स्मृति शेष – स्वतंत्रता सेनानी मास्टर सूरजमल

भारतीय स्वाधीनता संग्राम में बांसवाड़ा के सेनानियों का योगदान भी कोई कम नहीं रहा जिन्होंने अंग्रेजों से लोहा लिया, संघर्ष का ज्वार उमड़ाया और देश को आजादी दिलाने वाले स्वतंत्रता सेनानियों का हर तरह से साथ देते हुए भारत को आजादी दिलाई।

Master Soorajmal

जीवनी

भारतीय स्वाधीनता संग्राम में आहुति देने वाले बांसवाड़ा के सेनानियों की एक लम्बी श्रृंखला विद्यमान रही है जिन्होंने लोक जागरण के साथ ही स्वतंत्रता आन्दोलन को सफल बनाने में अपना समर्पित योगदान दिया। इस श्रृंखला में मास्टर सूरजमल का नाम उल्लेखनीय है जिन्होंने स्वतंत्रता आन्दोलन में अपनी सहभागिता निभाई।

स्वतंत्रता सेनानियों की गरिमापूर्ण श्रृंखला में एक महत्त्वपूर्ण शख्सियत थे जनजातीय अंचल बांसवाड़ा के मास्टर सूरजमल। बांसवाड़ा में बहुत ही सामान्य परिवार में चैत्र शुक्ल पूर्णिमा हनुमान जयंती, तद्नुसार 13 अप्रेल 1917 को जन्मे मास्टर  सूरजमल में राष्ट्रीय चेतना का विस्तार पिता शंकरलाल एवं उनके मित्रों की आपसी चर्चा सुन-सुन कर होता गया। शिक्षा सुविधा के अभाव में केवल मिडिल तक शिक्षा प्राप्त करने के बावजूद वैचारिक क्रांति की लहरे अल्प आयु में ही उन्हें आँदोलित करने लगी। जलियाँवाला बाग काण्ड और भगत सिंह, राजगुरु तथा चंद्रशेखर आजाद को फांसी दिये जाने की खबर ने आग में घी का काम किया।

सारा देश गुलामी की बेड़ियाें की चुभन से आकुल उन्हें तोड़ डालने के लिये व्यग्र हो रहा था। सड़कों पर गाए जाने वाले ओजस्वी गीत माटी की मूरतों में फौलाद भर रहे थे। क्षितिज से निरन्तर एक आमंत्रण अनहद नाद सा गूँज रहा था।

उन दिनों गांधीवादी रचनात्मक नेता चिमनलाल मालोत की सिलाई की दुकान थी, मास्टर सूरजमल भी उनके पास काम सीखने लगे। उस वक्त राजा लोग वेट-वेगार लोगों  से करवाते थे, एक बार दर्जियों ने राजा से शिकायत की कि हम से आप बेगार करवाते हैं तो अन्य जो लोग सिलाई का धंधा करते हैं, उन्हें कयों नहीं बुलाया जाता? यह सब  सुन-देख चिमनलाल मालोत ने बाँसवाड़ा छोड़ दिया व इन्दौर (मध्यप्रदेश) चले गये। उनके संस्कार  सूरजमल पर पड़े व सिलाई के ही सिलसिले में सन् 1936 में अहमदाबाद (गुजरात) गये, उस वक्त वहाँ दारू बंदी आन्दोलन के सूत्रधारों धुलजी भाई भावसार व विजया बहन के संपर्क में आये। वे दोनों गॉँधीजी के आँदोलन में सक्रियता से जुडे़ हुये थे। वहॉँ सूरजमल मास्टर ने विट्ठलभाई पटेल के नेतृत्व में दारू बन्दी आन्दोलन के जुलूस में हिस्सा लिया।

 वहाँ से बांसवाड़ा आकर कुछ माह मॉँ की सेवा के पश्चात  सन् 1939 में उदयपुर चले गये तथा गेहरीलाल जी बोर्दिया के पास सिलाई का काम सिखने लगे। गेरीलाल जी इंग्लैण्ड से उन्हीं दिनों सिलाई में डिप्लोमा करके आये थे, उनसे डिप्लोमा किया। उदयपुर में ही वे माणिक्यलाल वर्मा से मिले तथा सेवाश्रम की गतिविधियों को निकटता से देखा।

