भगवान की कृपा से ही संभव है ध्यान

भगवान के दर पर जाने का सौभाग्य उसी का होता है जिसे प्रभु चाहते हों। इंसान का चित्त निर्मल न हो, दिमाग खुराफातों और झूठ से भरा हो, मन मलीन और मैला हो, उस स्थिति में जीवात्मा परमात्मा के करीब नहीं पहुंच सकता। प्रकृति और परमेश्वर दोनों को पसंद है शुचिता और निर्मल चित्त।

ध्यान वही कर सकता है जिस पर भगवान की कृपा हो। नशेड़ी, व्यभिचारी, लम्पट, लुच्चे-टुच्चे-लफंगे, झूठे-मक्कार और हराम का खान-पान और व्यवहार करने वाले सांसारिक, लोभी-लालची और दुष्ट कभी ध्यान नहीं कर सकते। योगश्चित्तवृत्तिनिरोधः कोई मामूली बात थोड़े ही है।

कलिकाल में वे लोग आदर-सम्मान और श्रद्धा के योग्य हैं जो धर्म मार्ग पर चलते हुए विश्व कल्याण और जीवों के उत्थान की भावना से तीर्थ सेवन करते हैं, पिण्ड और ब्रह्माण्ड के मध्य सेतु संचार स्थापित करने के लिए ध्यान करते हैं और आत्म कल्याण की भावनाओं के साथ जीते हुए मोक्षप्राप्ति के लिए अग्रसर रहा करते हैं। लेकिन यह सब सामान्य जनों के बस में नहीं है। केवल और केवल वे ही लोग इस महा आनंद को पा सकते हैं जिन्हें प्रभु स्वयं चाहते हैं। परमात्मा की इच्छा के बगैर पत्ता तक नहीं हिल सकता।

Leave a Comment

Your email address will not be published. Required fields are marked *