यादगार साहित्यकार – मणि बावरा

स्मृति शेष शब्द-शिल्पी  –  मणि बावरा

ताजिन्दगी दिया अँधेरे के खिलाफ रोशनी का पैगाम

श्री मणि बावरा – वागड़ के शिक्षा और साहित्य जगत का वह दैदीप्यमान नक्षत्र रहे जिन्होंने दशकों तक अपने रचनात्मक कर्मयोग, शैक्षिक सेवाओं, साहित्य सृजन और समाज-जीवन से जुड़े विभिन्न क्षेत्रों में धाक जमायी और अविस्मरणीय व्यक्तित्व एवं कृतित्व से बांसवाड़ा को गौरवान्वित किया। जन्म जयन्ती पर उनका स्मरण करते हुए हम सभी श्रद्धावनत हैं।

ज्योतिर्मय व्यक्तित्व – श्री मणि बावरा

Mani Bawra

      बांसवाड़ा के साहित्यकाश में उदित होकर अपनी रचनाओं की चमक-दमक के साथ देश के साहित्य जगत में खासी भूमिका निभाने वाले श्री मणि बावरा वागड़ अंचल के उन साहित्यकारों में रहे हैं जिन्हें अग्रणी पंक्ति का सूत्रधार माना जाता है। राजस्थान के सृजनधर्मियों में नई कविता के शब्द शिल्पी के रूप में यशस्वी साहित्यकार श्री मणि बावरा का नाम आदर से लिया जाता रहा है।

      यशकीर्ति प्राप्त साहित्यकार मणि बावरा उस अजीम शखि़्सयत का नाम रहा है जिसने जीवन संघर्षों और परिवेशीय विषमताओं के बावजूद साहित्य जगत की सेवा की और बांसवाड़ा में साहित्य की  धाराओं व उपधाराओंको परिपुष्ट किया। इसके साथ ही अच्छे कवि व लेखक के रूप में बांसवाड़ा और बांसवाड़ा से बाहर भी ख़ासी पहचान कायम की।

      श्री बावरा का जन्म 23 जनवरी 1935 के दिन श्री जगजीवन पटेल के घर हुआ। उन्होंने शिक्षा को अपनी आजीविका का जरिया बनाया और ताज़िन्दगी शिक्षक के रूप में उल्लेखनीय सेवाएं दीं तथा समाज-जीवन को अपने बहुआयामी मौलिक व्यक्तित्व की खूबियों से परिचित कराया।

      उनकी धारदार गद्य कविताएं सामाजिक एवं परिवेशीय व्यवस्थाओं पर पैनी चोट करने में सक्षम रही हैं। अपनी कविताओं और व्यक्तिगत जिन्दगी में बेबाक बयानी उन्हें निर्भीक शखि़्सयत के रूप में प्रतिष्ठित करने वाली रही।

      श्री मणि बावरा का काव्य संकलन ‘अंधेरे के खिलाफ’ सन् 1999 में प्रकाशित हुआ है। इसे श्री बावरा ने उस आदमी को समर्पित किया है जो निरन्तर अंधेरे के खिलाफ विजय अभियान के प्रति समर्पित है। दीप शिखा साहित्य संगम द्वारा प्रकाशित इस काव्य संकलन में श्री मणि बावरा के समग्र काव्य जीवन की झलक देखने को मिलती है। अपने जीवन ध्येय को उन्होंने अपने काव्य संकलन ‘अंधेरे के खिलाफ’ में अच्छी तरह व्यक्त किया है।

      श्री मणि बावरा उन बिरले रचनाकारों में थे जिनकी लेखनी ने कभी विराम नहीं लिया। उनकी रचनाएं स्थानीय समाचार पत्र-पत्रिकाओं, स्मारिकाओं से लेकर प्रदेश एवं राष्ट्रीय स्तर की महत्वपूर्ण पत्र-पत्रिकाओं में स्थान पाती रहीं। शिक्षा विभागीय पत्रिका शिविरा तथा शिक्षक दिवस के विभागीय प्रकाशनों में उनके निबंध, कविताएं, कहानियां, लघु कथाएं आदि साहित्य महत्वपूर्ण स्थान पाए बगैर नहीं रहता।

