गणेश चतुर्थी का चन्द्र दर्शन देता है कलंक

चन्द्रमा आरंभ से पूजनीय और प्रिय रहा है। रोमांस और प्यार का कोई भी आयाम चाँद के जिक्र या उपमा के बगैर पूरा नहीं होता। यहाँ तक कि प्रेमिका के मुख की तुलना चाँद से की जाती रही है।

पौराणिक कथाओं से लेकर आज की फिल्मों और लव स्टोरीज़ तक में चाँद और प्रेमिका का शाश्वत संदर्भ भरा पड़ा है। इतने महत्व के बावजूद साल में एक दिन ऎसा भी होता है जब चाँद का दर्शन तक अशुभ माना जाता है और लोग उसकी ओर देखने से भी बचते रहते हैं। 

पुराने जमाने से मान्यता चली आ रही है कि गणेश चतुर्थी पर चाँद का दर्शन अशुभ है और इस दिन चन्द्रमा के दर्शन हो जाने पर किसी भी तरह का झूठा इल्जाम अपने सर आता है। इस कारण लोग इस दिन चाँद के दर्शन तक से दूर रहते हैं।

इस दिन चन्द्रमा का अनचाहे दर्शन हो जाने के भय से कई लोग अपने घरों के पश्चिमवर्ती दरवाजे, खिड़कियां इत्यादि शाम होते ही बन्द कर देते हैं और घरों में नज़रबन्द हो जाते हैं।

लेकिन जो लोग हर महीने शुक्ल पक्ष में दूज के चाँद के नियमित रूप से दर्शन करते हैं वे यदि गणेश चतुर्थी को चन्द्र दर्शन कर भी लें तो इस दोष से दूर रहते हैं। यदि प्रत्येक दूज का चाँद देखने की बजाय गणेश चतुर्थी से पहले भाद्रपद शुक्ल की दूज का चाँद भी देख लें तो चतुर्थी के चन्द्रदर्शन का कुफल नहीं होता।

चन्द्रमा को भगवान गणेश जी का शाप है। इसके अनुसार जो लोग भाद्रपद शुक्ल चतुर्थी के दिन चन्द्रमा का दर्शन करेंगे, वे वर्ष भर वृथा अपयश के अवश्य भागी होंगे। किन्तु जो लोग गणेश चतुर्थी से दो दिन पूर्व भाद्रपद शुक्ल द्वितीया के दिन पहले ही चन्द्रमा के दर्शन कर लेंगे, वे फिर यदि चतुर्थी के दिन भी दर्शन करेंंगे तो भी वे मिथ्यावाद के भाजन नहीं होंगे।

पाराशर ऋषि ने भाद्रपद शुक्ल चौथ को चन्द्रमा देखने को दोष कहा है।  इस चाँद को देखना मिथ्या दोष  लगाता है।

     इसके अलावा वागड़ अँचल में पुरातन काल से परम्परा रही है कि इस दिन भूलवश चाँद देखे जाने पर चाँद की ओर पत्थर उछाले जाते हैं। इससे उस दिशा में रहने वाले लोगों के घरों पर पत्थर पड़ने से वे लोग गालियाँ निकालते हुए विरोध करते हैं इससे चन्द्र दर्शन से होने वाला संभावित अनिष्ट समाप्त माना जाता है।

…..जहाँ चन्द्रमा की ओर उछाले जाते हैं पत्थर

गणेश चतुर्थी पर चाँद दिख जाने की स्थिति में कवेलूपोश कच्चे मकानों और खपरैल वाले मकानों के जमाने में चन्द्रमा की ओर पत्थर उछालने पर मकान के कवेलुओं के टूटने से मामूली विवाद की स्थिति तत्काल उत्पन्न हो जाती है। ऎसे में यह मान लिया जाता था कि चन्द्र दर्शन का ताजा कुफल तत्काल समाप्त हो गया है। इससे दूसरा कोई मिथ्या दोष सामने नहीं आता। और दोष या कलंक माथे आ ही पड़े, तो उसका निवारण संभव हो जाता है।

हालांकि पक्के मकानों की दिनों-दिन बढ़ रही संख्या के साथ ही चन्द्र दर्शन होने पर पत्थर उछालने की यह प्रथा क्षीण होती चली जा रही है लेकिन बतौर टोटका यह परंपरा आज भी वागड़ अँचल में देखी जा सकती है।

दर्शन हो ही जाएं तो ऎसे करें परिहार

गणेश चतुर्थी को चाँद के दर्शन हो जाने पर इससे उत्पन्न संभावित अनिष्ट के निवारण के लिए निम्न मंत्र का तीन बार पाठ कर लिये जाने की शास्त्रीय एवं पौराणिक परम्परा रही हैै-

अर्थात सिंह ने प्रसेन को मारा, सिंह को जाम्बवान ने मार दिया, अतः हे सुकुमारक तू रो मत, यह स्यमन्तक मणि तेरी ही है। विष्णु पुराण में स्यमन्तकमणिका उपाख्यान में इसका पूरा वृत्तान्त वर्णित है। इस मंत्र के तीन बार उच्चारण कर लिए जाने से भावी अनिष्ट का प्रभाव क्षीण हो जाता है।

              सिंहः प्रसेनमवधीत्सिंहो जाम्बवता हतः।  सुकुमारक मा रोदिस्तव ह्येष स्यमन्तकः ॥

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