सास हैं या सुरसा

सास हैं या सुरसा

घर-परिवार में सबसे ज्यादा चर्चाओं में रहने वाली कोई किरदार है तो वह है सास।  सास के सम्पूर्ण व्यक्तित्व का मूल्यांकन करने में बहूओं के सिवा और कोई निर्णायक हो ही नहीं सकता। लेकिन नीर-क्षीर निर्णय तभी संभव है कि जब सास और बहू दोनों ही पक्ष बिना किसी पक्षपात, भेदभाव और पूर्वाग्रह-दुराग्रह के स्वस्थ मूल्यांकन करें।

पर ऎसा होना संभव नहीं है क्योंकि कुछ अपवादों को छोड़कर सास-बहू में अन्तर्विरोध और आमना-सामना होते रहना आम बात है। बहूओं की निगाह में सास खराब होती है और सास की निगाह में बहूए खराब।

दोनों एक-दूसरे को खराब कहती हुई मन ही मन भी कोसती रहती हैं और अवसर आने पर सीधी मुठभेड़ हो जाना भी स्वाभाविक ही है। बहुत कम सास-बहूएं ऎसी होंगी जिनमें कहीं कोई मनमुटाव या संघर्ष न हो, अन्यथा अधिकांश परिवारों में जिन्दगी भर की कहानियां सास-बहू के लड़ाई-झगड़ों और तानों के इर्द-गिर्द की घूमती रहती हैं और हमेशा बेनतीजा ही रहती है।

कभी यह पीढ़ी-संघर्ष के दौर को व्यक्त करती हैं और कभी दोनों के बीच अहंकारों का पारा ऊपर-नीचे होता रहता है। दुनिया में ये दोनों जीव ही ऎसे हैं जो एक-दूसरे को पुरातनपंथी, मूर्ख, संवेदनहीन, नासमझ और शोषक समझते हैं तथा यह मानते हैं कि इनके कारण से जीना मुश्किल हो चला है।

सास मरते दम तक यही मानती रहती है कि उसे अच्छी बहू नहीं मिली, यदि जल्दबाजी न की होती या अच्छा भाग्य होता तो शायद अच्छी बहू मिलती, जिससे उसकी अच्छी छनती और घर स्वर्ग बन जाता, मरने के बाद न कोई चिन्ता होती, न मुक्ति में कोई बाधा होती।

इस प्रकार का सोच रखने वाली हर सास यह मानती है कि उसका यह जनम उसकी बहू की वजह से बिगड़ गया है और भगवान से यही प्रार्थना करती है कि ऎसी बहू उसे ही नहीं किसी और को भी नहीं मिले।

इस सोच के बावजूद सास अपनी बहूओं की छाती पर मूंग दलती रहती है और रोजाना कोई न कोई कारण खोज कर कोसती रहती है। सास के पक्ष का सबसे मजेदार पहलू यह है कि वह जब अपनी बहू पर कुपित होती है तब न केवल बहू को भी बुरा-बुरा कहती है, बल्कि उसके हर ताने के साथ पीहर वाले डिफाल्ट प्रोग्रामिंग की तरह जुड़ ही जाते हैं और सास सारी गलती उन्हीं की मानती-मनवाती है और दोषी ठहराती है।

एक सास अपनी पूरी जिन्दगी में जितनी बार राम-राम नहीं करती, जितना भगवान का नाम नहीं लेती, उससे कई सौ गुना अधिक बार अपनी बहूओं के पीहर वालों का पावन स्मरण करती रहती है। इसके साथ ही अपने पुत्र का नाम भी शामिल करती है लेकिन इस गौरव के साथ कि उसका पुत्र शादी से पहले तक तो बहुत अच्छा था लेकिन शादी के बाद से ही बिगड़ गया है, पत्नी का गुलाम हो गया है। और इस सबकी जिम्मेदार वह बहू को मानती है जिसने उनके शालीन, आज्ञाकारी और संजीदा पुत्र को इतना बिगाड़ कर रख दिया है कि वह माता-पिता की बजाय पत्नी का अधिक भक्त हो गया है, जो पत्नी कहती है उसे ब्रह्मवाक्य मानकर पूरा करता रहता है।

इसी तरह बहूओं का खेमा भी कोई कमजोर नहीं होता। उसके पास भी खूब सारे तीर हैं जो हमेशा धारदार बने रहते हैं। बहूओं का तर्क यही रहता है कि सास उनकी निजी जिन्दगी मेंं झाँकती और दखल देती है जबकि बुढ़ापे में उसे घर-परिवार और संसार की बातों में रस लेने और बेवजह उपदेशों, उलाहनों आदि की बरसात करते रहने की बजाय अपना जो भी समय बचा-खुचा है उसे भगवान की भक्ति, सत्संग और समाजसेवा के कामों में लगाना चाहिए।

लेकिन ऎसा नहीं कर वे फालतू की उलझनों में फंसे रहना चाहती हैं। बहूओं का यह भी मानना रहता है कि उनके पति भी शादी के इतने सालों बाद भी माँ की ही हर बात मानते हैं और पत्नी की सुनते तक नहीं। इसके लिए बहूएं अपनी सास के साथ-साथ अपने पति को भी खूब सुनाती रहती हैं। बहूएं अपनी सास में सभी युगों की राक्षसियों को देखती हैं और इनके आधार पर अपनी-अपनी सास का नामकरण संस्कार भी करती रहती हैं।