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बॉंसवाड़ा आकर उन्होंने सिलाई की दुकान खोल ली। उस समय कई लोग उनसे सिलाई सिखने आते थे। वहीं से उन्हें मास्टर के नाम से जाना जाने लगा। सन् 1942 में गाँधी जी ने ‘‘अंग्रेजों भारत छोड़ो’’ का नारा दिया तब मास्टर सूरजमल के मन में राष्ट्रीयता का ज्वार उद्वेलित होने लगा। इसी दौर में फिर राजशाही ने बेगार लेना शुरू किया। तब उन्होंने दुकान बंद कर सेटलमेंट दफ्तर में नौकरी कर ली और लोगों से संपर्क कर आजादी की लड़ाई में आगे आने के लिये लोक चेतना जगाते रहे। भूमिगत रहकर व चोरी छिपे अवकाश के दिनों तथा नौकरी के समय के बाद आजादी के लिये काम करते रहे व प्रजामंडल की गतिविधियों से जुडे़। उस समय तक कई स्वतंत्रता सेनानी बाँसवाड़ा आ चुके थे।

इस समय तक आजादी के इस आँदोलन ने तीव्र रूप से पा लिया था। लोगों को सताया जाने लगा, दमन हुआ। लोगों को अनाज का मोहताज बना दिया गया, तब अनाज आँदोलन चलाया गया। समानान्तर सरकार बनाकर भूपेन्द्रनाथ त्रिवेदी को प्रधानमंत्री घोषित कर दिया गया। उस रात बैठक बिखर जाने के पश्चात् 5 मार्च 1946 आधी रात को कुछ नेताओं को पकड़ कर जेल मे डाल दिया गया। अगले दिन सवेरे पूनमचंद सुनार, मास्टर सूरजमल आदि ध्वज लेकर आजाद चौक पहुँचे व वन्दे मातरम, इंकलाब जिन्दाबाद के नारे गुँजा दिये। पुलिस जब  छीना झपटी करने लगी तब झण्डा मास्टर सूरजमल ने थाम लिया। इस पर पुलिस उन पर टूट पड़ी तथा लाठियों की मार से बेहोश होकर गिर गये। होश आया तो उन्होंने अपने आपको जेेल की सीखचों में पड़ा पाया। कई लोग जेल में ठूँसे गये। बाद में जाकर सरकार से समझौता हुआ व लोगों के लिये अनाज का इंतजाम हुआ।  नगर की समिति बनाई जाकर अनाज वितरण किया गया व बाअदब रिहा कर दिया गया।

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एक सरकारी मुलाजिम होने के कारण सेटलमेंट के अधिकारियों ने उन्हें माफी माँगने के लिये कहा। उन्होंने स्वाभिमानी सेनानी की तरह माफी नहीं माँगी ओर सरकारी नौकरी ठुकरा कर देश सेवा में जीवन खपा देने का प्रण ले लिया इसके बाद लम्बे समय तक उन्हें विपन्नता का सामना करना पड़ा। अब स्वाधीनता के लिए संघर्ष ही उनका मुख्य ध्येय रहा। सन 1947 में बांसवाड़ा गौशाला में हुए अधिवेशन में स्वागत समिति के सदस्य के बतौर उनकी सक्रिय सेवाएं रहीं।

अनेक कार्यक्रमों में क्षेत्रीय स्वाधीनता सेनानियों के अलावा श्रीमती रामेश्वरी, नेहरू, ठक्कर बापा, जयप्रकाश नारायण, गोकुलभाई भट्ट, सिद्धराज  ढड्डा, मामा बालेश्वर दयाल आदि के संपर्क में आने से उनकी भावनाएँ दृढ़तर होती गई व काफी प्रेरणा पायी। आपातकाल के वकत जे पी आन्दोलन का उन्हें जिलाध्यक्ष बनाया गया।

