दमदार हुए गुम, दुमदारों की धूम

वो जमाना चला गया जो दमदार लोगों के कारण जाना जाता था। इंसानों की वह फौलादी और स्वाभिमानी किस्म ही अलग थी जिसने एक से बढ़कर एक इतिहास रचा,  समाज व देश के लिए काम किया और अमर हो गए।

आजकल अमर हो जाने जैसी न बातें रही हैं, न ऎसे काम। और न ही ऎसे पराक्रमी लोग रहे हैं जिनमें कुछ कर गुजरने का माद्दा बचा हो। या तो कामचलाऊओं की भारी भीड़ बची है या फिर टाईमपासरों की रेवड़। कुछेक फीसदी ही होंगे जो अपने कर्मयोग के बूते पहचाने जाते होंगे अन्यथा दूसरे सारे औरों के पिछलग्गू और नकलची बने हुए हैं या फिर फैशनपरस्त।

आजकल तो एक प्रजाति के लोग पाँच-दस साल में भुला दिए जाते हैं और दूसरी प्रजाति के लोग साठ साल बाद। समय पूरा हो जाने के बाद लोग याद करना तक पसंद नहीं करते हैं, देखने और आदर देने की बातें तो कल्पना भर ही रह गई हैं।

अब सभी को पता चल ही गया है कि लोग हर किसी को तवे की रोटी समझ बैठे हैं। बदलते ही रहते हैं और इसके साथ ही प्रभावों का चक्रीकरण शाश्वत सत्य और परंपरा हो चला है।

कर्मयोगियों को भी इसका पूरा व पक्का भान है ही। इसीलिए आदमी के भीतर से काम करने और दिखाने तथा समाज और देश के लिए कुछ कर गुजर कर अमर हो जाने का ज़ज़्बा खत्म होने लगा है।

इस लिहाज से सभी क्षेत्रों में दमदार लोग या तो हाशिये पर आ गए हैं अथवा अस्तित्वहीनता को प्राप्त करते जा रहे हैं। बचा-खुचा दिखने में आ रहा पुराना घी भी अब स्वीकारने लग ही गया है कि अब वो दम कहाँ। अब दम सिर्फ दाने-दाने वाले विज्ञापनों में ही सिमटा हुआ लगता है, हकीकत में हम लोग दमहीन होते जा रहे हैं या दमा वाले। जब से दम-खम की बजाय समीकरण बिठाने और समझौते करने का चलन चल पड़ा है तभी से दम-खम की बातें स्वाहा होने लगी हैं।

लोग अब मूँछ की लड़ाई की बात नहीं करते बल्कि पूँछ के बूते ही तय होती हैं कितनी ही सारी श्रृंखलाएँ। अब जमाना दम की बजाय दुम का हो गया है। दम हो न हो, दुम लम्बी होनी चाहिए। जिसकी दुम जितनी लम्बी, रोमदार, घुंघराले बालों वाली और मखमली होगी, वही दुश्मनों की लंका जलाने में या दुश्मनों को जलाने में कामयाब होगा। 

अब दुम ही है जो आदमी के वजूद और शक्ति परीक्षण का पैमाना हो चली है। जिसकी दुम जितनी अधिक पुष्ट, दीर्घ और मोटी-तगड़ी-लम्बी होगी, उतना दुमदार इंसान प्रभावशाली वर्चस्व वाला होगा।

दुम का चमत्कार ही ऎसा है। जरूरी नहीं कि अपनी ही दुम लम्बी हो, दूसरों की लम्बी दुम से जुड़ जाने के बाद अपनी दुम की लम्बाई और वजूद अपने आप बढ़ जाता है। आजकल सब जगह यही हो रहा है। खुद की दुम भले ही गधे की दुम जैसी हो लेकिन दूसरों की दुम से दुम जुड़ जाने के बाद दुम का प्रभाव बहुगुणित हो जाता है।

यह ठीक उसी तरह से है जैसे कि छोटी चोटी वाली महिलाएं अलग से कृत्रिम बाल-चोटी साथ में जोड़कर चोटी की लम्बाई बढ़ा लिया करती हैं और दूसरी स्ति्रयों की तारीफ की पात्र बन जाती हैं। या कि सफाचट सर वाले विग पहनकर एकदम जवाँ मर्द दिखाई देने लगते हैं।

दुम के लिए यह जरूरी नहीं कि कोई खास रंग-रूप हो, मखमली या खुरदरी हो। दुम होनी चाहिए बस। दुम ही ऎसी है जो किसी भी दूसरे की दुम से संबंध बना लेती है और स्वार्थ पूरे करने के बाद ही अलग होती है। अन्यथा पारस्परिक स्वार्थ पूर्ति की पूर्णता होने तक सारी दुमें बिना किसी फेविकोल या गोंद के एक-दूसरे से चिपकी ही रहती हैं।

