दैदीप्यमान नक्षत्र हर दिल अजीज प्रो. (डॉ.) महिपालसिंह राव

लोक मनोविज्ञान के फक्कड़ दर्शन विज्ञानी ….

जिनका समग्र जीवन है आनंद और उल्लास भरा सुनहरा मनोरम प्रपात

विद्वानों के प्रदेश वाग्वर की आदिकाल से यह परंपरा रही है कि समाज-जीवन और तमाम परिवेशीय आयामों से जुड़े मेधा-प्रज्ञा सम्पन्न विद्वजनों की अविराम श्रृंखला हमेशा ज्ञान-विज्ञान और लोक लहरियों का जयगान करती रही है। आज भी यह परंपरा अपने पूरे उत्कर्ष के साथ बरकरार है।

बाँस की तरह आसमानी ऊँचाइयों भरी बिन्दास और मुक्ताकाशी आनंद भाव में रमण करने वाली प्रज्ञावान हस्तियों से भरे बाँसवाड़ा की रत्नगर्भा वसुन्धरा में शिक्षा, साहित्य, संस्कृति, संगीत, कला, धर्म-अध्यात्म, पर्यटन, खेलकूद, ज्ञान-विज्ञान, पराविज्ञान और प्राच्यविद्याओं से लेकर आधुनिक विधाओं और नवाचारों तक में अपना महारत दर्शाने और अंचल को गौरवान्वित करने का दौर इक्कीसवीं सदी को भी गर्व प्रदान कर रहा है।

विद्वानों का गढ़ है वाग्वर

विद्वानों के नाम से सुप्रसिद्ध रहे वाग्वर अँचल भर में उन व्यक्तित्वों की कभी कोई कमी नहीं रही जिन्होंने किसी क्षेत्र विशेष में बांसवाड़ा का नाम गौरवान्वित किया और जननी, जन्मभूमि और अपने कुल को जो गौरव प्रदान किया, वह आज भी स्वर्णिम इतिहास बना हुआ ऊर्जा और प्रेरणा का संचार कर रहा है।

वागड़ को गौरव प्रदान करने में सर्वाधिक योगदान शिक्षाविदों का रहा है जिन्होंने अपने समर्पित ज्ञान योग से जाने कितनी पीढ़ियों और असंख्य शिक्षार्थियों को भविष्य निर्माण की रोशनी दिखाई और सुनहरी एवं आत्मनिर्भर जिन्दगी का साक्षात कराया।

बहुआयामी व्यक्तित्व

बांसवाड़ा की शैक्षिक विभूतियों में अग्रणी नाम है – प्रोफेसर (डॉ.) श्री महिपालसिंह राव। माही के तट पर मही धरा बांसवाड़ा में वे केवल शिक्षाशास्त्री के रूप में ही नहीं बल्कि बहुआयामी व्यक्तित्व के रूप में छाए हुए रहे हैं।

हर दिल अजीज प्रो. राव हिन्दी और आंग्ल दोनों भाषाओं पर समान अधिकार रखते है वहीं वागड़ी बोली के आधिकारिक विद्वान भी हैं। उनके सम्पर्कितों को यह अच्छी तरह अनुभव होता है कि जब वे वागड़ी में संवाद करते हैं तब माटी की सौंधी गंध के साथ ठेठ वागड़ी की मौलिक महक भी अनुभवित होती है और वागड़ी बोली का माधुर्य भी झरता रहता है।

जड़ों को नहीं छोड़ा

ग्रामीण परिवेश में पले-बढ़े और पारिवारिक संस्कारों से परिपुष्ट संस्कृतिनिष्ठ व्यक्तित्व का पुट उनके हर कर्म, स्वभाव और व्यवहार में परिलक्षित होता है। उन्होंने अपनी वंश परंपरा, संस्कृति और ग्रामीण धरातल को कभी नहीं छोड़ा इसलिए उन्हें जमीन से जुड़ा हुआ बुद्धिजीवी माना जाता है।

मन मोह लेता है सर्वस्पर्शी व्यक्तित्व

आम तौर पर थोड़ी सी विद्वत्ता, पद, प्रतिष्ठा और पैसा आ जाने पर इंसान में अहंकार का अघोषित व अदृश्य प्रवेश सामान्य बात है और कोई भी सामान्य इंसान इस माया से बच नहीं सकता।

