स्मृति शेष – फक्कड़ी बादशाह दिनेश दादा – हरफनमौला युगीन किरदार का अवसान

अचानक खबर आयी कि दिनेश दादा नहीं रहे। लगा कि जैसे परंपरागत पुरातन ज्ञान और अनुभवों से भरा कोई आत्मआनन्दी सितारा आसमान से टूट कर बिखर गया। अभी कुछ दिन पहले ही हमारी लम्बी बातें हुई थीं। तब तनिक भी यह आभास नहीं था कि उनका इतनी जल्दी धरती से नाता छूट जाएगा। पर होता वही है जो नियति को मंजूर होता है। 

जिन्दगी के हर मोड पर जिन्दादिल और बिन्दास इंसान के रूप में दिनेश दादा का जो रुतबाई किरदार था, वह अपने आप में विलक्षण ही था। यही वजह थी कि इंसानों की भीड़ में वे एक अलग चेहरा थे। साफ-सुथरी और सादगीपूर्ण जिन्दगी, निर्मल मन और बेबाक अभिव्यक्ति के मामले में उनके जैसा व्यक्तित्व हजारों-लाखों में एक होता है।

स्वाभिमानी जीवन जीने वाले पं. दिनेश भट्ट अपनी ही मस्ती में जीने वाले फकीरी मिजाज के ऎसे इंसान थे जो सरलमना होने के साथ ही घर-परिवार और समाज-जीवन के हर क्षेत्र में सभी प्रकार की रचनात्मक गतिविधियों में सहभागिता निभाने में कभी पीछे नहीं रहते। यही कारण था कि वे समाज-जीवन और अपने क्षेत्र में लोकप्रिय और हर दिल अजीज के रूप में प्रतिष्ठित थे।

नेक दिल इन्सान

दक्षताओं और हुनर के बावजूद कठोर जिन्दगी के ढेरों पड़ावों से होकर जो कोई तप कर निकलता है उसी के साथ ज्ञान, अनुभवों और व्यवहारिक जीवन के सारभूत तत्वों का मिश्रण व्यक्तित्व में ऎसा निखार ला देता है कि फिर इंसान को न किसी से भय होता है, न अपेक्षा या उपेक्षा का भाव। हर मामले में बिन्दासगी, मुखर अभिव्यक्ति और फक्कड़ी जिन्दगी का ऎसा मस्त जीवन अपने आप चलता रहता है कि आत्ममुग्धता का यह दौर जिन्दगी भर सुकून देता रहता है।

जीवन के इन्हीं उतार-चढ़ावों से होकर बिन्दास व्यक्तित्व के रूप में अलग ही पहचान बनाने वाले शख्स रहे हैं -श्री दिनेश भट्ट।  वे आज हमारे बीच नहीं हैं किन्तु उनका ज्ञान और अनुभवों का खजाना किसी न किसी रूप में हमारे साथ हमेशा प्रेरणा के स्वरों को तीव्रतर करता रहेगा।

ब्रह्मत्व के संस्कारों का परिपालन

आज जहाँ ब्राह्मण कहलाने वाले, कर्मकाण्ड को धंधा बनाने वाले, आचार्यत्व की ठेकेदारी करने वाले और जय परशुराम के नारे गुंजाने वाले विप्रवर तक तिलक और शिखा को त्याग चुके हैं, ब्रह्मत्व के संस्कारों से च्युत होते जा रहे हैं ऎसे में दिनेश दादा  ने कभी ब्राह्मणोचित व्यवहार एवं संस्कारों का परित्याग नहीं किया। उन्हें किसी ने भी बिना तिलक के नहीं देखा।

कई रहस्यों का उद्घाटन

कुटुम्बी होने के नाते घनिष्ठ पारिवारिक संबंध होने से उनका स्नेह मुझ पर हमेशा बना रहा। घण्टों तक मुलाकातों के कई दौर उनके साथ बीते। परिवेशीय इतिहास और परिवर्तनों, पुरखों की विरासत, परंपराओं, विभूतियों, तंत्र-मंत्र, समाज, जीवन और जगत के कई छूए-अनछुए पहलुओं पर उनसे खुली चर्चा हुई। कई रहस्योद्घाटन उन्होंने किए, वानस्पतिक तत्वों से चाँदी और सोना बनाने की विधि भी उन्होंने साफ-साफ बताई और उन जंगलों-ठिकानों का पता भी बताया जहां कि दिव्य वनस्पतियों के भण्डार हैं।  इसके साथ ही उन्होंने अपने जीवन में किए गए विभिन्न प्रयोगों के बारे में भी खुलकर चर्चा की।

