यादगार चर्चा – स्वतंत्रता सेनानी मास्टर सूरजमल से अन्तरंग मुलाकात

( स्वतंत्रता सेनानी मास्टर सूरजमल से उनकी मृत्यु के एक वर्ष पूर्व आत्मीय क्षणों में हुई अन्तरंगत मुलाकात में उन्होंने अपने बारे में बताया। साथ ही तत्कालीन परिस्थितियों के बारे में भी प्रश्नोत्तर स्वरूप में खुलकर अभिव्यक्ति दीं । आज वे हमारे बीच नहीं हैं लेकिन उनकी कही हुई बातें वर्तमान का खाका खींच देने के लिए काफी हैं। यहाँ प्रस्तुत है वह यादगार और संग्रहणीय इन्टरव्यू हूबहू उन्हीं के शब्दों में।)

Master Surajmal

       प्रश्न-   आपका नाम, आपकी उम्र तथा आप कहाँ के रहने वाले हैं?

       उत्तर-  मैं बांसवाड़ा का रहने वाला हूं। मेरी इस वक्त उम्र 83 साल है और मैं पीपली चौक, राम बाजार के अंदर रहता हूं। पहले बांसवाड़ा देशी रियासत थी। राजा का राज था। उस वक्त इन राजाओं के वक्त के अंदर जनता के साथ बहुत अन्याय होते थे। भेदभाव होता था। बेगार ली जाती थी। उनके रहन-सहन, पहनावे में सबके अंदर राजाओं का हस्तक्षेप रहता था और उन लोगाें को हर तरह से हैरस  (प्रताड़ित) किया जाता था।

       मेरा जन्म 1971 का है। मैं 1935 के अंदर यहां पर पहले पढाई नहीं थी। ज्यादा स्कूलें नहीं थी। मैं आठवीं तक पढ़ा। उसके बाद मैं आगे बाहर जाने में असमर्थ था। मैं बाहर नहीं जा सका। उदयपुर, रतलाम, इन्दौर वगैराह जाते तो हम दसवीं या आगे पढ़ाई कर सकते थे। लेकिन यहां से वह चीज नहीं थी, तो हमने आठवीं के बाद में सोचा कि हम कुछ काम करें।

       उस वक्त बांसवाड़ा के अंदर चिमनलाल जी मालोत सिलाई का काम करते थे। उनसे हमारा परिचय था। हमने सोचा हम इनके पास क्यों नहीं सिलाई का काम सीखे लें। हम उनके पास सिलाई का काम सीखने के लिए गये। उस वक्त यहां पर बेट-बेगार के लिए इन दर्जी लोगों ने ये शिकायत की कि आप हमको ही बेगार में लेते हो, जबकि हमारा धंधा दूसरे लोग करते हैं। उनको आप बेगार पर क्यों नहीं बुलाते। उन्होंने कहा कि वे बात भी सही है। उन लोगों को भी बुलाओ, तो चिमनलाल जी की दुकान पर पुलिस का आदमी आकर कह गया कि कल तुमको हम बेगार में महल पर ले जाएंगे।

Master surajmal

       उन्होंने कहा कि नहीं हम तो आजादी वाले आदमी हैं, स्वाभिमान के आदमी हैं और हम जो हैं, वो बेगार के अंदर नहीं जाएंगे तो उसने कहा कि तुम नहीं आओगे तो हम तुमको पकड़ कर जबरदस्ती ले जाएंगे। उस वक्त इन्दौर में उनका दोस्त था, वे उनके पास चले गए।

       अब हमने सोचा कि हम को भी क्या करना है। हमने सोचा कि हम भी चलो अहमदाबाद चले जाएंगे और वहां पर जाकर कुछ काम करेंगे। हम अहमदाबाद चले गये और उस वक्त जो है, वो धूलजी भाई भावसार जो बांसवाड़ा के रहने वाले थे, वे उस वक्त वहां पर इस आजादी के अंदर जुडे़ थे। गांधीजी से सम्बन्ध रखे हुए थे और उनके सम्पर्क में हम आए।