यहीं से उस विज्ञापन की शुरूआत होती है जिसमें नायिका किसी केश तेल या शैम्पू का विज्ञापन करती हुई काले, घने और लम्बे बालों का राज बताती हुई नहीं थकती।

पहले जमाने में लोग अपने वंश, परंपरा या कर्मयोग से जाने जाते थे। आज दूसरी सारी पहचानें खो चुकी हैं, सिर्फ दुम की पहचान ही सर्वमान्य, सर्वग्राह्य एवं कालजयी शाश्वत भावभूमि प्राप्त कर चुकी है। दुम अपने आप में लम्बी हो, किसी दूसरी दुम से चिपकी रहने वाली हो या फिर और किसी किस्म की। इससे कोई फरक नहीं पड़ता। दुम की सिर्फ पहचान भर होनी चाहिए।

हर प्रकार की दुम आदमी के वजूद से लेकर सम्मान तक का पैमाना हो गई है। कई बार तो कटी पड़ी छोटी सी दुम भी जानदार और शानदार होने या मानने-मनवाने का स्वाँग रचती है जैसे कि छिपकली की कटी पूँछ भी हलचल करने में माहिर होती है, भले ही कुछ ही क्षण के लिए क्यों न हो।

कोई सा आदमी हो, बड़ा हो या छोटा, या तो वह दुमदार है अथवा किसी की दुम कहा जाता है। आजकल तो हर आदमी पर छाप ही लग गई है अपने-अपने आकाओं की दुमों की।

अब किसी में इतना दम नहीं रहा कि अकेले अपनी ही दुम के बूते खुद ही कुछ कर गुजरने का माद्दा पैदा कर सके या दिखा सके। इसलिए कोई अपने आका की दुम को माँद मानकर उसमें घुसा हुआ अपनी दुम को तराश रहा है तो कोई आकाओं की दुम से अपनी दुम मिलाकर लम्बाई बढ़ाने में लगा हुआ है।

यही वजह है कि जमाने की नजाकत को भाँपते हुए दुमों के गठबंधन का युग आ पहुँचा है। सारी दुमें मिलकर ऎसी तगड़ी रस्सी का आकार लेने लगी हैं कि इनका कोई मुकाबला नहीं। दूसरी सारी रस्सियाँ और ताने-बाने इसके आगे विफल हैं।

दमदारी अब दुमदारी के रूप में अवतार ले चुकी है। यह दुमदारी किसी सेवा या परोपकार के मकसद से नहीं बल्कि अब दुमदारी दुकानदारी ही हो गई है जहाँ दुम के जरिये सेंध मारने का शगल इतना अधिक प्रचलन में आ गया है कि लोग दूसरे सारे काम-धाम छोड़कर दुम को ही ब्रह्मास्त्र मानकर दुनिया के महाभारत में विजयी होने के लिए आमादा हैं।

इसे लोकप्रियता कहें या खौफ, सब तरफ दुमदारी का प्रभाव बढ़ता ही जा रहा है। दुम से बड़ा कोई हथियार अब किसी को नज़र नहीं आता। ऑल इन वन की तर्ज पर यही दुम कभी मिसाईल बनकर टूट पड़ती है, कभी चुपके से किसी के अन्तःपुर में झाँक आती है और बाहर आकर सब कुछ सार्वजनीन कर देती है।

कभी ये दुम किसी की जेब पर डाका डाल आती है और कभी किसी का हाथ पकड़ कर जाने कैसे-कैसे कागजों पर दस्तखत करवा लेती है। कभी यही दुम खंजर बन जाती है और छूरा बनकर पीठ में घुस जाती है, कभी कुछ और कमाल ही दिखा जाती है।

दुम के मायाजाल ने संसार पर इतना कब्जा कर लिया है कि अब तो लोग चेहरों की बजाय दुम के सौन्दर्य और सौष्ठव के साथ अठखेलियों को निहारने और निखारने में लगे हैं। इन्हें पता है कि दुम क्या कुछ नहीं कर सकती। इसलिए हर कोई अब या तो किसी न किसी की दुम बनने को उतावला है या फिर अपनी दुम लंबी करने को।

कोई आश्चर्य नहीं कि कुछ सालों बाद ऎसी प्रजाति दिखनी शुरू हो जाए जो किसम-किसम और रंगों की दुम के साथ पैदा हो ताकि दुमों का मेल-बेमेल आसानी से जाना-पहचाना और उपयोग में लाने लायक हो सके।

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