अक्खड़ व्यक्तित्व की छाप

यह माना जाता है कि जो इंसान भीतर से पाक-साफ होता है, वह अक्खड़ होता है और वह जो कुछ कहता है वह साफ-साफ होता है चाहे किसी को चुभ जाए या गंभीर चिन्तन के लिए विवश कर दे। दिनेश दादा भी इसी किस्म के अद्भुत इंसान थे। जो कुछ कहना है, साफ-सुथरा, बिना किसी भय या लाग-लपेट के। कई बार तीखी और तेज आवाज में ऎसा भी कुछ कहने से परहेज नहीं था कि जिससे सामने वाला भड़क जाए।

बांसवाड़ा के औदीच्यवाड़ा में वैद्य मधुकान्त भट्ट के घर माता यशोदा देवी की कोख से 17 मार्च 1942 को जन्म लेने वाले श्री दिनेश भट्ट ने पिता के नक्शेकदम पर चलते हुए आयुर्वेद जगत की सेवाओं को चुना। राष्ट्रभाषा कोविद तक शिक्षा पाने के बाद उन्होंने मुम्बई की होटलों और अहमदाबाद की मिलों में भी काम किया। पर वहां उनका मन नहीं लगा।

कठोर संघर्ष का सामना

मुम्बई की होटलों में काम करने के साथ ही अहमदाबाद की मिलों में भी उन्होंने मजदूरी की लेकिन कुछ समझदार लोगों ने राय दी कि बांसवाड़ा पहुंच कर  पढ़ाई करो और नौकरी के लिए कोशिश करो।  डूंगरपुर में कामरेड स्व. कान्तिशंकर शुक्ला के साथ तत्कालीन आयुर्वेद मंत्री श्री भीखा भाई से मिले। जहाँ भीखा भाई ने उन्हें आयुर्वेद विभाग में परिचारक के पद पर नौकरी पर लगवा दिया। उनकी प्रथम नियुक्ति 4 नवम्बर 1962 में राजकीय आयुर्वेदिक औषधालय कलिंजरा परिचारक के पद पर हुई। खेड़ा, बाँंसवाड़ा, सेनावासा, तलवाड़ा, सुरपुर आदि स्थानों पर वर्षों तक सेवाएं दीं।

आडम्बरहीन सरलसादगीपूर्ण जीवन के धनी

आयुर्वेद, धर्म-कर्म और संस्कृति के बारे में उनका ज्ञान अपरिमित और व्यवहारिक था और यही कारण था कि वे हर मामले में इतने स्पष्टवादी थे कि उन्होंने न किसी के नाराज होने की कभी परवाह की, न किसी को खुश करने के लिए कोई जतन किया। 

जो कुछ सामने दिखा, अनुभव किया, उसे बिना किसी लाग-लपेट के हूबहू परोस देने का उनमें जो माद्दा था वह बहुत कम लोगों में देखने को मिलता है। वरना आजकल लोग अपनी छवि को सकारात्मक दर्शाने और दूसरों की निगाह में खुद को सर्वश्रेष्ठ मानने-मनवाने  के लिए व औरों की नज़र में ऊँचा दिखने के लिए जिसा सीमा तक नीचे गिर जाते हैं, उस बारे में ज्यादा कुछ कहने की जरूरत नहीं है।

जिन्दगी भर रहा मलाल अन्याय का

आयुर्वेद के क्षेत्र में लम्बी सेवाओं के दौर में  आयुर्वेद विभाग के कई जिलाधिकारियों ने उन्हें इतना अधिक प्रताड़ित किया कि उनके मन में आयुर्वेद के उच्च पदस्थों के बारे में नकारात्मक धारणा बनी जो अन्त तक कायम रही।

आयुर्वेद अधिकारियों के भ्रष्टाचार की बातें बताते हुए कई नाम गिनाते हुए उनका गला रुंध जाया करता था जिन्होंने उनके साथ अन्याय ढाया। ट्रिब्यूनल में भी उन्होंने केस दायर किए। अपनी व्यथा कथा सुनाते हुए कुछ दिन पूर्व ही उन्होंने सब कुछ बयां किया और बताया कि उनके पास पत्रावलियों के करीब दस किलो के दस्तावेज जमा हैं जो अन्याय के गवाह हैं।  रिटायरमेंट से दो साल पूर्व स्थानान्तरण आमेट में हो जाने पर 2001 में उन्होंने तंग आकर स्वैच्छिक सेवानिवृत्ति ले ली। इसके बाद से वे वर्षों तक कर्मकाण्ड और समाजसेवा के कामों में लगे हुए रहे।