      श्री बावरा ने वागड़ अंचल के प्रतिनिधि रचनाकार के रूप में हमेशा ख़ासी धाक कायम की। इस अंचल से प्रकाशित होने वाले कई पाक्षिक, साप्ताहिक, मासिक और त्रैमासिक पत्र-पत्रिकाओं, इनके प्रवेशांकों, विशेषांकों आदि का सम्पादन उन्होंने किया।

      तकरीबन तीन सौ से अधिक पुस्तकों में उनकी कविताएं, कहानियां, लघु कथाएं आदि का प्रकाशन हुआ है। बांसवाड़ा, उदयपुर एवं अन्य आकाशवाणी केन्द्रों से शताधिक अवसरों पर उनकी रचनाओं का प्रसारण हो चुका है।

      ख़ासकर नई कविता का प्रयोग करने वाले बावरा इस अंचल केे प्रथम पंक्ति के कवि रहे हैं। उनकी कविता में प्रतीक तथा बिम्ब उनकी अनूठे लहजे वाली सम्प्रेषण क्षमता के कारण प्रभावी बन पड़ते हैं। यह कहा जा सकता है कि यह फक्कड़ शब्द शिल्पी बिरला ही था।

      पढ़ने-लिखने के शौक के मामले में श्री मणि बावरा का कोई सानी नहीं। होली चौक स्थित उनका निवास इस दृष्टि से साहित्य चेतना का अहम् केन्द्र था जहां पुराना साहित्य, पत्र-पत्रिकाओं  और पुस्तकों का भण्डार उनकी गहन स्वाध्याय रुचि को अच्छी तरह दर्शाता है।

      साहित्य की विभिन्न विधाओें में देश के विभिन्न हिस्सों में प्रकाशित पुस्तकों, सामयिक पत्र-पत्रिकाओंं की उन तक पहुंच थीं और इनमें उनकी रचनाओं को अहम् स्थान भी मिलता रहा।

      श्री बावरा का ज्यादातर समय नियमित रूप से इन साहित्यिक पुस्तकों के अध्ययन में गुजरता रहा और इसी वजह से देश की सम सामयिक साहित्य धाराओं से उनका साक्षात् होता रहता। अपने काव्य में साहित्य की विभिन्न शैलियांंे का उन्होंने बखूबी प्रयोग भी किया।

      नई कविता के सशक्त हस्ताक्षर के रूप में चर्चित रहे बावरा ने अपनी रचनाओं में आम आदमी की जिजीविषा और जमीनी ज़िन्दगी से रूबरू कराया।

      साहित्यिक मूल्यों के संरक्षण और साहित्य धाराओं के प्रोत्साहन की दिशा में श्री बावरा के कार्य नई पीढ़ी के लिए प्रेरणा स्रोत हैं। राजकीय नगर उच्च माध्यमिक विद्यालय में शिक्षकीय दायित्वों के निर्वहन के साथ ही शिक्षा विभागीय सांस्कृतिक-साहित्यिक गतिविधियां और श्री बावरा वर्षों तक एक दूसरे के पूरक रहे हैं।

      इसके साथ ही स्वाधीनता दिवस, गणतंत्र दिवस और विभिन्न राष्ट्रीय दिवसों और आयोजनों से जुड़ी साहित्यिक गतिविधियों के संपादन में उनका योगदान अविस्मरणीय है। दो दशक से भी ज्यादा समय तक उन्होंने इन गतिविधियों का संचालन और संयोजन किया।

      यह संयोग ही है कि नेताजी सुभाषचन्द्र बोस की जयन्ती के ही दिन श्री बावरा का जन्म हुआ। उन्होंने तीन दशक तक अपने आवास तथा अन्य सार्वजनिक स्थलों पर हर साल 23 जनवरी को अपनी ओर से सुभाष जयन्ती समारोह का आयोजन किया। यह क्रम उनके जीवित रहने तक तो चला ही, उनके निधन के बाद भी काफी समय तक बना रहा। साहित्य और संस्कृति के संरक्षण, संवद्र्धन तथा निरन्तर अनथक सृजन के लिए श्री बावरा को विभिन्न अवसरों पर सम्मान प्रदान किया गया।

