घर घुस्सू ये मोबाइल पिस्सू

जहाँ जड़ता वहाँ सब कुछ जाम। इसीलिए कहा गया है कि बहता पानी और रमता जोगी।

जहाँ हर प्रकार का प्रवाह निरन्तर बना रहता है वहाँ पवित्रता और ताजगी का ज्वार उमड़ता रहता है।

पंच तत्वों से जो भी बने हैं उन सभी के लिए यह शाश्वत संदेश है कि जड़त्व से मुक्त होकर जहाँ रहें वहाँ प्रवाहमान रहें और नित नूतन स्फूर्ति, ऊर्जाओं और अमृत तत्व का आभास करें।

जीवों के बारे में यह बात सौ फीसदी लागू होती है। जो जितना अधिक चलता है उतना अधिक पाता है और इसके लिए यह जरूरी है कि चलायमान रहें।

जो चलने-फिरने में विश्वास रखते हैं, अपने शरीर को हिलाते-डुलाते और परिश्रम में लगाए रखते हैं वे लोग अधिक स्वस्थ और मस्त रहते हैं।

इन लोगों को दैहिक, दैविक और भौतिक व्याधियों का सामना कम करना पड़ता है अथवा इनसे दूर रहते हैं।

आजकल इंसान के पास इतने अधिक बाहरी संसाधन, आरामतलबी के उपकरण आ गए हैं कि उसे चलने-फिरने-घूमने और काया को कष्ट देने में मौत आने लगी है।

वह चाहता है कि एक जगह धंसा रहे और दुनिया का सारा उपभोग उसके पास आकर आनंद देता रहे।

खान-पान से लेकर सभी प्रकार के कामों मेें वह प्रमादी, आलसी और नाकारा होने लगा है और यही कारण है कि अधिकांश लोग अब बीमार दिखते हैं।

कुछ ही लोग होंगे जो अपने बारे में यह कह सकते हैं कि उन्हें कोई रोग नहीं है अन्यथा दूसरे सारे लोग तरह-तरह की बीमारियों से ग्रस्त हैं।

और ये बीमारियां जिनमें शारीरिक नहीं हैं वे मानसिक तौर पर बीमार नज़र आते हैं और मनोरोगियों जैसा व्यवहार करते हैं।

हर स्थान के बारे में प्रामाणिक तौर पर यह कहा गया है कि किन स्थानों पर हमें रहना चाहिए और कहां नहीं।

लेकिन हम लोग स्थान के बारे में सिद्धान्तों और परंपराओं का पालन कभी नहीं करते बल्कि अपनी-अपनी राय काय कर लिया करते हैं और उसी के अनुरूप जीने को जिन्दगी समझ बैठे हैं।

हमारे जीवन की अधिकांश समस्याओं का मूल कारण यही है कि हम अपने बारे में वो सभी प्रकार की समझ भुला बैठे हैं जो हमारे लिए उपयोग  हैं और हमें आरोग्य का वरदान देने वाली हैं।

हमारी अपनी बुद्धि और विवेक हम खूंटी पर टांग देते हैं और विदेशियों तथा नासमझों के इशारों पर जिन्दगी की गाड़ी हाँकते चले जाते हैं।

इसका असर ये हो रहा है कि बीमारों की खेप बढ़ती जा रही है और लगता है कि जैसे यह जमाना बीमारों की खेती कर रहा है।

अधिकांश बीमारियां कुसंग और खराब या प्रदूषित स्थलों पर अधिकतर समय गुजारने से होती हैं।

जितना हम घर में रहा करते हैं, दफ्तरों, दुकानों और प्रतिष्ठानों या वाहनों में कैद रहा करते हैं उसका कम से कम दस फीसदी हिस्सा हमें खुली हवा में गुजारना चाहिए।

पर लोग ऎसा नहीं करते। और अब तो मोबाइल के रूप में हमारे पास ऎसी हथकड़ियां आ गई हैं जिन्होंने हमें नज़रबन्द ही कर डाला है।

हर आदमी मकड़ी या चूहों-चुहियाओं की तरह अपने लिए कोना तलाश लेता है और सारे लोग किसी शोक संतप्त इंसान की तरह मुँह लटकाये ऎसे व्यस्त रहते हैं जैसे कि दुनिया में हम किसी काम के करने लायक रहे ही नहीं हों, मनोरोगियों की तरह अपने हाल पर लाचार और लावारिस छोड़ दिए गए हों।

अपने आप ओढ़ी गई इस जड़ता की वजह से हमारा जीवन बर्बाद होने लगा है और हमारे शरीर को भी एक समय बाद यह अहसास हो जाता है कि यह शरीर चलने-फिरने के लिए नहीं बल्कि अनाज या भूसे से भरी बोरियों की तरह किसी कबाड़ में जमा कर रखने के लिए ही है।

यही कारण है कि हमारा शरीर अपने आप को बोझ लगने लगता है, काटने दौड़ने जैस लगता है और हम अपने ही पनपाये और प्रेम से संवारे हुए शरीर से घृणा करने लग जाते हैं, उसी से चिढ़ करने लगते हैं।

इन हालातों के लिए शरीर दोषी नहीं है बल्कि हमारा स्वेच्छाचार, अनुशासनहीनता और उन्मुक्त व्यवहार दोषी है जिसकी वजह से हम अपने आप को भी भुला रहे हैं और उन सभी को भी जो हमारे आस-पास हैं।

मोबाइल में एक बार घुस जाने वाला इंसान जिन्दगी भर भुलभुलैया में भटकता रहता है और इसका हश्र ये होता है कि खुद भी किसी काम का नहीं रहता और दूसरों को भी काम करने लायक नहीं रहने देता।

आजकल मोबाइल का नशा दुनिया के दूसरे सारे नशों से विचित्र और घातक होता जा रहा है। इसी तरह सब कुछ चलता रहा तो पेालियो मुक्ति के लिए दो बूंद जिन्दगी की तरह मोबाइल से मुक्ति दिलाने कई सारी बून्दें पिलानी पड़ेंंगी, तब जाकर भी आदमी में उतनी चेतना नहीं आ पाएगी जितनी अपेक्षित होगी।

कोनों और कमरों से बाहर निकलें और बाहरी दुनिया को जानने का प्रयास करें। ऎसा नहीं हो पाया तो हम लोगों को भुला देंगे और लोग हमें।

बाहर वालों को हमेशा यही अहसास होगा कि पास में गूंगे-बहरों का रैनबसेरा है और ये लोग ऎसे घर घुस्सू या मोबाइल पिस्सू हैं कि किसी के काम नहीं आने वाले।