मुफतिया सलाहकार अमर रहें

संसार की सबसे बड़ी और जीवन्त त्रासदी यह है कि जितने इंसान हैं उनमें से आम इंसानों से अधिक संख्या उपदेशकों और सलाहकारों की है। जितने उपदेशक, कथावाचक और मोटीवेश्नल गुरु और महागुरु पैसे लेकर काम करते हैं उनसे कई गुना मुफतिया हैं।

इन मुफ्त के उपदेशकों और रायदारों की सबसे बड़ी खासियत यह भी है कि ये जिन कामों की राय देते हैं उन पर खुद कभी अमल नहीं करते।

इनकी मुफतिया सलाह और उपदेश केवल दूसरों के लिए ही होता है, स्वयं के लिए नहीं। क्योंकि अपने आपको ये सर्वज्ञ और स्वयंभू मानते हैं। और ऎसे लोगों के लिए किसी भी प्रकार के वादों, दावों और दायरों में बंध पाना नितान्त असंभव ही होता है।

हम सभी की जिन्दगी में शायद ही कोई दिन या सप्ताह ऎसा जाता होगा जब किसी उपदेशक या सलाहकार से भेंट न हुई हो। हर सौ आदमियों मेंं आधे से अधिक ऎसे ही होंगे जो किसी न किसी को सलाह देते हुए दिख जाएंगे जैसे कि ये लोग उस क्षेत्र विशेष के ज्ञाता ही हों।  ये सामने वालों को हमेशा मूर्ख ही समझते हैंं।

किसी एक विषय के ज्ञान तक ये सीमित नहीं होते बल्कि सभी विषयों और पहलुओं के बारे में ये अपने आपको विशेषज्ञों में सर्वश्रेष्ठ समझते रहते हैं और यही कारण है कि संसार में बिना मांगे सलाह देने वाले मशविराछाप लोगों की भीड़ हर कहीं दिख ही जाती है।

रोजाना हर क्षेत्र में हजारों से लेकर लाखों समूह आपस में सलाह देते, बतियाते और गप्प हाँकते दिखाई दे ही जाते हैं। अपनी पूरी जिन्दगी के कई सारे घण्टे औरों को उपदेश या सलाह दे डालने वाले ऎसें लोगों के कारण ही पार्क, चौराहे, सर्कल, पाट, फुटपाथ, डेरे और सार्वजनिक चर्चा मंच आबाद रहा करते हैं।

कुछ आते हैं, उपदेश और सलाह झाड़ कर चले जाते हैं, फिर दूसरे आते हैं और गपियाते हैं, थक जाने पर ये भी चले जाते हैं, और  यों ही यह सिलसिला निरन्तर चलता रहता है। दुनिया में बहुत बड़ी संख्या में भीड़ ऎसी है जो चूहे-बिल्लियों और कुत्तों के रूप में पैदा होनी चाहिए थी किन्तु जाने किस पुण्य से इंसानी चौला मिल गया।

इस किस्म के लोग एक-दूसरे की आलोचना, निन्दा करने, एक-दूसरे को भिड़ाकर मजा लूटने और मसालची के रूप में तोप में गोला-बारूद भरने के लिए ही पैदा हुए हैं। पहले मसालची और मशालची हुआ करते थे, अब उनका कोई काम नहीं रहा इसलिए अब इंसानों की नई किस्म के रूप में ये पैदा हो गए हैं।

इनके लिए अपनी पूरी जिन्दगी का कोई सा पक्ष ऎसा नहीं रहता जिस पर वे चिन्तन करते हों लेकिन औरों की जिन्दगी के श्वेत-श्याम और दृश्यादृश्य सभी पहलुओं के बारे में चिन्ता और चिन्तन करना इनका वो अहम् स्वभाव बन जाता है जो कि जीवन रहने तक इनका पीछा छोड़ नहीं पाता।

खुद के भाग्य और भविष्य से बेखबर लोग दूसरों का भाग्य बाँचने का ऎसा ढोंग करते हैं जैसे कि त्रिकालज्ञ ही हों। खुद को संप्रभु के शीर्षस्थ सिंहासन पर विराजमान देखने के आदी इन लोगों की पूरी जिन्दगी दूसरों के लिए ही खर्च होती रहती है।

इनके दिमाग में दुनिया भर के लोग और उनकी अनावरित बातें ठूँस-ठूँस कर भरी होती हैं और इस कारण से दिमागी अजीर्ण हमेशा बना रहता है। इनका मन मालिन्य इतना अधिक भरा रहता है कि कालिख का समन्दर लहराता रहता है।

और जब किसी इंसान का दिल-दिमाग प्रदूषित हो जाता है तब उसका शरीर भी प्रदूषित हो जाता है। और यही वजह है कि मलीन मन और खुराफाती दिमाग वाले लोगों का पूरा शरीर एक समय बाद अजीब किस्म की सडान्ध मारने लगता है और मस्तिष्क या तो स्मरण शक्ति खो बैठता है अथवा उन्मादी अवस्था को प्राप्त कर लिया करता है।

ऎसे ही लोग दुनिया में सभी तरह के इंसानों के बारे में तरह-तरह के दुराग्रह पाल लिया करते हैं और अलग-अलग धारणाएं बना लिया करते हैं। ये ही लोग हैं जो चाहते हैं कि पूरी दुनिया उनके हिसाब से चले और चलती रहे।

ये लोग अक्सर किसी न किसी के बारे में लोगों को राय देते रहते हैं कि इनके साथ रहो, इनके साथ न रहो। इनका साथ दो, उनका साथ न दो, आदि-आदि। यानि की दुनिया इन्हीं के हिसाब से चले। ये जिनके साथ चाहें उनके साथ रहो, जिनके साथ न चाहें उनके साथ न रहें।

दुर्भाग्य और शर्म की बात यह है कि जो लोग ऎसी राय देते हैं वे स्वयं भी चरित्रहीन, कपटी, लम्पट और भ्रष्ट होते हैं और अपने स्वार्थ के कारण से औरों को भरमाते व भ्रमित करते रहते हैं। जिसे जिसके साथ रहना हो, जी भर कर रहे, रहने दें।

हर इंसान अनाज खाता है और सभी में परमात्मा ने पूरी बुद्धि भरी है। इसलिए जब तक इंसान स्वयं के स्तर पर व्यवहारिक रूप से अच्छे-बुरे का अनुभव न कर ले, तब तक उसे कुछ भी राय देना बेकार है।

सीख, सलाह और उपदेश वही सार्थक होते हैं  जो निर्मल मन के होते हैं। जिनका मन निर्मल नहीं होता, उनका कोई शब्द असरकारी नहीं हो सकता। यही कारण है कि मुफतिया लोगों की बातों पर लोग अधिक गौर नहीं करते।

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