किसे बनाएं आदर्श, किसका करें अनुकरण

आज का सबसे बड़ा यक्षप्रश्न है – किसे बनाएँ अपना आदर्श। यह अपने आप में छोटा सा किन्तु सृष्टि के हर इंसान से संबंधित है।

हर तरफ अभिभावकों, प्रेरकों, गुरुओं, बाबाओं, कथाकारों, सत्संगियों, उपदेशकों, नेतृत्वकर्ताओं और मार्गद्रष्टाओं की भारी बाढ़ आयी हुई है। और सभी एक ही बात को बार-बार दोहराते हुए कहते हैं आदर्शों पर चलें।

कोई भी इंसान तभी आगे बढ़ने के लिए प्रेरित होता है जब उसे किसी में कोई अच्छाई दिखती है और वह उसे आदर्श मान बैठता है।

आजकल किसी को भी आदर्श मान लिए जाने के बाद कई सारे खतरे झेलते हुए अन्ततः उसे त्याग देने को विवश होना पड़ रह है जिसे आदर्श माना गया है।

कारण साफ है कि कोई भी इंसान आदर्श मानने की कसौटी पर खरा नहीं उतर पा रहा है। जिसे आदर्श मान लिया जाए, उसकी वास्तविकता का पिटारा खुल जाने के बाद पछतावा ही होता है। इस स्थिति में आदर्श मान लिए गए इंसानों के प्रति भरोसा भी उठ जाता है और आदर्श की कलई भी खुल जाती है।

बात इतनी सी है कि आखिर किसे आदर्श मानकर प्रेरणा पाएं। असल में पुरानी पीढ़ी के महापुरुषों और इतिहास से बढ़कर जिसे हम आदर्श मानने लगते हैं वहाँ ठेस ही पहुंचती है।

जिन लोगों को हम या जमाना महान मान बैठता है, जिनका यशोगान करता है, जिनकी परिक्रमाएं करते हुए लोेकप्रिय, महान और अधीश्वर तक की उपमाएं दे डालते हैं उन्हें आदर्श मानने वाले भी बाद में पछताते रहने को विवश हो जाते हैं।

असल में अब कोई सौ फीसदी सच्चा, ईमानदार और नैष्ठिक कर्मयोगी रहा ही नहीं, जिसे आदर्श माना जाए। जिसे भी आदर्श मान लिया जाता है वह बाद में फुस्स साबित होता है।

दुनिया भर में आदर्श या मॉडल मानने या बनाने का संकट हो गया है। अब तो यह इतना अधिक बढ़ गया है कि आदर्श पर ही लोगों का भरोसा उठता जा रहा है।

आखिर अपना आदर्श किसे बनाएं?  उन बाबाओं, कथाकारों, सत्संगियों और महात्माओं को, जो भगवान पाने के फेर में सारा संसार छोड़ बैठे हैं और लोगों को अपरिग्रह के साथ ही जीवन धन्य बनाने के लिए गुरु करने की बातें कहते हैं और कथा-सत्संग तथा धार्मिक आयोजनों के नाम पर लाखों-करोड़ों लेते हैं, आलीशान आश्रमों और लक्जरी गाड़ियों का इस्तेमाल करते हैं।

उन बाबाओं और महंतों को आदर्श बनाने की सोच सकते हैं क्या, जो कि अपराधियों, धन्ना सेठों, काले धन वाले उद्योगपतियों और शोषण, अन्याय व अत्याचार ढाने वाले राजनेताओं के पिछलग्गू बने रहकर उन्हें अपने आश्रमों और मठों में बुलाकर भगवान से भी ऊँची पदवी दे डालते हैं और इन्हीं के दिए पैसों पर मौज उड़ाते हैं। और इन्हीं लोगों के पॉवर के सहारे अपने आपको महान सिद्ध करने में जुटे रहते हैं।

उन लोगों को कैसे आदर्श बनाएं जो कि बड़े-बड़े पदों पर सुशोभित हैं लेकिन चाय-नाश्ते, आवास और मुफतिया भोजन के लिए लार टपकाते हैं, जनता के पैसों से सैर-सपाटे करते हैं, आलीशान मल्टी स्टार होटलों में रहते हैं और चाहते हैं कि हर क्षण मुफत के पैसों से गुलछर्रे उड़ाते रहें। जहाँ वे ठहरते हैं, भोग-विलासी वृत्तियों और लजीज खान-पान का आनंद पाते हैं, उनका बिल तक चुकाने में मौत आती है और ये चुकारा बेचारे दूसरे लोगों को करना पड़ता है।