       उस वक्त हम वहां दारूबंदी आंदोलन चल रहा था। सन् 1936 की बात है, उसी 8 रोज जो है वहां पर दारूबंदी के लिए जुलूस निकलने वाला था। गुजरात में जुलूस को सर्कस बोलते हैं। उन्होंने हमको कहा कि सूरजमलजी आज सर्कस निकलेगा। उस सर्कस में तुम आना चाहते हो, मैंने कहा कि आऊंगा। तो देखिए यहां पर लाठी चार्ज भी हो सकता है। वहां पर घोड़ों की टांगों से भी पीसा जा सकता है। आपको जेल भी भेजा जा सकता है। आपको ये चीज बर्दाश्त करने की ताकत है, तो आप हमारे साथ चलिए। मैंने कहा कि हम जरूर आएंगे, जो भी यातना होगी हम झेलेंगे। आपके साथ में आएंगे। हम गये, लालबाग के अंदर जुलूस में सभा हुई। वहां पर उस वक्त वल्लभ भाई पटेल की मौजूदगी के अंदर मिटिंग हुई और सभा विसर्जन हुई, लेकिन शान्ति से हुई। कोई किसी किस्म का विवाद पैदा नहीं हुआ और हम जो है वापिस घर चले आए।

       उसके बाद में कुछ हमको बांसवाड़ा आने का काम पड़ा। हम बांसवाड़ा चले आए। बांसवाड़ा आने के बाद सागवाड़ा के अंदर गौरीशंकर जी उपाध्याय थे। वो मेरे भाई के दोस्त थे। मेरे मकान पर उनका आना-जाना होता रहता था और वे राजनीतिक संसारी लोग थे। वो बात करते, मेरे पर उसका असर ज्यादा होता तो मेरे दिल के अंदर हमेशा ये चीजें बनी रहती कि हम भी क्यों न इसके अंदर हाथ बंटाए। तो दिल के अंदर मेरी तमन्ना तो ये भी लेकिन उसके बीच के अंदर मुझे कुछ ऎसी परिस्थितियों ने किया कि हमको भी अभी तो हमारा बचपन है, कुछ काम करना है। मैं सन् 1939 के अंदर यहां से उदयपुर चला गया और उदयपुर में मैंने गंदीलाल जी बोरिया के पास टेलरिंग का काम सीखना शुरू किया।

       उस वक्त वहां पर माणिक्यलाल जी वर्मा थे। माणिक्यलाल जी वर्मा जो सेवाश्रम में चलाते थे और उस वक्त पहला अधिवेशन सुखाड़िया जी के तत्वावधान में होने वाला था। हम उस मिटिंग में भी गये और उनके भाषण सुने तो कुछ रंग तो हम पर चढ़ ही गया और जब हम वापिस बांसवाड़ा आए तो रंग में रहे।

       चिमनलाल जी बांसवाड़ा चले गये थे। फूलजी भाई भी बांसवाड़ा चले आए थे। फिर क्विट इण्डिया आंदोलन चला उसमें चिमनलाल मालोत को गिरफ्तार कर लिया गया। चिमनलाल मालोत को सजा हुई। जेल के अंदर डाल दिया गया। हम लोग जो हैं चुपचाप शांत से रहते रहे और ज्यादा इसमें न करते हुए अपने अपने धन्धे में लगे रहे।

       राजा बड़ा क्रूर था। उसने  चिमनजी को उसने कंकरीट की रोटी खिलाई, घटियां पिसवाई। तीन महीने तक वे जेल में रहे। फिर उसने उनसे कहा कि चिमनलाल जी हम तुमको छोड़ देंगे लेकिन तुम हमसे माफी मांग लो और तुम ये वादा करो कि हम आगे से कोई भी आंदोलन नहीं करेंगे। माफी मांगकर वहां से वे छूट गये। ये बात जरूर है कि उन्होंने माफी मांग ली।

       उसके बाद में धीरे-धीरे राजनीति ने और रंग पकड़ना शुरू किया। मोहन सिंह जी मेहता यहां पर आए क्योंकि यहां का राजा उस समय तक मर चुका था।

      प्रश्नः- मास्टर सूरजमलजी ! आपने बताया कि आप कब से स्वतंत्रता आंदोलन से जुड़े रहे और किस-किस तरीके से आपने किन-किन लोगों के साथ काम किया। अब आपसे हम से पूछना चाहेंगे कि जब आप स्वतंत्रता आंदोलन से जुड़े एवं लम्बे समय तक आपने काम किया। आप अपने प्रेरणा स्रोत किसको मानते हैं, किनके  साथ आपने सबसे ज्यादा काम किया और कहते हैं कि किसी भी व्यक्ति जो इस आंदोलन से जुड़ा था, उसके साथ आपने बहुत कुछ सीखा आप किसको प्रेरणा स्रोत मानते हैं?

