स्मृति शेष – श्री स्नेहीराज श्रोत्रिय

स्नेह समन्दर – बहुआयामी हस्ताक्षर श्री स्नेहीराज श्रोत्रिय

श्री स्नेहीराज श्रोत्रिय राजसमन्द जिले और मेवाड़ के लिए वो जाना-पहचाना नाम है जिसे हर कोई जानता और तहेदिल से मानता है। बात चाहे समाजसेवा की हो, पत्रकारिता, कला-संस्कृति और साहित्य से जुड़े आयोजनों की हो या फिर चित्रकारिता और समाज-जीवन के किसी भी क्षेत्र की, पं. स्नेहराज श्रोत्रिय वह हस्ताक्षर थे जिनका दखल हर कहीं रहता ही था।

यों कहा जाए कि राजसमन्द अंचल की वह वो धड़कन थे जिनमें सम सामयिक लोक जीवन की तरंगों और लहरों का प्रतिबिम्ब देखा और शिद्दत से अनुभव किया जाता रहा। हर क्षेत्र में प्रभावी दखल के साथ ही समर्पण, निष्ठा और संकल्प पूर्ति के लिए किसी भी हद तक जाकर संघर्ष का माद्दा रखने वालों में वे हमेशा अग्रणी रहे।

उत्साह में युवाओंसे आगे

वार्धक्य की विवशताओं के बावजूद उनके भीतर युवाओं सा उत्साह और राजसमन्द के लिए कुछ कर गुजरने की भावनाओं का निरन्तर दिग्दर्शन कराता हुआ ज्वार अंतिम साँस तक अनुभव किया जाता रहा। वयोवृद्ध चिन्तक एवं बहुआयामी व्यक्तित्व के पर्याय श्री स्नेहीराज श्रोत्रिय का 9 मार्च 2019, शनिवार को निधन हो गया। उनका महाप्रयाण राजसमन्द के लिए अपूरणीय क्षति है। राजसमन्द की धरा ने एक रत्न खो दिया।

आंचलिक विकास के पुरोधा

राजसमन्द जिले और यहां की रचनात्मक गतिविधियों को पत्रकारिता और अन्य माध्यमों तथा कार्यक्रमों के माध्यम से प्रचारित-प्रसारित करने से लेकर राजसमन्द के विकास को मूर्त रूप देने में उनकी सुझावात्मक सक्रिय भागीदारी को भुलाया नहीं जा सकता।

 04 नवम्बर 2018 को ही शिक्षाविद एवं साहित्यकार श्री दिनेश श्रीमाली एवं अतिरिक्त जिला शिक्षा अधिकारी श्री पंककुमार सालवी के साथ श्री स्नेहीराज श्रोत्रिय जी के घर पहुंचकर उनके दर्शन और सान्निध्य का लाभ पाया था।

उस दिन राजसमन्द की ऎतिहासिक पृष्ठभूमि, विभिन्न आयोजनों, पत्रकारिता एवं जनसम्पर्क के इतिहास और विकास यात्रा, कला-संस्कृति, साहित्य, इतिहास से लेकर उनके वैयक्तिक सृजन, पत्रकारिता जगत की तत्युगीन स्थितियों व उपलब्धियों, पुरस्कारों, सम्मानों आदि पर खूब आत्मीय चर्चा हुई।

उन्होंने बेबाक रूप से अपनी बात खुलकर बयाँ की और पुराने जमाने की खासियतों, खास लोगों, परंपराओं और इनके विकास में भागीदारी, विभिन्न क्षेत्रों के कलाकारों, विद्वानों, इतिहास पुरुषों आदि के बारे में करीब तीन घण्टे तक चर्चा की। इसके साथ ही श्री श्रोत्रिय ने अपनी कृतियों और विशिष्टजनों के साथ फोटोग्राफ्स आदि को दिखाया और इनसे संबंधित संदर्भों पर भी जानकारी दी।