उन लोगों को कैसे आदर्श मानें जो अपने घर में ही एक-दूसरे पर कीचड़ उछालते हैं और मंचीय-लंचीय अवसरों पर साथ-साथ दिख कर एक-दूसरे की तारीफ करते हुए लोगों को उल्लू बनाते हैं जैसे कि उनमें कोई मतभेद या मनभेद  हो ही नहीं, जबकि पूरा जग जानता है कि सामाजिक समरसता और देश को परम वैभव पर पहुंचाने वाले ये लोग एक-दूसरे से कितने कटे-कटे रहते हैं जैसे कि जानी दुश्मन ही हों।

उन लोगों को कैसे आदर्श माना जाए जो कि किसी रंग-बिरंगे बिजूके या पॉवर वाले मरणधर्मा इंसान के साथ रहते हुए इतने अहंकारी हो जाएं कि जहां जाएं वहाँ लोग उनसे खौफ खाएं, इनकी झिड़कियां और गालियां सुनें, नकारात्मक वाक्यों से हैरान हो जाएं और जिनसे मिलते ही लगे कि किस खूंखार और घृणित जानवर से पाला पड़ गया।

ऎसे लोगों को कैसे आदर्श माना जा सकता है जिनकी जिस्म ही इंसान की है, स्वभाव, व्यवहार और बाकी सब कुछ हिंसक जानवरों जैसा ही है।

उन लोगों को कैसे आदर्श मानें जिनके जिस्म से लेकर गगनचुम्बी मकान और फार्म हाउस तक भ्रष्टाचार और काले धन से बने हैं। उन्हें कैसे आदर्श मानें जो कि व्यभिचारी, नालायक, कमीन, नुगरे, खुराफाती, छीनाझपटी वाले, बात-बात में लड़ाई-झगड़े करने वाले, शोषक, अत्याचारी, धूर्त और मक्कार हैं।

उन लोगों को कैसे आदर्श माना जा सकता है जो पुरुषार्थ से वंचित होकर पराया खान-पान और पराया ही पराया सब कुछ हड़पने वाले हों, अतिक्रमणों की बुनियाद पर जमा हों, अधर्म, अन्याय और अत्याचार के हामी रहे हों, हर तरह से अमानवीय हों।

होता यही है कि लोग बाहर से ऎसे सजे-धजे, साफ-सुथरे रहते हैं कि जैसे इनके जैसा कोई आदर्श व्यक्तित्व हो ही नहीं सकता, लेकिन इनकी असलियत पास जाने या कुछ देर साथ रहने पर ही पता चलती है।

कारण यही है कि आदमी जब जमाने में आता है तब पूरी तरह बहुरूपिया बनकर आता है और संसार के सामने आडम्बरी स्वभाव में होता है, वह जैसा दिखता है वैसा होता नहीं बल्कि अच्छे और सच्चे तथा सर्वजनहितैषी होने का स्वाँग रचता रहता है।

आदमियों की जात के नखरों और बहुरूपिया चरित्र को देखा जाए तो साफ पता चलता है कि इनसे तो वे लोग सच्चे आदर्श थे जो कि पुराने युगों में नाम कर गए, शौर्य-पराक्रम से भरे इतिहासपुरुष के रूप में दुनिया को राह दिखा गए।

वर्तमान में सब कुछ लगता है कि खोखला होता जा रहा है, गिनती के चन्द लोगों को छोड़ दिया जाए तो सारे के सारे इंसानी आदर्श की कसौटी पर खरे उतरने लायक हैं ही नहीं। बातें और दिखावे ही आदर्श के करते हैं, असलियत कुछ और ही है।

इस दौर में किसे अपना आदर्श मानें, किसके आदर्शों पर चलने की बात कहें और किसे आदर्श मानकर अनुकरण करें, कुछ समझ में आने लायक नहीं है। आदर्श तलाशी के अभियान में किसी को कहीं कोई अनुकरणीय आदर्श नज़र आए, तो बताएं।