ग्राम पंचायतों, चिकित्साधिकारियों और जिला प्रशासन सहित विभिन्न संस्थाओं, संगठनों ने उनके आयुर्वेद ज्ञान और व्यवहारिक सेवाओं को देखते हुए प्रशंसा पत्र प्रदान किए। उनके पास ऎसे ढेरों प्रमाण पत्र और प्रशस्ति पत्रों का अम्बार रहा।

आयुर्वेद के जानकार

अपने स्तर पर ही आयुर्वेद के पुराने नुस्खों के जानकार जड़ी-बूटियों के मामले में सिद्ध वैद्य की तरह विशेषज्ञ थे।  आयुर्वेद जगत की दीर्घकालीन सेवाओं के अनुभवों का सार बताते हुए वे कहते थे कि अरावली के जंगलों में तमाम प्रकार की जड़ी-बूटियां विद्यमान  हैं।

श्री भट्ट का जीवन कुशल वैद्यकीय अनुभवों से भरा रहा। वे हर साल अपने स्तर पर ही च्यवनप्राश, सुपारी पाक, कौंच पाक, ब्रह्मरसायन आदि पूरे विधि-विधान से बनाते। शुद्धता और औषधीय महत्व के कारण इन घरेलू उत्पादों को उनके कद्रदान हमेशा पसंद करते रहे। इन उत्पादों की मांग भी रहती।

कई जंगलों की खाक छानी

आयुर्वेदिक उपचार और औषधियों के बारे में उनका स्वाध्याय निरन्तर बना रहा। उनके आवास पर आयुर्वेद और वनस्पतियों के बारे में इतनी अधिक प्राचीन पुस्तकों और ग्रंथों का विशाल भण्डार है। इन सभी का उन्होंने कई-कई बार अध्ययन का क्रम पूरा कर लिया। अरावली के कई जंगलों की उन्होंने खाक छानी और जड़ी-बूटियों की जानकारी पायी।

एकान्तिक साधनाओं में बिताए क्षण

कई सिद्ध महात्माओं के साथ रहकर उन्होंने वनों-पर्वतों और नदियों के किनारे काफी समय एकान्तिक साधना में बिताया और आध्यात्मिक सिद्धियां पायी। वानस्पति औषधियों के जानकारों तथा जंगलों में रहने वाले गुणियों के साथ रहकर उन्होंने परंपरागत औषधीय ज्ञान को परिपुष्ट किया और व्यवहार में अपनाया।

आजकल के वैद्योें से कहीं अधिक जानकार थे

पं. दिनेश भट्ट आयुर्वेद उपचार, औषधियों और आयुर्वेद चिकित्सा के मामले में इतने अधिक दक्ष थे कि उनका पद भले ही परिचारक का रहा, पर आयुर्वेदिक जगत के हुनर और व्यावहारिक प्रयोगों के बारे आजकल के किसी वैद्य से भी कहीं अधिक चिकित्सकीय ज्ञान, व्यवहार और औषधियों तथा हर्बल जगत की जानकारी रखते थे। उनका ज्ञान पोथी वाला नहीं होकर पारिवारिक आयुर्वेदिक परंपराओं से अर्जित किया हुआ तथा स्वयं के द्वारा प्रयोगों में लाया हुआ अथवा किसी न किसी विशेषज्ञ चिकित्सक से सीखा हुआ था।

निष्काम सेवा सराहनीय

अपने स्तर पर आयुर्वेदिक उपचार करते हुए उन्होंने सैकड़ों मरीजों को परंपरागत आयुर्वेदिक नुस्खों से लाभान्वित किया। निष्काम सेवा के पर्याय रहे श्री दिनेश भट्ट द्वारा की गई आयुर्वेद जगत की सेवाएं अपने आप में लोक सेवा का वचह यादगार इतिहास है जो आयुर्वेदकर्मियों के लिए प्रेरणा का संवहन करता रहेगा।

पहले नौकरी के वक्त जमानत ली जाती थी। श्री भट्ट ने बताया था कि उनके लिए बागीदौरा के प्रधान एवं जाने-माने राजनेता श्री मोहनलाल आचार्य ने छह हजार रुपए की जमानत दी थी। आयुर्वेद कार्मिकों के संगठन में भी श्री दिनेश भट्ट की भूमिका महत्वपूर्ण रही है। आयुर्वेद धात्री परिचारक संघ के प्रान्तीय अध्यक्ष के रूप में उनके कार्यकाल को लोग आज भी याद करते हैं।

