान के रूप में उनकी कमी हमेशा अखरेगी। उनका चले जाना विभिन्न क्षेत्रों के लिए अपूरणीय क्षति है। उनके महाप्रयाणी शोक और संवेदना के इस अवसर पर उनके प्रति अश्रुपूरित श्रद्धान्जलि भी बौनी हो गई है।

ॐ शान्तिः शान्तिःशान्तिः ।

3 thoughts on “स्मृतिशेष – रामेश्वरप्रसाद पण्ड्या

  1. रामेश्वरप्रसाद पण्ड्या का महाप्रयाण – समाप्त हो गया एक युग
    कभी न भुला पाएंगे, समाज-जीवन और परिवेश के लिए अपूरणीय क्षति।
    हार्दिक शोक, गहन संवेदनाएं एवं भावभीनी श्रद्धान्जलि महामना पण्ड्याजी को

  2. सांस्कृतिक योद्धा का जाना अपूरणीय क्षति

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