       उत्तरः- मैं तीन आदमियों को अपना प्रेरणा स्रोत मानता हूं। पहला तो मैं चिमनलाल उपाध्याय से मुझे प्रेरणा मिली तथा मैं अपने जीवनचर्या में उतारता गया। गांधीजी और वल्लभभाई पटेल से भी काफी प्रभावित रहा।

      प्रश्नः- इस स्वतंत्रता आंदोलन से जुड़े कुछ संस्मरण आप बताएं। किन-किन के साथ जुडे़ रहे। बैठकों में भाग लिया। ऎसा संस्मरण आप बताना चाहेंगे।

       मास्टरजीः- ऎसा है संघर्ष कोई मामूली चीज नहीं होती। संघर्ष शुरू करना, संघर्ष से निपटना बहुत कम लोगाें की चीज होती है। कभी-कभी संघर्ष करते हुए एवं सीधी आपत्ति जो सीधे जनता के ऊपर पड़ जाती है, जिससे जनता परेशान हो जाती है। लेकिन संघर्ष एक होना चाहिए, जिससे जनता को फायदा पहुंचे तथा संघर्ष कामयाबी के साथ सफल हो जाए। हमने बांसवाड़ा के अंदर सोचा कि यहां आवागमन के साधन नहीं थे। बसें नहीं थी। रेल मार्ग नहीं था, लोग बैलगाड़ियों में जाते थे, पैदल जाते थे। चारों तरफ नदियां थी, पुल नहीं थे। बांसवाड़ा बिल्कुल कटे हुए के माफिक था।

       हमने उसके बीच में चिड़ियावासा के पास त्रिवेणी में सम्मेलन कर लोगों को प्रोत्साहित किया था कि आप आजादी के संघर्ष में रहिए, हमारे साथ चलिए, लोक आजादी के लिए साथ में आने के लिए तैयार थे। उसके बाद हमने एक संघर्ष  1940 में एक अनाज आंदोलन यहां पर चलाया।

       उस वक्त यहां पर पहले हमने कहा कि पहले प्रजामंडल की स्थापना कर लें। हमने प्रजामंडल की स्थापना के लिए जोधपुर से अखिलेश्वर जी को यहां बुलाया। अखिलेश्वर जी हमारे बीच में आए तथा यहां प्रजामंडल की स्थापना की। उसके बाद में जाकर के हमने आंदोलन शुरू किए। आजाद चौक में मिटिंग करते रहे। यहां पर कुछ इन्दौर से ये जो अभी सेक्रेटेरियेट ( जिला कलक्ट्री) जहां बना है, पहिले हाईस्कूल बनने वाली थी, तो वहां पर काम करने के लिए कारीगर आये थे। ये वे कारीगर भी आजादी से ओत-प्रोत थे। उनका संगीत इतना मधुर था वे जब तबले बाजे बजाते, आजादी के गीत गाते तो लोगों का जुलूस इकट्ठा हो जाता था। फिर हमारी मिटिंग होती थी, तो हमने उस वक्त अनाज आंदोलन का छेड़ा। हमने राजा को रिजेक्ट किया कि अनाज लोगों को मिल नहीं रहा है। लोग कंकरीट की रोटी खा रहे हैं। लोग भूखों मर रहे हें। आप इसका इंतजाम करो।

       उसके ऊपर ध्यान नहीं दिया तो आजादी का संघर्ष छेड़ दिया। रात को हमने यहां पर भूपेन्द्रनाथ त्रिवेदी को बुलाया। धूलजी भाई भावसार आए। अहमदाबाद से गौरीशंकर जी आए। अहमदाबाद से हमारे साथी लोग इकट्ठा हुए और हमने यहां आंदोलन शुरू कर दिया।

       उस वक्त दल ने यह डिक्लेयर कर दिया कि हम आपकी हुकूमत को नहीं मानेंगे और हमारा प्रधानमंत्री जो है, भूपेन्द्रनाथ त्रिवेदी है। हमने भूपेन्द्रनाथ त्रिवेदी को प्रधानमंत्री घोषित किया और ये कह दिया कि हम आज से आजाद हैं। चाहे तुम हुकूमत करते रहे। प्रजामंडल की घोषणा करने के बाद ये डिक्लेयर कर दिया। रातों रात भूपेन्द्रनाथ त्रिवेदी, धूलजी भाई भावसार, शंकरदेव आर्य, सूर्यकांता दोसी, उ आदि को पकड़ कर ले गये। लक्ष्मणदास बाबा को भी ले जाकर जेल के अंदर ठूंस दिया।

