औचित्यहीन है अर्थहीन शोध

केवल डॉक्टरेट पाने या अपने नाम से आगे डॉक्टर लिखने का शौक पालने वालों अथवा डॉक्टरी करके नौकरी, प्रमोशन में चाँस पाने की परंपरा आजकल हर तरफ परवान पर है।

कुछ लोग शौकिया डॉक्टर बनने के लिए पीएच.डी. कर रहे हैं और बहुत सारे लोग किसी न किसी लाभ के लिए। शोध अध्ययन और डॉक्टरेट करनी भी चाहिए और इसका लाभ लेना भी चाहिए लेकिन आजकल जिस तरह से डॉक्टरी की बाढ़ आ गई है उसे देख लगता है कि शोध अपने लक्ष्यों से भटक कर या तो व्यक्तियों और उनके समूहों-गिरोहों के इर्द-गिर्द केन्दि्रत होती जा रही है अथवा अपने उद्देश्यों से भटक कर व्यवसायिक होने लगी है।

शोध का सीधा सा अर्थ है उन विचारों और विषयों से जुड़े संदर्भों का उद्घाटन जो आम लोगों से लेकर समुदाय, क्षेत्र, परिवेश और राष्ट्र तक के लिए दिशाबोधकारी, कल्याणकारी और शाश्वत आनंददायी हो।

इस मायने में आजकल की शोध किस दिशा में जा रही है उस बारे में कुछ कहा नहीं जा सकता।  वर्तमानकालीन शोध, उसकी दशाओं और दिशाओं तथा सम सामयिक हालातों से लेकर इससे संबंधित विशेषज्ञों और शोधार्थियों के बारे में कुछ भी कहने की आवश्यकता इसलिए नहीं है क्योंकि इस बारे में सभी लोग अच्छी तरह जानते हैं।

केवल और केवल यदि शोध की उपादेयता की चर्चा करें तो यह कहना समीचीन होगा कि शोध के लिए शोध की बजाय लोक और जगत के लिए शोध होनी चाहिए। आजकल एक-दूसरे को उपकृत करने और पारस्परिक प्रशस्ति तथा ख्याति का नेटवर्क स्थापित करने के लिए ऎसे-ऎसे लोगों को शोध के लिए पात्र बना दिया जाता है जिनसे समाज, क्षेत्र और देश को कोई लेना-देना नहीं होता। जिनके बारे में लेखन और शोध से समाज और देश-दुनिया का न कोई भला हो सकता है और न ही किसी का उद्धार।

कई बार उन लोगों के बारे में शोध के विषय हाथ में ले लिए जाते हैं जिनके व्यक्तित्व और कर्तृत्व के बारे में कोई नहीं जानता। इसे वह ही जानता है जो उसका परिचित या खास होता है अथवा वह जो इस तरह के विषय सुझाता है।

इस बारे में किसका क्या स्वार्थ है उस बारे में चिन्तन करना समय की बर्बादी के सिवा कुछ नहीं। बहुत से परिचित और मित्र हमारे सम्पर्क में आते हैं जो बड़े गर्व के साथ कहते हैं कि पीएच.डी. कर रहे हैं।

इनसे विषय के बारे में पूछो तो पता चलता है कि ऎसे-ऎसे अजीबोगरीब लोगों और विषयों के बारे में शोध के विषय ले रखें हैं कि जिनके बारे में लोग कुछ नहीं जानते। शोध के लिए उन विषयों को लेने तथा उन पर शोध करने का कोई औचित्य नहीं है जिनसे समाज को कोई लाभ संभव नहीं है, न अभी और न कभी।

केवल पी.एचडी. की डिग्री पा लेने का कोई अर्थ नहीं है जब तक कि हमारे द्वारा की गई शोध का लाभ वर्तमान और आने वाली पीढ़ियों को न मिले, हमें न मिल पाए और समाज तथा देश को भी इस तरह की शोध का कोई लाभ प्राप्त न हो सके।

हमारे पुरखों ने समाज-जीवन और देश-दुनिया से संबंधित कई सारे विषयों में सिद्धि हासिल की, कर्मयोग का पराक्रम दिखाया और उनके दिए तथा अनुभवित ज्ञान को हम आज तक भुना रहे हैं और लाभ पा रहे हैं।

हमारे आस-पास से लेकर देश के कोने-कोने में ऎसे सामाजिक, सांस्कृतिक, धार्मिक और प्राकृतिक स्थलों की भरमार है लेकिन इस बारे में न तो हम जानते हैं और न ही हमारे बच्चे या घर वाले। इनके बारे में सोचने-समझने और जानकारी पाने की हममें कोई उत्कण्ठा नहीं है, न ही इस बारे में कुछ करना चाहते हैं।

और उन विषयों और व्यक्तियों की टोह लेने तथा उनके बारे में शोध करने की दिशा में हम भिड़े रहते हैं जिनसे हमारा संबंध केवल शोध करने तक ही सीमित रह गया है। शोध से पहले भी उनके  बारे में हमारी कोई रुचि नहीं थी, और शोध के बाद भी हम उन्हें याद रख पाने का कोई जतन नहीं करते।

एक बार डॉक्टरेट मिल जाने के बाद खूब सारे विषय ऎसे होते हैं जिनके बारे में हममें से खूब सारे लोगों की कोई रुचि नहीं होती। इस स्थिति मेंं देश की अपरिमित बौद्धिक सम्पदा का किस तरह अपव्यय हो रहा है उसे अच्छी तरह समझा जा सकता है।

उन विषयों और व्यक्तियों के बारे में शोध की जरूरत आज भी समझी जा रही है जो हमारे गर्व और गौरव हैं। आधुनिक और व्यवसायीकरण से प्रभावित लोगों के कारण से आज शोध की दिशा भटकी हुई लगती है और इसके अपेक्षित परिणाम सामने नहीं आ पा रहे हैं।

कितना अच्छा हो यदि हम हमारे गौरवशाली इतिहास, महापुरुषों, पराक्रमी व ज्ञानवान पुरखों, अपने क्षेत्रों, परंपराओं, खासियतों और पुरातन संस्कृति, सभ्यता और स्थलों, ऎतिहासिक-धार्मिक स्थलों, आदर्श व्यक्तित्वों, कर्मयोगियों, अपने क्षेत्र के उल्लेखनीय व्यक्तियों और महत्वपूर्ण स्थलों, प्राचीन साहित्यकारों, संस्कृतिविदों और उन सभी पर शोध करें जिनसे आने वाली पीढ़ियों में नवीन ऊर्जा और प्रेरणा का संचार हो सके।

शोध वही है जो कालजयी होकर आने वाली पीढ़ियों के लिए मार्गदर्शन और सम्बलन में भागीदार हो। इस विषय पर प्रबुद्धजनों को सोचना चाहिए। सामाजिक, आंचलिक और राष्ट्रीय सरोकारों से जुड़े शोध कार्य ही श्रेयस्कर हैं, शेष के बारे में कुछ कहा नहीं जा सकता।

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