लेकिन प्रो. महिपालसिंह राव इन सबसे अलग हैं। हर तरह के इंसानी मनोविज्ञान की गहरी टोह रखने वाले डॉ. राव बच्चों, अपने विद्यार्थियों, बड़े-बुजुर्गों, साथियों और ग्रामीणों से उन्हीं के मनोविज्ञान के अनुरूप आत्मीयता का भाव रखते हुए जिस प्रकार के संवाद सातत्य के हामी हैं उसी का नतीजा है कि हर आयु वर्ग के लोगों को लगता है कि वे उन्हीं के खास और आत्मीय हैं।

किसी भी इंसान के व्यक्तित्व की आशातीत सफलता इसी में निहीत है कि जो सम्पर्क में आए, उस हर इंसान को आनंद और आत्मीयता प्राप्त हो और जो एक बार किसी भी कारण से सम्पर्क में आ जाए, उसे बार-बार मिलने की तीव्रतर आतुरता हमेशा बनी रहे।

डॉ. महिपालसिंह राव इसी सर्वस्पर्शी व्यक्तित्व के धनी हैं और यही वजह उन्हें सब जगह हर दिल अजीज के रूप में पेश करती है। यह उनके व्यक्तित्व की वह विलक्षणता है जो अन्यतम भी है और अनुकरणीय भी।

मानवीय संवेदनाओं के आदर्श

आजकल आम तौर पर सामान्य व्यक्तित्व हों या उच्च पदस्थ प्रतिष्ठत बुद्धिजीवी, उनके जीवन का लक्ष्य स्व सेवाओं के प्रति समर्पित दायित्वों का निर्वहन और समाज व देश के हितों का चिन्तन नहीं होकर  प्रतिष्ठा, पैसा, पद, पुरस्कार, सम्मान और लोकप्रियता पाना ही दिखाई देता रहा हैं। और इन भौतिक लाभों को पाने के लिए ये लोग किस-किस तरह के समीकरण बिठाते हैं, सैटिंग करते हैं और चाहे-अनचाहे समझौते करते रहते हैं, यह किसी से छिपा हुआ नहीं है।

निरपेक्ष कर्मयोग के साक्षी

भौतिकता की अंधी दौड़ और गलाकाट प्रतिस्पर्धा के बावजूद आज भी मानवीय संवेदनाओं, निष्काम सेवा और परोपकार के साथ लोक मंगल और सामुदायिक उत्थान के लिए जीने वाले इंसानों का बीज खत्म नहीं हुआ है। आज भी बहुत से ऎसे व्यक्तित्व हैं जो अपने स्वार्थों, पैसों, पद और प्रतिष्ठा से दूर रहकर मौन साधक बने हुए समाज और अपने क्षेत्र के लिए बहुविध कल्याणकारी दिशा और दृष्टि रखते हैं। प्रो. महिपालसिंह राव इन्हीं कर्मयोगियों की परंपरा में जाना-पहचाना चेहरा हैं।

मौन सेवाव्रती साधक

उनके बारे में बहुत कम लोगों को ही यह पता होगा कि वे चुपचाप कितने अधिक ऎसे सेवा और परोपकारी कार्य करते रहे हैं जिसकी वजह से अनगिनत लोगों की जिन्दगी में रोशनी और सुकून आया है और वे लोग आज भी प्रो. राव के प्रति अगाध श्रद्धा भाव से भर कृतज्ञता ज्ञापित करना नहीं भूलते। लोकप्रिय किसी को भी कहा जा सकता है लेकिन लोकमान्य वही हो सकता है जिसके लिए दुनिया के हृदय में अपने लिए आस्थावान स्थान हो। इस दृष्टि से प्रो. राव की सेवाएं स्तुत्य और अनुकरणीय होने के बावजूद किसी की तारीफ की मोहताज नहीं हैं। हजारों लोग उन्हें दिल से चाहते हैं और आदर-सम्मान करते हैं, यही उनके लिए जीवन भर की वह पूंजी है जो बिरलों के भाग्य में ही होती है।

नई पीढ़ी को हरसंभव सम्बल

गरीब और जरूरतमन्द छात्र-छात्राओं को बिना किसी अपेक्षा के निरपेक्ष भाव से निःशुल्क पढ़ाने, प्रोत्साहित करने, सम्बलन और मार्गदर्शन प्रदान करने की उनकी अपनी परंपरा है जिसने नई पीढ़ी के भाग्य को सँवारा है। यही नहीं तो अभावग्रस्तों और समस्याओं से पीड़ित आप्तजनों की हरसंभव मदद और सेवा उनके जीवन का चरम लक्ष्य रहा है जो उनके कद को दूसरे सभी लोगों से इतनी अधिक ऊँचाई दे चुका है कि सामान्य और ओछी बुद्धि के लोगों को उनसे बिना किसी कारण से ईष्र्या और द्वेष का अनुभव होता रहा है। प्रो. राव को अपना शत्रु मानने वाले कतिपय लोगों के हृदय भी उनकी तारीफ करते नहीं थकते।