अपने हाथों बनाई मंगलमूर्ति की छवि

श्री श्रोत्रिय ने इस दौरान अपने निवास में प्रवेश द्वार के सम्मुख निर्मित मंगलमूर्ति भगवान गणेश जी के चित्र की ओर इशारा करते हुए कहा कि यह उन्होंने अपने हाथों बनाई है। चार-पांच दशकों बाद भी इसका स्वरूप और रंग सब कुछ नया-नया और आकर्षक है, कहीं से कुछ भी चमक उतरी नहीं है। उन्होंने बताया था कि यह चित्र उन्होंने अपने बेटे की शादी के समय बनाया।

एक अच्छे चित्रकार के रूप में भी उन्होंने रंगों और कूँची का जो कमाल दिखाया, वह अपने आप में दिव्य मेधा-प्रज्ञा और बहुमुखी प्रतिभा को अभिव्यक्त करता है।

गद्गद् हो अभिभूत हो उठे

आसन्न चुनाव के मद्देनज़र प्रकाशित मतदाता जागरुकता से संबंधित पोस्टर भेंट करने के साथ ही उन्हें प्रभु श्री चारभुजानाथ की छवि भेंट की, उपरणा एवं पगड़ी पहनाकर अभिनंदन भी किया। इस सम्मान से गद्गद् हुए श्री श्रोत्रिय ने आभार जताते हुए चिरंजीवी और यशस्वी होने का आशीर्वाद दिया।  अपने अभिनंदन से अभिभूत श्री श्रोत्रिय इतने अधिक भावविभोर हो उठे कि उन्होंने हम तीनों को पगड़ी पहनायी और बार-बार आने के लिए कहा।

अधूरी रह गई इच्छा

श्री स्नेहराज श्रोत्रिय ने इस मुलाकात में एक बार सूचना केन्द्र में आने की इच्छा व्यक्त की थी लेकिन वह अधूरी ही रह गई। उन्होंने राजसमन्द में सूचना एवं जनसम्पर्क कार्यालय की स्थापना और संरचनात्मक विकास के लिए किए गए संघर्ष भरे प्रयासों का भी जिक्र किया और इस दृष्टि से जनसम्पर्क क्षेत्र के पुरोधाओं और अब तक पदस्थापित रहे और परिचित अधिकारियों का भी नाम लेकर जिक्र किया।

एक युग का अवसान

श्री स्नेहीराज श्रोत्रिय का महाप्रयाण किसी एक युग के अवसान की तरह ही है जो अपने साथ एक ऎसे हस्ताक्षर को हमसे छीन ले गया जो हर फन में माहिर था, रचनात्मक कर्मयोग के आसमान का दैदीप्यमान नक्षत्र था, ज्ञान और अनुभवों के साथ जीवन के हर व्यवहारिक पक्ष का जीवन्त मार्गद्रष्टा था। सच में उनका देहावसान राजसमन्द की धरा के लिए वह क्षति है जिसकी पूर्ति कभी नहीं हो सकेगी।

दिवंगत आत्मा के प्रति विनम्र भाव से हार्दिक श्रद्धान्जलि….।

1 thought on “स्मृति शेष – श्री स्नेहीराज श्रोत्रिय

  1. श्रद्धेय स्नेही राज जी श्रोत्रिय का चले जाना, मानो एक युग का पटाक्षेप हो जाना। राजसमंद में पत्रकारिता के तो वे पितामह थे ही, सामाजिक सांस्कृतिक सरोकारों के भी वे पुरोधा थे। मेरे पिताश्री आदरास्पद मोहनभाई के साथ उनकी घनिष्ठ आत्मीयता थी। जिंदादिली, अक्खड़पन और फक्कड़पन, जुझारूपन, सिद्घांतप्रियता… ये खासियतें (आज के बुद्धिवादी युग में इन्हें कमियां भी कहा जाता है) उन दोनों ही शख्सों के स्वभाव में रची बसी थीं। मैं ऐसे अनेक अवसरों का साक्षी बना जब दोनों घण्टों बतियाते थे और दुनियादारी को ठेंगा दिखाते, ठहाके लगाते अपनी ही दुनिया के रंग में रंग जाया करते थे। श्रोत्रिय साहब के अन्तिम दिनों में उनके पास बैठ कर उनके वरद हस्त को अपने सिर पर महसूस करने के सौभाग्य से मैं वंचित ही रह गया, यह क्षोभ हमेशा सालता रहेगा। उस पुण्यात्मा को नमन!

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