       सवेरे होते ही अन्य सेनानियों ने मुझसे कहा कि मास्टर साहब अपने नेताओं को रात को पकड़ कर चुपचाप ले गये हैं और 144 धारा लगा दी है। अपने को इन धाराओ को तोड़ना है। उस वक्त में मैं सैटलमेंट का अमीन था। मैं सरकारी सर्विस कर रहा था। मैंने कहा ठीक है, चले चलेंगे। आप झण्डा लेकर आइये। वे झण्डा लेकर आए। प्रजामंडल के ऑफिस से हम वहीं से साथ में हो गये तथा झण्डा लेकर इंकलाब जिन्दाबाद के नारे लगाते हुए आगे बढ़े।

       उस वक्त बांसवाड़ा में कोतवाली जो सिटी डिस्पेंसरी है, वहां पर मिलिट्री लगा दी थी। उन्होंने पूनमचंद को पकड़ कर जेल के अंदर रख दिया, तो मैंने उनसे फ्लेग मेरे हाथ में ले लिया। मेरे हाथ में से झण्डा छीनना चाहा तो हमने कहा कि झण्डा हम नहीं देंगे, प्राण गंवा देगें लेकिन झण्डा नहीं देंगे। क्योंकि हमारे ये सिद्धान्त थे कि मित्रों प्राण भले ही गंवाने पडे़ ये झण्डा नीचे नहीं झुकाना। जो हमारी जान जाएगी लेकिन झण्डा नीचे नहीं झुकेगा।

      प्रश्नः- मास्टर सूरजमलजी ये तो आपने बताया कि स्वतंत्रता आंदोलन से आप एक लम्बे समय तक जुड़े रहे और आपके कुछ संस्मरण रहे, जो कि आपने बतलाये। अब आप ये बताएं कि जब आजादी की लड़ाई लड़ी, तो उसमें कई यातनाएं भी आपको सहनी पड़ी होंगी। कई बार आपको जेल में भी जाना पड़ा होगा। तो आप बतायें कि कितनी बार जेल गये तथा क्या-क्या यातनाएं सहनी पड़ी?

       मास्टर सूरजमलः- सर, सही बात थी हमने तो यातना एक ही बार झेली और बहुत जबरदस्त झेली। जब एक बार ये जुलूस रवाना होकर गया। झण्डा जो मेरे हाथ मे था। जब कोतवाली के पास जुलूस गया तो वहां पुलिस कोतवाली के पास खड़ी हुई थी। उसने कहा, ‘‘शूट’’, तो उन्होंने शूट का नाम सुनकर लाठी चार्ज शुरू कर दिया। लोग भाग गये। मेरे हाथ मे फ्लेग था, तो मैं भाग नहीं सकता था। तो लाठियां मेरे ऊपर बरसी। मैं पीछे जाते-जाते आजाद चौक पहिले उसे धनावाव बालते थे और मैं गिर गया और वहां से मुझे पकड़कर जेल ले गये फिर मुझे मालूम नहीं क्या हुआ।

      प्रश्नः- जेल में जाने के बाद आप छूटकर वापिस आए होंगे?

       उत्तरः- जेल में जाने के बाद हमारा कम्प्रोमाइज हुआ। जनता जो है, बीच में पड़ी। जनता की एक कमेटी बनी। कमेटी बनने के बाद उन्होंने अनाज का जिम्मा अपने सर पर लिया कि अनाज का इंतजाम जनता के लिए हम करेंगे। आप ये आंदोलन बंद करो। उन्होंने स्वेच्छा से हमको जेल से छोड़ा और हम 9 दिन जेल में रह करके वहां से निकल कर वापिस जनता के बीच चले आए।

       जब हम जनता के बीच आये तो पहले हम जिसे धनावाव कहते थे, उसे आजाद चौक नाम दिया। उसी रोज घोषित किया कि आज से यह आजाद चौक कहलाएगा।

      प्रश्नः-  ये तो आपने जबरदस्त कार्य किया तथा आपके साथ जिन्होंने हर जगह आपका साथ दिया। आपके जिन्हें आप प्रेरणा स्रोत मानते हैं, के साथ कार्य किया। आपने बताया बांसवाड़ा में उस समय न तो सम्पर्क के साधन थे, तो उस समय में आप किस प्रकार से एक दूसरे से संपर्क करते थे?