सामाजिक एवं राजनैतिक क्षेत्रों में मास्टर सूरजमल ने सक्रियता से भाग लिया। आजादी की लड़ाई  के वक्त कई आँदोलनों, अधिवेशनों, कार्यक्रमों और लोक चेतना क्षेत्रों में आपकी भूमिका महत्वपूर्ण रही।

अपनी मृत्यु से एक वर्ष पूर्व तक भी सामाजिक क्षेत्र में अग्रणी कार्यकर्ता की तरह काम करते रहे। स्वतंत्रता सेनानियों की परंपरा में मास्टर सूरजमल ने दशकों तक लोक सेवा, जागरण और स्वाधीनता गतिविधियों में भागीदारी निभाई और अन्ततः काफी दिनों से बीमार 94 वर्ष की आयु में 11 जनवरी 2010 को आधी रात बाद एक बजे पांचभौतिक शरीर त्याग दिया।

मास्टर सूरजमल समाज, देश और परिवेश की सम सामयिक स्थितियों पर बेबाक टिप्पणी के लिए मशहूर थे। उन्हें जो अच्छा नहीं लगता था उसे सीधे तरीके से कहने का साहस ऎसे बिरले लोगों में ही हुआ करता था।

देश की मौजूदा स्थिति से वे बेहद व्यथित होते हुए वे कहते थे कि अभी भी उनके मन में देश के लिये कुछ कर गुजरने की तमन्ना हैं मगर परिस्थिति व उम्र के इस पड़ाव ने मजबूर कर रखा है। उनकी सबसे बड़ी चिन्ता यह थी  कि देश को जिन आशाओं के साथ आजाद कराया था उन पर तुषारापात हो रहा है। वे कहते थे कि शुद्ध बुद्धि और समर्पण के साथ देश को उन्नति के शिखर पर ले जाये जाने की जरूरत है।

नौजवान पीढ़ी के नाम संदेश में मास्टर सूरजमल हर मंच पर यह आह्वान करते नहीं थके कि सत्य और अहिंसा की धरा को हिंसा की आग में न धकेलें व भारत भू की पवित्रता को बरकरार रखते हुये सारी दुनियॉँ को रोशनी दें।

लाठी के सहारे रचनात्मक कार्यक्रमों में भागीदारी और वयोवृद्ध होने के बावजूद प्रबल आत्मविश्वास के धनी रहे मास्टर सूरजमल युगों तक पीढ़ियों को प्रेरणा देते रहेंगे।

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स्वाधीनता आन्दोलन में अग्रणी रहे श्री चाँदकरण शाह ने मास्टर सूरजमल को अपनी श्रद्धान्जलि इन शब्दों में व्यक्त की – स्वतन्त्रता सेनानी मास्टर सूरजमल गुप्ता के निधन का समाचार सुनकर अत्यन्त दुःख हुआ। मास्टर सूरजमल 1946 में सामन्तशाही जुल्मों के शिकार हुए थे। तब बांसवाड़ा स्वतन्त्रता आन्दोलन के अग्रणी चिमनलाल मालोत सहित 17 लोगों को गिरफ्तार कर यातनाएं दी थी। इन 17 लोगों में मास्टर सूरजमल भी थे।

मुझे वो घटना बार-बार याद आती है। जब 25 फरवरी 1946 को अनाज समस्या पर आन्दोलन की रूपरेखा तैयार हो रही थी तब अंग्रेज सरकार की ओर से शहर के प्रतिष्ठित नागरिकों और प्रजामंडल के प्रतिनिधियों के सामने वादा किया गया था कि आज से अनाज की निकासी बंद हो जाएगी। परन्तु वादे से मुकरी अंग्रेज सरकार के खिलाफ 27 फरवरी 1946 को हड़ताल, रैली की पाबंदी के बावजूद प्रजामंडल ने अनाज आन्दोलन जारी रखने का निर्णय करते हुए रैली निकाली। तब बांसवाड़ा में सुरक्षा कानून भंग करने के अपराध में धारा 56 के अंतर्गत 17 लोगों को गिरफ्तार किया, जिसमें मास्टर सूरजमल सहित अन्य क्रांतिकारी थे।