विनम्रता की प्रतिमूर्ति मिलनसार प्रो. राव साहब के मन में अपने गुरुजनों, बुजुर्गों और विद्वानों के प्रति श्रद्धा का ज्वार हमेशा लहराता रहा है और यही वजह है कि इन सभी का दिली आशीर्वाद उन्हें प्राप्त होता रहा है।

क्षात्र धर्म का निर्वाह

क्षत्रिय कुल की मर्यादाओं और परंपराओं का पालन करने वाले प्रो. महिपालसिंह राव सज्जनों के प्रति जितने अधिक विनम्र हैं उसके ठीक उलट दुष्टों और अधर्मियों के लिए अरिमर्दन की भूमिका में भी दिखाई देते हैं। जहाँ कहीं कुछ गलत होता दिखाई देता है उसका प्रतिकार करने और यथोचित समझाईश से लेकर निर्णायक संघर्ष तक का माद्दा उनमें कूट-कूट कर भरा हुआ है। यही कारण है कि दुर्जन उनसे हमेशा भय भी खाते हैं और दूरी भी बनाए रखते हैं।

हर फन में माहिर

किसी एक इंसान में यदि लोक संस्कृति, परंपराओं, सामाजिक, धार्मिक, ऎतिहासिक, आध्यात्मिक, साहित्यिक और मानवीय सरोकारों के प्रति संवेदनशील भावों का मूर्त रूप देखना हो तो प्रो. राव अकेले ही काफी हैं।

रंगमंचीय निर्देशक से कम नहीं

मानवीय संवेदनाओं के चरम स्तर पर जीने वाले एमपीसिंह या राव साहब के भीतर रंगमंच का वो जीवन्त कलाकार समाया हुआ है जो जीवन के रंगों का कभी सृष्टा और कभी साक्षी है और जिसने अपने अभिनय को बिन्दास होकर रोमांटिक अन्दाज में भी जीया है और धीर-गंभीर भावों के साथ ही।

इतने सारे किरदारों को जीने और ऎतिहासिक छाप छोड़ने के बावजूद रंगमंच का यह सिद्धहस्त कलाकार असम्पृक्त रहा है और यही उनके जीवन की विलक्षणता है। जिन्होंने उनकी बिन्दासगी और उन्मुक्त वैचारिक लहरों को देखा है वे कुछ समय तो समझ ही नहीं पाए लेकिन अर्से बाद बौद्धिक जागरण होने पर उन्होंने प्रो. राव में अनासक्त कर्मयोगी की छवि देखी है।

खर अभिव्यक्ति, हर मोर्चे पर सक्रिय

आमतौर पर बुद्धिजीवी या प्रबुद्धजन लोक में अपनी छवि को सकारात्मक, बेदाग और निर्विवाद बनाए रखने के लिए तटस्थता का कंबल ओढ़ लिया करते हैं और इस तरह जीवन जीने लगते हैं जैसे कि शीत निष्कि्रयता में चले गए सरिसृप।

यह भी देखा गया है कि अधिकतर प्रबुद्धजन ज्यों-ज्यों बौद्धिक परिपक्वता और बौद्धिक जगत के मायावी सांसारिक अनुभवों को प्राप्त करते जाते हैं त्यों-त्यों ये बुद्धिजीवी समाज, क्षेत्र और देश से जुड़े तमाम सरोकारों के प्रति गहरी चुप्पी साध लिया करते हैं और ऎसा व्यवहार करने लगते हैं जैसे कि उनका किसी सामाजिक व राष्ट्रीय सरोकार से कोई मतलब ही नहीं हो।

बुद्धिजीवियों की जिन्दगी में इसीलिए लांछन लगते हैं कि वे अपनी खुदगर्जी और स्वार्थपरायणता के कारण अपनी ही अपनी सोचते और करते हैं लेकिन डॉ. महिपालसिंह राव इस मायने में अपनी अलग ही पहचान रखते हैं। प्रो. सिंह जहाँ कहीं रहे वहाँ छाए रहे। उनके संगी-साथी और मित्र भी अच्छी तरह यह महसूस करते रहे हैं कि उनके बिना कोई चर्चा पूरी होती ही नहीं।