       उत्तर ः- उस वक्त जो हमारे पास पैदल लोग आते थे। बैलगाड़ियों में भी आते थे। हमको मैसेज भी देते थे। और कुछ के पास गाड़ियां जरूर थीं, वे आते थे और हमको सब आदेश देते थे, प्रेरणा भी देते थे।

      प्रश्न ः- मास्टर सूरजमल जी जैसा कि आपने सम्मेलनों के बारे में बताया कि यहां कई बार सम्मेलन भी किया। आप बताएं कि बांसवाड़ा छोटी जगह थी तथा किसी रोड से भी नहीं जुड़ी थी तथा कोई साधन भी नहीं था तो आप ये सम्मेलन कैसे करते थे?

       उत्तर ः- वो तो हमने हमेशा गौशाला में सम्मेलन किया था। जिसमें भूरेलालजी बया, माणिक्यलाल जी वर्मा, भोगीलाल जी पंड्या, जयनारायण जी व्यास, हीरालाल जी शास्त्री और गोकुल भाई भट्ट सबको यहां पर बुलाया था। उन लोगों ने तीन रोज गौशाला में रहकर सम्मेलन किया था।

      प्रश्न ः- जैसा कि आपने बताया कि आपके सम्मेलन में सरोजनी नायडू भी आर्इं थी।

       उत्तर ः- सम्मेलन में नहीं आई थी। वे तो अपने ट्यूर में आई थीं। हमको आगाह करके, इन्स्ट्रक्शन देकर चले जाते थे। आगे क्या काम करना, किस किस्म का करना, ये बतलाने के लिए ये आते थे। सम्मेलन में तो हमारे राजस्थान के ही लोग आए थे। जो हमने आपके पहिले ही कह दिया, जयनारायण व्यास, हीरालाल शास्त्री, माणिक्य लाल वर्मा, भूरेलाल जी बया, सिद्धराज जी ढड्ढा ये लोग आए थे।

      प्रश्न ः- मास्टर सूरजमलजी उस समय भी आप स्वतंत्रता आंदोलन से जुड़े रहे थे और आपने लंबे समय तक रहकर काम किया। ये हमारे बांसवाड़ा के लिए बहुत मेहनत की, जिसका फल ये मिला कि आप हम स्वतंत्र हैं, हम लोगों ने प्रगति की, तरक्की की, उस समय के युवा और आज के युवाओं में आप क्या अंतर पाते हैं? आप क्या कहना चाहेंगे?

       उत्तर ः- मेरा तो इतना कहना है कि उस वक्त अनाज आंदोलन चला था। प्रजामंडल का उस वक्त का रिकॉर्ड आज भी बीकानेर अभिलेखागार में मौजूद थे। बीकानेर अभिलेखागार में प्रजामंडल की सभी फाइलें भी मौजूद हैं और आज के युग में हमने उस समय जो भी संघर्ष किए वे देश की खातिर किए थे। गरीब जनता की खातिर किए थे। हमारी खातिर नहीं किए थे। हमने कोई पद लेने की खातिर नहीं किए थे।

       आज जो आंदोलन चल रहे हैं वे लोग अपनी खातिर कर रहे हैं। अपने स्वार्थ के खातिर कर रहे हैं कि हमारी तन्ख्वाहें बढ़े। हमारे घर में हमने हमारे लिए नहीं किया गया था। सर्वे भवन्तु सुखिनः। हमने सबके सुख को देखा था, हमने हमारे एक के लिए कुछ नहीं किया या सोचा। हमारी प्रेरणा आज के बच्चों से यही है कि आज जो हैं नेक बनिए। देश के लिए जो कुछ भी हैं, काम करिये।

       आज जो पश्चिम की संस्कृति को देखकर पश्चिम की तरफ मुड़ रहे हैं। पश्चिम की संस्कृति के अंदर और भारत की संस्कृति के अंदर बहुत ही फर्क है। यदि पश्चिम की संस्कृति में आप जो रह गए, तो यह देश जो एक दिन डूबकर रह जावेगा।


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