Dr.Deepak Acharya Chittorgarh

ये आदमी की जात है ही ऎसी

आदमी कभी भी हमेशा खुश नहीं रह सकता। यह स्थिति नाकारा आदमियों की भी है और काम वाले आदमियों की भी। आदमी कैसा भी हो, आदमी की जात कभी भी चुपचाप नहीं बैठ सकती। शायद ही कोई आदमी कहीं चुपचाप धीर-गंभीर होकर बैठा दिखे। ऎसा चुपचाप बैठा हुआ दिख भी जाए तो कोई गारंटी नहीं कि वह स्वस्थ ही होगा। या तो बीमार होगा या फिर किसी न किसी सनक या धुन में खोया हुआ।

वैसे आजकल धुनी आदमियों की संख्या भी कोई कम नहीं है। हर कोई किसी न किसी दंद-फंद या विचारों में खोया हुआ होगा ही। कोई मोबाइल में घुसा हुआ मिलेगा तो कोई चुपचाप अपने से ही बातें करता हुआ। खूब तो ऎसे भी हैं जो हमारी तरफ देख भी रहे होते दिखते हैं, बोलते भी रहते हैं मगर उनके केन्द्र में हम नहीं होते।  उनके ध्यान में कोई और ही चल रहा होता है।

यह आदमी है ही ऎसा। उसे कुछ न कुछ करने को चाहिए ही होता है। और कुछ नहीं तो उसे संघर्ष या वाग् विलास के लिए भी कुछ चाहिए ही चाहिए। अन्यथा इंसान को अपना कोई सा क्षण अनुकूल महसूस नहीं होता।

बहुत सारे लोग हैं जिन्हें रोजाना कोई न कोई संघर्ष आनंद देता है। खूब सारे लोग हैं जो हमेशा हर दिन किसी न किसी बात को लेकर कोई सा झगड़ा करने के आदी हैं और इन लोगों को तब तक चैन नहीं पड़ता जब तक कि जोरों से चिल्ला न दें अथवा किसी न किसी से कोई झगड़ा न कर लेंं।

कुत्तों की तरह भौंकने वाले भी हैं। ये बिना पिये हुए भी भौंक सकते हैं, और पी लेने के बाद तो इनका नॉन स्टॉप भौंकते रहना कोई नहीं रोक सकता। यह तभी शान्त होंगे, जब पूरी उतर जाएगी। आजकल पीने और पिलाने वालों की भी जबर्दस्त भीड़ छायी हुई है। कुछ मुफत की पीने के आदी हैं और ढेरों ऎसे हैं जो कि कंपनी तलाशने के लिए मुफतखोरों को ढूँढ़ते रहते हैं और जिन्दगी भर लंगड़े और अंधे के साथ वाली कहानी को जीवन्त करते रहते हैं।

इन रईसजादों के पास बाप-दादाओं की कमाई संपदा होती है या फिर रिश्वतखोरी और भ्रष्टाचार, अथवा किसी न किसी चोरी-डकैती और तस्करी का पैसा हो। और यह भी नहीं होगा कि किसी न किसी सफेद हाथी के नाम पर कमा खाने का कोई न कोई हुनर होगा।

फिर आजकल सबसे आसान और बिना पूंजी का धंधा हो गया है दलाली। इसमें सब कुछ गोपनीय रखने की मानवीय विवशता है। न देने वाला बोलता है, न दिलाने वाला, और न ही लेने वाला। सारे अपराधी और चोर भाई-भाई।

अपने आस-पास भी ऎसे खूब सारे दिख जाएंगे, जिनके पास कोई काम-धन्धा नहीं है लेकिन ऎश की जिन्दगी जीते हैं और अपने आप को खुदा से कम नहीं समझते। जरा इनकी कमाई के स्रोत के बारे में भी जानने की कोशिश करें कि आखिर इनके पास इतना पैसा आया कहाँ से, ये मौज-शौक और भोग-विलास किसके दम पर। हर कहीं कोई न कोई अली बाबा होता ही है जिसके आस-पास और साथ कम से कम चालीस चोरों का कबीला तो होगा ही। फिर अब तो इन सबके पास खजानों को खोलने के पासवर्ड हैं, जिधर नज़रें फिरा दें, खजाना साफ हो जाए।

आमतौर पर अधिकांश घराेंं में सास-बहू, भाई-भाई, भाई-बहनों, पिता-पुत्र, पिता-पुत्री, माता-पुत्र और तमाम प्रकार के रिश्तेदारों में वजह-बेवजह कोई न कोई झगड़ा होता ही रहता है। और तो और प्रेम में डूब कर प्रेम विवाह तक कर देने वाले लोग भी कुछ समय बाद एक-दूसरे से झगड़ कर अलग हो जाया करते हैं। पता नहीं इनका वो प्रेम कहाँ पलायन कर जाता है जिसमें एक-दूजे के होकर जीने और जनम-जनम का साथ निभाने के दावे और वादे हवा हो जाया करते हैं। अर्से बाद जाकर पता चलता है कि जिसे अब तक वे प्रेम समझ रहे थे वो तो किसी न किसी तरह के अनुबंध की तरह था या फिर एकतरफा लाभ-हानि के गणित का कोई सूत्र।