      मार्च 2002 में माँ सरस्वती साहित्य परिषद, बाँसवाड़ा द्वारा उन्हें ‘अंधेरे के खिलाफ’ पुस्तक के लिए कृतिकार सम्मान प्रदान किया गया। सन् 1996 में जिला प्रशासन द्वारा गणतंत्र दिवस पर उन्हें तीन दशकों से सुभाष जयन्ती के नियमित आयोजन के लिए जिलास्तरीय सम्मान प्रदान किया गया।

      सृजन साहित्य सेवा संस्था, बड़ी उदयपुर द्वारा सन् 1983 में उन्हें राष्ट्रवाणी हिन्दी के उन्नयन, सृजन, विकास एवं प्रचार-प्रसार के क्षेत्र में उल्लेखनीय योगदान के लिए लोकमान-83 अलंकरण प्रदान किया गया। साहित्य में उल्लेखनीय सेवाओं के लिए वागड़ विकास संस्थान ने ‘कर्मवीर अलंकरण’ से सम्मानित किया।

      साहित्य जगत की सेवाओं तथा साहित्य के नवांकुरों के प्रोत्साहन की दृष्टि से स्व. मणि बावरा ने खूब प्रयास किए। उन्होंने विभिन्न स्तरों पर रचनाधर्मियों को संगठित होकर आगे बढ़ने की प्रेरणा दी और हरसंभव सम्बल प्रदान किया।

      अपने लम्बे साहित्यिक सफर में श्री बावरा ने ऊँची सोच और सकारात्मक दृष्टि का परिचय कराया। विभिन्न अवसरों पर रचनाधर्मियों में मतभेदों को दूर करने उन्होंने मध्यस्थता की और साहित्यिक सौहार्द के माहौल को परिपुष्ट किया।

      बांसवाड़ा के साहित्य जगत को नवीन आयाम देने के लिए उनकी पहल पर ही दीप शिखा साहित्य संगम की स्थापना की गई। इसके संस्थापक के रूप में श्री बावरा ने साहित्य जगत को नई ऊँचाइयां और प्रचार-प्रसार दिया। राजस्थान तटस्थ रचनाकार संघ के जिलाध्यक्ष एवं वागड़ी संप संभा के उपाध्यक्ष के रूप में उन्होंने बांसवाड़ा के साहित्यकाश को समृद्ध किया। बावरा अव्वल दर्जे के स्वाध्यायी और नियमित सर्जक थे। उनके जीवन में कभी वह क्षण नहीं आया जब उनके सृजन धर्म ने विराम लिया हो। रुकना उनके शब्दकोष में था ही नहीं।

      साहित्यकारों को प्रकाशन के अवसर मुहैया कराना उनका ध्येय रहा। इसी के वशीभूत होकर श्री मणि बावरा ने अपने साहित्यिक मित्रों के सहयोग से ‘शेष यात्राएं’’ काव्य संग्रह का सम्पादन किया। त्रैमासिक वाग्वर  तथा ‘साहित्य कलश’ के संपादन मण्डल में उनकी भूमिका महत्वपूर्ण रही।

      अपने 67 वर्षीय सफर में श्री बावरा ने बांसवाड़ा में साहित्य जगत को नवीन पहचान तो दी ही, अपनी अनथक साहित्यिक यात्रा और नियमित सृजन-प्रकाशन की बदौलत बांसवाड़ा को प्रदेश-देश के साहित्याकाश में भी नाम दिया।

      सन् 2002 की 5 जुलाई को यह अजीम शखि़्सयत कई यादगार लम्हों भरा साहित्यिक इतिहास छोड़ अलविदा कह गई। श्री बावरा आज हमारे बीच नहीं हैं लेकिन उनके व्यक्तित्व की गंध साहित्याकाश में युगों तक महकती रहेगी। वागड़ अंचल में साहित्य जगत की सेवा और नवांकुरों के प्रोत्साहन में उनकी भूमिका को युगों तक याद रखा जाएगा।

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