बहूए नए जमाने के अनुसार चलना और ढलना चाहती हैं किन्तु सास पुराने ढर्रों की सीख देती है। बहूएं स्वाधीनता चाहती हैं और उनका मानना है कि देश भले ही स्वाधीन हो गया हो किन्तु असली स्वाधीनता तभी आ सकती है जब सासों के अन्याय, अत्याचार, दमन, प्रताड़ना, शोषण आदि से बहूओं को मुक्ति मिल जाए।

पर ऎसा होना संभव नहीं है। बहूओं का यह भी मानना है कि जब तक उनके पति सास की हर बात को मानते रहने की आदत पाले रहेंगे, जब तक ससुरजी भी अपनी पत्नी के कहने में चलते रहेंगे, सास में मानवीय संवेदनाएं नहीं जग पाएंगी, प्रेम का बीज अंकुरित नहीं होगा, सास को जब तक आत्मज्ञान नहीं होगा, तब तक वह ऎसी ही बनी रहेगी।

बहूओं का यह भी कहना है कि सास भले ही सैकड़ों भागवत कथाएं सुन लें, दिन-रात घर में बैठकर या मन्दिरों में जा जाकर पूजा-पाठ, कीर्तन-भजन और सत्संग में घण्टों रमी रहे, धर्म के नाम पर दुनिया भर के ढोेंग करती रहे, कितने ही बाबाओं, संत-महंतों, योगियों और ध्यानयोगियों से लेकर ज्योतिषियों, तांत्रिक-मांत्रिकों से आशीर्वाद पाती रहे, कुछ नहीं होने वाला, जब तक कि उसके मन में प्रेम और पवित्रता के भाव जागृत न हों। भगवान के सामने भी सास अपनी बहू से मुक्ति दिलाने और बहूएं अपनी सास को जल्दी वापस बुला लेने की प्रार्थना करती हैं।

सास-बहू के बीच अजीबोगरीब संवादों, हठधर्मिता, एक-दूसरे को कोसते रहकर उलाहना देने और नीचा दिखाने के लिए इतना कुछ किया जाता है कि इनकी जिन्दगी का आधे से अधिक समय इसी में जाया हो जाता है।

सास और बहूओं के एक-दूसरे पर यह आरोप भी आम हो गए हैं कि घर के बाहर इज्जत खराब करती हैं, कुछ न कुछ टोने-टोटके करवाती रहती हैं और हमेशा औरों के सामने नीचा दिखाने में लगी रहती हैं।

दोनों पक्षों का घमासान जिन्दगी भर चलता रहता है। वे परिवार धन्य हैं जहाँ सास और बहू के बीच आत्मीय और माधुर्य से भरा-पूरा रिश्ता होता है अन्यथा अधिकांश परिवारों में सास-बहू का टकराव हमेशा बना रहता है।

कहीं इसमें सास की भूमिका दोषी होती है, कहीं बहू की। लेकिन दोनों में से कोई यह मानने को तैयार नहीं होता कि वे जो कुछ कर रही हैं उससे न परिवार का भला होगा, न उनमें से किसी को प्रतिष्ठा प्राप्त होगी।

महिलाओं की चर्चाओं में अधिकांश बातें सास और बहू पर ही केन्दि्रत हुआ करती हैं। इनके बगैर कोई सी चर्चा पूर्ण नहीं मानी जा सकती। चाहे वह घर-परिवार या समाज में हो अथवा मन्दिरों, धर्म धामों और यात्राओं में। यहाँ तक कि रेल और बसों में भी सास-बहू की चर्चाएं आम रहती हैं और इन्हें सुन-सुन कर आस-पास के यात्री भी आनंद उठाते रहते हैं।

यथार्थ भी कि अधिकांश सासें अपनी बहुओं को अकारण हठ पाले हुए हैरान-परेशान करती रहती हैं, बात-बात में उन्हें टोकती, रेाकती और तंग करती रहती हैं, उलाहना देती हैं, कई दुष्ट और क्रूर सासें तो खुली गालियां तक बकती रहती हैं जैसे कि धुलेड़ी के दिन भंग पी ली हो।

बहूओं की शिकायतें वाजिब हुआ करती हैं क्योंकि अक्सर सास की गलतियां ही सामने आती हैं। हिंसक स्वभाव वाली सासों में से बहुत सी धार्मिक आडम्बरों की आड़ में जीती रहकर अपने आपको परम धार्मिक मानती-मनवाती हैं किन्तु इनके भीतर का पैशाचिक स्वरूप बहूओं से छिपा हुआ नहीं रहता।

बहू को अपने हिसाब से ढालकर आदर्श बनाने में वही सास विफल रहती है जो खुद दुष्ट हो तथा अहंकारों से भरी हो। ऎसी सास अपने पति को भी गुलाम बनाकर रखती है और मरने के बाद भी इनकी आत्मा भटकती रहती है।

बहूओं को भी बेवजह कलह से बचने की जरूरत है और इसके लिए धैर्य व संयम जरूरी है। सास-बहू के रिश्तों और व्यवहार पर कोई न कोई पुराण सामने आएगी ही। प्रतीक्षा करते रहें क्योंकि इन जीवात्माओं पर लिखना भी महान पराक्रम और साहस से कम नहीं।

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