निन्यानवें फीसदी मामलों में संघर्ष का कोई ठोस वजूद नहीं होता बल्कि केवल अपने अहंकारों को परिपुष्ट करने के लिए होता है अथवा केवल दूसरों को अपने अस्तित्व को दिखाने के लिए। साम्राज्यवादी मानसिकता और अपने को दूसरे से बड़ा, बुद्धिमान और उपयोगी मानने-मनवाने के भ्रमों ने ही आदमी को झगड़ालू, क्रूर और हिंसक बना डाला है।

बहुधा हममें से हर कोई इंसान जीवन में रोजाना किसी न किसी वजह से वाद-विवाद, तर्क-कुतर्क और फालतू के कामों या धंधों में रमा रहता है और इस वजह से कोई न कोई संघर्ष अपने आप पैदा हो जाता है।

जो आदमी जितना अधिक क्रोधी, उद्विग्न, अशांत, असंतोषी और अपेक्षावादी होता है वह उतना अधिक संघर्षवादी होता है जबकि जो लोग जितने अधिक शांत, मस्त और धीर-गंभीर होते हैं वे आनंद में रहा करते हैं।

खूब सारे लोग हैं जो अपने किसी न किसी मकसद या आदत से उलझे रहते हैं। इन लोगों को दिन में कोई न कोई ऎसा चाहिए होता है जिससे वे जी भर कर बतिया सकें, तर्क-कुतर्क, वाद-विवाद कर सकें और लड़ाई-झगड़ा करने की कोई न कोई मजबूत नींव बनाकर भूमिका अदा कर सकें।

ऎस लोग हमेशा उन लोगों की तलाश में रहा करते हैं जिनसे संघर्ष कर वे सुकून पा सकें।  और कोई नहीं मिलेगा तो वह अपने घर वालों और मित्रों से ही झगड़ लेंगे। लोग यह मानते हैं कि इनसे झगड़ा करने वाला कोई नहीं होगा तो ये शांत हो जाएंगे और धीर-गंभीर हो जाएंगे। पर ऎसा होता नहीं है।

इन लोगों की आदत ही ऎसी होती है कि वे जहाँ रहेंगे व जाएंगे वहाँ झगड़ा होगा ही होगा। इसके बगैर वे नहीं रह सकेंगे। इनके सामने से एक जाएगा तो वे दूसरे को पकड़ लेंगे। बहुत सारे परिवारों और समाजों की बरबादी का एकमात्र कारण यही है।

दुनिया में खूब सारे ऎसे मनहूस लोग भी पैदा होते रहते हैं जिनके बारे में कहा जाता है कि ऎसे अपशकुनी और मुर्दाल लोग जहाँ होते हैं वहाँ बिना किसी कारण के अक्सर संघर्ष आकार लेता रहता है।  कुछ दिन के लिए ये लोग कहीं बाहर चले जाते हैं तब यह महसूस होता है कि सारे झगड़ों की जड़ तो वास्तव में ये लोग ही हैं। इनके नहीं रहने पर माहौल में शान्ति, सुकून और आनंद पसरा रहता है।

वे लोग समाज के परम शत्रु हैं जो हमेशा लड़ाई-झगड़े के आदी होते हैं और आए दिन संघर्ष की कोई न कोई भूमिका बना ही लेते हैं। जरूरत है संघर्ष के बीजों को समाप्त करने की। आईये इसके लिए कुछ करें और घर-परिवार, समाज एवं क्षेत्र से कलह समाप्त करें, शांति, सद्भाव और प्रेम की भावनाओं का सागर बहाएं।

1 thought on “ये आदमी की जात है ही ऎसी

  1. आदमी अपने आप में सब कुछ तो नहीं,
    पर बहुत कुछ है…

    आदमी क्या-क्या नहीं है। आदमी विलक्षण मेधा-प्रज्ञा और हुनर वाला है, आदमी तमाशा खड़ा करने वाला भी है और तमाशबीन भी। मनोरंजन के हर उचित-अनुचित साधनों का आनंद लेने में माहिर भी है और ढीठ, उदासीन, कामचोर एवं अनुचर भी। पुरुषार्थी भी है और परजीवी भी। ईश्वर के प्रति आसक्त भी है और खुरचन चटवाने व आश्रय देने वाले इंसानों का अंधानुचर भी।
    धीर-गंभीर और कर्मयोग में रमा हुआ भी है तो दूसरी ओर सनक भरा, उन्मादी और खुदगर्ज भी है, आदमी अजायबघर भी है और पागलखाना भी। किसम-किसम के आदमियों के इस जंगल में वह सब कुछ है तो होना भी चाहिए, और नहीं भी।
    यह अपनी-अपनी आदत है, अपनी पसंद है कि किस किसम के आदमियों के साथ रहें, साथ दें और साथ चलते रहें। भगवान ने इतनी तो बुद्धि हर आदमी को दी ही है कि वह अपने ज्ञान, विवेक और अनुभवों के आधार पर दिशा और दशा तय कर सके।
    सब तरह के आदमियों के पावन दर्शन करते हुए भरपूर, स्वस्थ, मुफतिया व सर्वसुलभ मनोरंजन का कोई सा अवसर बेकार न जाने दें। सच में यह मेला ही है आदमियों का। इस भीड़ में खो न जाएं, अपने आपको भीड़ से अलग रखने, दिखाने और होने की कोशिश कभी न छोड़ें।

    http://drdeepakacharya.com/mans-caste-is-like-this/

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