हर संघर्ष में उत्प्रेरक

छात्र हित, लोक हित और क्षेत्रीय सरोकारों का कोई सा विषय सामने आया, वहाँ उन्होंने निर्भयता से मुखर होकर अभिव्यक्ति भी की और संघर्ष में उत्प्रेरक की भूमिका भी अदा की। यही कारण रहा कि विद्यार्थी उनके प्रशंसक रहे और जब कभी विद्यार्थियों का कोई विवाद किसी से नहीं सुलझता तब उनकी मदद ली जाती।

अभिमन्यु से एक कदम आगे

कई ऎसे विषयों पर कुटिलमनाओं द्वारा उन्हें घेरा गया जो आडम्बर और षड़यंत्रों के पर्याय थे लेकिन पूरे साहस के साथ अडिग रहकर उन्होंने सामना किया और दर्शा दिया कि यह वागड़ भूमि है जहाँ पैदा होने वाले अभिमन्यु चक्रव्यूह का भेदन करना भी जानते हैं और वहाँ से सकुशल निकल कर विजय पताका फहराना भी।

महाविद्यालयी शिक्षकों के संगठन की जड़ों को मजबूत करने से लेकर व्यापकता और सुदृढ़ता देने में प्रो. राव का कोई सानी नहीं। 

आम तौर पर बड़े-बड़े लोग अपने काम-धंधों के इर्द-गिर्द ही अपने-अपने संसार रच लिया करते हैं और उन्हीं में रमण करते हुए पूरी जिन्दगी निकाल दिया करते हैं। उन्हें यह तक पता नहीं रहता कि उनके आस-पड़ोस में कौन रहता है, क्या करता है और क्या हो रहा है।

रचनात्मक सरोकारों के निर्वाह में अग्रणी पहचान

प्रो. राव ने साहित्यिक-सांस्कृतिक और सामाजिक सहित तमाम प्रकार की रचनात्मक गतिविधियों में पूरी सक्रियता के साथ भाग लिया और अपनी अहम् भूमिका भी दर्शायी। दर्जनों अवसरों का साक्षी लेखक स्वयं रहा है। क्षेत्र में कोई सा कार्यक्रम हो, उनकी सक्रिय भागीदारी या मार्गदर्शन के बिना इसकी सफलता की उम्मीद नहीं होती।

ऊर्जा और उत्साह भर देती है उनकी एक झलक

समाज और क्षेत्र के लिए जीने और लोकमंगलकारी कर्म करने का ज़ज़्बा रखने वाले राव साहब का उत्साह, उल्लास और उमंग देखने लायक है। उनकी मौजूदगी ही अपने आप में नवीन ताजगी भरी ऊर्जा का संचार कर देने के लिए काफी है। 

प्रो. राव साहब पर अभिनंदन ग्रंथ को जो प्रकाशन हुआ है वह अच्छी पहल है तथा स्वागत योग्य एवं स्तुत्य है। इस प्रकार के प्रयासों की वागड़ में आवश्यकता है ताकि हमारी आने वाली पीढ़ियाँ ज्ञान और अनुभवों के समृद्ध भण्डार से कुछ सीख सकें और आगे बढ़ सकें।

बहुत अच्छे और संग्रहणीय अभिनंदन ग्रंथ की रचना करने वाले तमाम सूत्रधार बधाई और साधुवाद के पात्र हैं जिनके सद्प्रयासों से डॉ. महिपालसिंह राव साहब के समग्र व्यक्तित्व और अनुभवों से रूबरू होने का अवसर मिल रहा है। यह वागड़ के इतिहास में स्वर्णिम दस्तावेज, संग्रहणीय एवं सदा अनुकरणीय ग्रंथ सिद्ध होगा।

5 thoughts on “दैदीप्यमान नक्षत्र हर दिल अजीज प्रो. (डॉ.) महिपालसिंह राव

  1. Respected Sir
    आपका जीवन ही हमारे लिए प्रेरणा देता है ।आपका मार्गदर्शन एवम आशीर्वाद सदा हम पर बना रहे।आप सदैव स्वस्थ, प्रसन्न एवम दीर्घायु होवे ऐसी माँ जगदम्बा से हरदम प्रार्थना ।
    शुभम भवतु

  2. निर्विवादित आदर्श के चरणों मे सादर चरण स्पर्श। आपका सानिध्य और स्नेह हर क्षण मिलता रहेगा। यही आशा और विश्वास है।

Leave a Comment

Your email address will not be published. Required fields are marked *