बहुमुखी रचनात्मक कार्यकर्ता

उन्हें हमेशा सामान्य इंसान की दृष्टि से ही देखा जाता रहा। किसी ने यह जानने और झांकने की कोशिश नहीं कि दिनेश दादा के भीतर कितना अधिक ज्ञान, अनुभवों और व्यवहारिक प्रयोेगों का अखूट खजाना छिपा पड़ा है।

कानून कायदों से लेकर सभी प्रकार की जरूरी शिक्षा-दीक्षा के प्रति उनका रुझान विद्यार्थी काल से ही रहा और नौकरी में रहते हुए भी अनेक पाठ्यक्रमों व परीक्षाओं में सफलता हासिल की है।  बार कौंसिल आफ राजस्थान से भी उन्हें कोर्ट-कचहरी से संबंधित काम करने के लिए पात्र माना गया। ज्यूरिस प्रमाण पत्र भी उन्होंने प्राप्त किया। उनकी रुचि कबड्डी, खो खो, क्रिकेट, फुटबाल, वालीबाल आदि में रही तथा विभिन्न प्रतियोगिताओं में हिस्सा लिया। संगीत, कविता, भजन आदि के सृजन और गायन में भी सिद्धहस्त थे।

कठोर अनुशासन के हामी

वैदिक संस्कृति और पुरातन परंपराओं का अनुगमन करने वाले श्री दिनेश भट्ट अच्छे वैद्यकीय कौशल के साथ ही कर्मकाण्ड और प्राचीन विधाओं में भी प्रवीण रहे। धार्मिक और पौराणिक अनुष्ठानों में अनुशासन के वे हामी थे। उनका मानना था कि धर्म-कर्म और अनुष्ठानों में कोई समझौतावाद या  शिथिलता नहीं होनी चाहिए तभी पूरा पुण्य व प्रभाव सामने आ पाता है।

आज के मनमुखी और लोभी-लालची कर्मकाण्डियों के स्वेच्छाचार और धर्म की मनचाही व्याख्या और कर्म के वे सदैव खिलाफ रहे और जहां अवसर मिला, उन्होंने इसके खिलाफ आवाज बुलन्द की।

रागरंगों के रसिया, मौलिक जिन्दगी अपनायी

अपनी सम्पूर्ण मौलिकता में जीने का काम दुनिया में कुछ ही लोग कर सकते हैं। दिनेश दादा की बादशाहत का भी यही राज था। उन्होंने अपने आपको जी भर कर जिया। खुद भी आनंद के समन्दर में गोते लगाते रहे और अपने सम्पर्क में आने वाले सभी लोगों को भी आनंद के अतिरेक से प्रसन्नता प्रदान की।

जीवन में बसन्त को तलाश कर वासन्ती माहौल का सृजन कर आत्म आनन्द में मुग्ध होना उनके स्वभाव की वह विलक्षणता थी जिसे प्राप्त कर पाना हर किसी के लिए सहज और स्वीकार्य नहीं होता।  हर आयु वर्ग के लोगों के साथ समदर्शी और समत्व भरा सरल व्यवहार ही था कि उनका पूरा जीवन सर्वस्पर्शी और आनंदप्रवाह का पर्याय रहा। बच्चों के साथ बच्चे की तरह और बुजुर्गों के साथ बड़ों की तरह उनका व्यवहार था।  बात होली के फाग और रसिया गायन की हो या फिर लाल केशा के मस्ती भरे उन्मुक्त हास्य और रतिप्रधान संवादों भरे गायन की। उन्मुक्त अभिव्यक्ति में उनका कोई सानी नहीं। होली पर्व की पूरी मौज-मस्ती लूटने में माहिर होने के कारण ही वरिष्ठतम गेरिया का उनका पद कोई छीन नहीं सका।

मस्त मौला प्रेरक, बेपरवाह फक्कड़

वे हर बात को साफ-साफ कहने के आदी थे  और इसीलिए लोग उनसे घबराते थे। निरपेक्ष और बेबाक व्यक्तित्व के धनी श्री दिनेश भट्ट को इसी वजह से दिनेश बादशाह और दादा के रूप में संबोधित किया जाता था। दिनेश भट्ट अपने आप में वह विलक्षण व्यक्तित्व रहे हैं जो भारतीय संस्कृति, संस्कारों और परंपराओं के संवाहक के रूप में सदैव प्रेरणा के स्रोत रहेंगे।

श्रद्धेय पं. दिनेश भट्ट के प्रति हार्दिक श्रद्धान्जलि।

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